पासरासि सुत्त
(अरियपरियेसना सुत्त)
1. ऐसा मैंने सुना—एक समय भगवान सावत्थी में जेतवन अनाथपिण्डिक के आराम में विहार कर रहे थे। तब भगवान पूर्वाह्न समय में निवास करके पात्र-चीवर लेकर सावत्थी में पिण्डाचार के लिए प्रवेश किए। तब बहुत से भिक्षु जहाँ आयुष्मान आनन्द थे वहाँ पहुँचे; पहुँचकर आयुष्मान आनन्द से यह कहा—“आयुष्मान आनन्द, हमें बहुत काल से भगवान के सम्मुख धर्मकथा नहीं सुनी। अच्छा हो आयुष्मान आनन्द, यदि हम भगवान के सम्मुख धर्मकथा सुनने का लाभ प्राप्त करें।”
“तो आयुष्मानो, रम्मक ब्राह्मण के आश्रम में जाओ; कदाचित् वहाँ भगवान के सम्मुख धर्मकथा सुनने का लाभ मिले।”
“एवं आयुष्मान!” कहकर उन भिक्षुओं ने आयुष्मान आनन्द को उत्तर दिया।
तब भगवान सावत्थी में पिण्डाचार करके, पश्चाद्भक्त पिण्डपात से लौटकर आयुष्मान आनन्द को आमन्त्रित किया—“आओ आनन्द, पूर्वाराम मिगारमाता के प्रासाद में दिवाविहार के लिए चलें।”
“एवं भन्ते!” कहकर आयुष्मान आनन्द ने भगवान को उत्तर दिया। तब भगवान आयुष्मान आनन्द के साथ पूर्वाराम मिगारमाता के प्रासाद में दिवाविहार के लिए गए। तब भगवान सायंकाल प्रतिसल्लान से उठकर आयुष्मान आनन्द को आमन्त्रित किया—“आओ आनन्द, पूर्वकोट्ठक में जाकर शरीर सींचें।”
“एवं भन्ते!” कहकर आयुष्मान आनन्द ने भगवान को उत्तर दिया।
2. तब भगवान आयुष्मान आनन्द के साथ पूर्वकोट्ठक में शरीर सींचने गए। पूर्वकोट्ठक में शरीर सींचकर बाहर निकलकर एक चीवर पहने शरीर को सुखाते हुए खड़े रहे। तब आयुष्मान आनन्द ने भगवान से कहा—“भन्ते, रम्मक ब्राह्मण का आश्रम अदूर है। भन्ते, रम्मक ब्राह्मण का आश्रम रमणीय है; भन्ते, रम्मक ब्राह्मण का आश्रम प्रसादीक है। अच्छा हो भन्ते, भगवान अनुकम्पा करके रम्मक ब्राह्मण के आश्रम में जाएँ।” भगवान ने मौन होकर स्वीकार किया।
तब भगवान रम्मक ब्राह्मण के आश्रम में गए। उस समय बहुत से भिक्षु रम्मक ब्राह्मण के आश्रम में धर्मकथा करके बैठे हुए थे। तब भगवान बहिद्वारकोट्ठक में कथा के समाप्त होने की प्रतीक्षा करते हुए खड़े रहे। तब भगवान कथा समाप्त हो जाने को जानकर खांसकर अगल को खटखटाया। उन भिक्षुओं ने भगवान के लिए द्वार खोला। तब भगवान रम्मक ब्राह्मण के आश्रम में प्रवेश करके निर्धारित आसन पर बैठ गए। बैठकर भगवान ने भिक्षुओं को आमन्त्रित किया—“भिक्षुओ, अभी तुम किस कथा में बैठे हुए थे? और तुम्हारी बीच की कथा क्या अधूरी रह गई?”
“भन्ते, भगवान के ही विषय में धर्मकथा अधूरी रह गई थी, तब भगवान आ पहुँचे।”
“साधु भिक्षुओ! भिक्षुओ, यह तुम्हारे लिए उपयुक्त है—श्रद्धा से घर से अनगारिक होकर प्रव्रजित कुलपुत्रों के लिए—कि तुम धर्मकथा करके बैठो। भिक्षुओ, एकत्रित होने पर तुम्हें दो ही काम करने चाहिए—या तो धर्मकथा, या आर्य मौन।”
3. “भिक्षुओ, दो प्रकार की पर्येषणाएँ हैं—आर्य पर्येषणा और अनार्य पर्येषणा।
“भिक्षुओ, अनार्य पर्येषणा क्या है? यहाँ भिक्षुओ, कोई व्यक्ति स्वयं जातिधर्मा होते हुए जातिधर्म की ही खोज करता है, स्वयं जराधर्मा होते हुए जराधर्म की ही खोज करता है, स्वयं व्याधिधर्मा होते हुए व्याधिधर्म की ही खोज करता है, स्वयं मरणधर्मा होते हुए मरणधर्म की ही खोज करता है, स्वयं शोकधर्मा होते हुए शोकधर्म की ही खोज करता है, स्वयं संक्लेशधर्मा होते हुए संक्लेशधर्म की ही खोज करता है।
“भिक्षुओ, जातिधर्म किसे कहते हो? पुत्र-भार्या जातिधर्म है, दासी-दास जातिधर्म है, अज-एडक जातिधर्म है, कुक्कुट-सूकर जातिधर्म है, हस्ति-गो-अश्व-वडव जातिधर्म है, जातरूप-रजत जातिधर्म है। भिक्षुओ, ये उपधि जातिधर्म हैं। यहाँ यह व्यक्ति बँधा हुआ, मूच्छित, आसक्त होकर स्वयं जातिधर्मा होते हुए जातिधर्म की ही खोज करता है।
“भिक्षुओ, जराधर्म किसे कहते हो? पुत्र-भार्या… जातरूप-रजत जराधर्म है। भिक्षुओ, ये उपधि जराधर्म हैं। यहाँ यह व्यक्ति बँधा हुआ, मूच्छित, आसक्त होकर स्वयं जराधर्मा होते हुए जराधर्म की ही खोज करता है।
“भिक्षुओ, व्याधिधर्म किसे कहते हो? पुत्र-भार्या… हस्ति-गो-अश्व-वडव व्याधिधर्म है। भिक्षुओ, ये उपधि व्याधिधर्म हैं। यहाँ यह व्यक्ति बँधा हुआ, मूच्छित, आसक्त होकर स्वयं व्याधिधर्मा होते हुए व्याधिधर्म की ही खोज करता है।
“भिक्षुओ, मरणधर्म किसे कहते हो? पुत्र-भार्या… हस्ति-गो-अश्व-वडव मरणधर्म है। भिक्षुओ, ये उपधि मरणधर्म हैं। यहाँ यह व्यक्ति बँधा हुआ, मूच्छित, आसक्त होकर स्वयं मरणधर्मा होते हुए मरणधर्म की ही खोज करता है।
“भिक्षुओ, शोकधर्म किसे कहते हो? पुत्र-भार्या… हस्ति-गो-अश्व-वडव शोकधर्म है। भिक्षुओ, ये उपधि शोकधर्म हैं। यहाँ यह व्यक्ति बँधा हुआ, मूच्छित, आसक्त होकर स्वयं शोकधर्मा होते हुए शोकधर्म की ही खोज करता है।
“भिक्षुओ, संक्लेशधर्म किसे कहते हो? पुत्र-भार्या… जातरूप-रजत संक्लेशधर्म है। भिक्षुओ, ये उपधि संक्लेशधर्म हैं। यहाँ यह व्यक्ति बँधा हुआ, मूच्छित, आसक्त होकर स्वयं संक्लेशधर्मा होते हुए संक्लेशधर्म की ही खोज करता है। भिक्षुओ, यह अनार्य पर्येषणा है।”
4. “भिक्षुओ, आर्य पर्येषणा क्या है? यहाँ भिक्षुओ, कोई व्यक्ति स्वयं जातिधर्मा होते हुए जातिधर्म में आदीनव जानकर अजात अनुत्तर योगक्षेम निर्वाण की खोज करता है, स्वयं जराधर्मा होते हुए जराधर्म में आदीनव जानकर अजर अनुत्तर योगक्षेम निर्वाण की खोज करता है, स्वयं व्याधिधर्मा होते हुए व्याधिधर्म में आदीनव जानकर अव्याधि अनुत्तर योगक्षेम निर्वाण की खोज करता है, स्वयं मरणधर्मा होते हुए मरणधर्म में आदीनव जानकर अमृत अनुत्तर योगक्षेम निर्वाण की खोज करता है, स्वयं शोकधर्मा होते हुए शोकधर्म में आदीनव जानकर अशोक अनुत्तर योगक्षेम निर्वाण की खोज करता है, स्वयं संक्लेशधर्मा होते हुए संक्लेशधर्म में आदीनव जानकर असंक्लिष्ट अनुत्तर योगक्षेम निर्वाण की खोज करता है। भिक्षुओ, यह आर्य पर्येषणा है।”
5. “भिक्षुओ, मैं भी पहले सम्बोधि से पहले, अनभिसम्बुद्ध बोधिसत्त्व होते हुए स्वयं जातिधर्मा होते हुए जातिधर्म की ही खोज करता था… स्वयं संक्लेशधर्मा होते हुए संक्लेशधर्म की ही खोज करता था। तब भिक्षुओ, मेरे मन में यह हुआ—‘क्या मैं स्वयं जातिधर्मा होते हुए जातिधर्म की ही खोज करूँ… स्वयं संक्लेशधर्मा होते हुए संक्लेशधर्म की ही खोज करूँ? क्यों न मैं स्वयं जातिधर्मा होते हुए जातिधर्म में आदीनव जानकर अजात अनुत्तर योगक्षेम निर्वाण की खोज करूँ… स्वयं संक्लेशधर्मा होते हुए संक्लेशधर्म में आदीनव जानकर असंक्लिष्ट अनुत्तर योगक्षेम निर्वाण की खोज करूँ।’”
6. “भिक्षुओ, फिर मैं किसी समय तरुण, सुकुमार केश वाला, भद्र यौवन से सम्पन्न, प्रथम वय में, अनिच्छुक माता-पिता के आँसू भरे मुख से रोते हुए केश-मशु काटकर काषाय वस्त्र धारण करके घर से अनगारिक होकर प्रव्रजित हुआ। इस प्रकार प्रव्रजित होकर कुशल की खोज करते हुए, अनुत्तर शान्तिवरपद की खोज करते हुए जहाँ आळार कालाम थे वहाँ पहुँचा। पहुँचकर आळार कालाम से कहा—‘आयुष्मान कालाम, मैं इस धर्म-विनय में ब्रह्मचर्य आचरण करना चाहता हूँ।’ ऐसा कहे जाने पर भिक्षुओ, आळार कालाम ने मुझसे कहा—‘आयुष्मान विहार करें; ऐसा यह धर्म है जहाँ विज्ञ पुरुष शीघ्र ही अपने आचार्यक को स्वयं अभिज्ञा से साक्षात्कार करके उपसम्पन्न होकर विहार कर सकता है।’ भिक्षुओ, मैंने शीघ्र ही उस धर्म को पारंगत कर लिया। भिक्षुओ, मैं केवल ओष्ठ-प्रहार मात्र और लपित-लापन मात्र से ज्ञानवाद और स्थेरवाद कहता था, और ‘जानता हूँ, देखता हूँ’ ऐसा प्रतिज्ञान करता था—मैं भी और दूसरे भी। तब भिक्षुओ, मेरे मन में यह हुआ—‘आळार कालाम केवल श्रद्धा-मात्र से इस धर्म को स्वयं अभिज्ञा से साक्षात्कार करके उपसम्पन्न होकर विहार करता हूँ ऐसा नहीं कहते; निश्चय ही आळार कालाम इस धर्म को जानते-देखते हुए विहार करते हैं।’
“तब भिक्षुओ, मैं जहाँ आळार कालाम थे वहाँ पहुँचा; पहुँचकर आळार कालाम से कहा—‘आयुष्मान कालाम, आप किस सीमा तक इस धर्म को स्वयं अभिज्ञा से साक्षात्कार करके उपसम्पन्न होकर विहार करता हूँ ऐसा कहते हैं?’ ऐसा कहे जाने पर भिक्षुओ, आळार कालाम ने आकिंचन्यायतन का उपदेश दिया। तब भिक्षुओ, मेरे मन में यह हुआ—‘केवल आळार कालाम के पास ही श्रद्धा नहीं है, मेरे पास भी श्रद्धा है; केवल आळार कालाम के पास ही वीर्य नहीं है, मेरे पास भी वीर्य है… केवल आळार कालाम के पास ही प्रज्ञा नहीं है, मेरे पास भी प्रज्ञा है। क्यों न मैं उस धर्म की साक्षात्क्रिया के लिए प्रयास करूँ जिसे आळार कालाम स्वयं अभिज्ञा से साक्षात्कार करके उपसम्पन्न होकर विहार करता हूँ ऐसा कहते हैं।’ भिक्षुओ, मैंने शीघ्र ही उस धर्म को स्वयं अभिज्ञा से साक्षात्कार करके उपसम्पन्न होकर विहार किया।
“तब भिक्षुओ, मैं जहाँ आळार कालाम थे वहाँ पहुँचा; पहुँचकर आळार कालाम से कहा—
‘आयुष्मान कालाम, आप किस सीमा तक इस धर्म को स्वयं अभिज्ञा से साक्षात्कार करके उपसम्पन्न होकर कहते हैं?’
‘आयुष्मान, मैं इसी सीमा तक इस धर्म को स्वयं अभिज्ञा से साक्षात्कार करके उपसम्पन्न होकर कहता हूँ।’
‘आयुष्मान, मैं भी इसी सीमा तक इस धर्म को स्वयं अभिज्ञा से साक्षात्कार करके उपसम्पन्न होकर विहार करता हूँ।’
‘आयुष्मान, हमारा लाभ है, हमारा सुलभ है कि हम ऐसे सब्रह्मचारी को देखते हैं। जो धर्म मैं स्वयं अभिज्ञा से साक्षात्कार करके उपसम्पन्न होकर कहता हूँ, उसी धर्म को आप स्वयं अभिज्ञा से साक्षात्कार करके उपसम्पन्न होकर विहार करते हैं… इस प्रकार जैसा मैं हूँ वैसा आप हैं, जैसा आप हैं वैसा मैं हूँ। आओ आयुष्मान, अब हम दोनों इस गण का परिहार करें।’
भिक्षुओ, इस प्रकार आळार कालाम आचार्य होते हुए अपने अन्तेवासी मुझको अपने समान स्थापित किया, और मुझे उदार पूजा से पूजा की। तब भिक्षुओ, मेरे मन में यह हुआ—‘यह धर्म निर्वेद के लिए, विराग के लिए, निरोध के लिए, उपशम के लिए, अभिज्ञा के लिए, सम्बोधि के लिए, निर्वाण के लिए नहीं है; केवल आकिंचन्यायतन-उपपत्ति तक ही है।’ भिक्षुओ, मैं उस धर्म को अनलंकृत करके उस धर्म से निर्विण्ण होकर चला गया।”
7. “भिक्षुओ, फिर मैं कुशल की खोज करते हुए, अनुत्तर शान्तिवरपद की खोज करते हुए जहाँ उदक रामपुत्र थे वहाँ पहुँचा… (आळार कालाम के समान ही) … उदक रामपुत्र ने नैवसंज्ञानासंज्ञायतन का उपदेश दिया… भिक्षुओ, मैंने शीघ्र ही उस धर्म को स्वयं अभिज्ञा से साक्षात्कार करके उपसम्पन्न होकर विहार किया… उदक रामपुत्र ने सब्रह्मचारी होते हुए मुझे आचार्य-स्थान पर स्थापित किया… तब भिक्षुओ, मेरे मन में यह हुआ—‘यह धर्म निर्वेद के लिए… निर्वाण के लिए नहीं है; केवल नैवसंज्ञानासंज्ञायतन-उपपत्ति तक ही है।’ भिक्षुओ, मैं उस धर्म को अनलंकृत करके उस धर्म से निर्विण्ण होकर चला गया।”
8. “भिक्षुओ, फिर मैं कुशल की खोज करते हुए, अनुत्तर शान्तिवरपद की खोज करते हुए मगध में क्रमशः चारिका करते हुए उरुवेला सेनानिग्राम पहुँचा। वहाँ मैंने रमणीय भूमिभाग देखा, प्रसादीक वनखण्ड, स्वच्छ सुपतीर्थ रमणीय नदी बहती हुई, और चारों ओर गोचरग्राम। तब भिक्षुओ, मेरे मन में यह हुआ—‘रमणीय है भूमिभाग, प्रसादीक है वनखण्ड, नदी स्वच्छ सुपतीर्थ रमणीय बहती है, चारों ओर गोचरग्राम है। यह कुलपुत्र के प्रधानार्थिक के प्रधान के लिए पर्याप्त है।’ भिक्षुओ, मैं वहीं बैठ गया—‘यह प्रधान के लिए पर्याप्त है।’”
9. “भिक्षुओ, मैं स्वयं जातिधर्मा होते हुए जातिधर्म में आदीनव जानकर अजात अनुत्तर योगक्षेम निर्वाण की खोज करते हुए अजात अनुत्तर योगक्षेम निर्वाण को प्राप्त हुआ… स्वयं संक्लेशधर्मा होते हुए संक्लेशधर्म में आदीनव जानकर असंक्लिष्ट अनुत्तर योगक्षेम निर्वाण की खोज करते हुए असंक्लिष्ट अनुत्तर योगक्षेम निर्वाण को प्राप्त हुआ। और मेरे ज्ञान-दर्शन उत्पन्न हुआ—‘अकुप्य है मेरी विमुक्ति, यह अन्तिम जाति है, अब पुनःभव नहीं है।’”
10. “तब भिक्षुओ, मेरे मन में यह हुआ—‘यह धर्म मेरे द्वारा अधिगत है—गम्भीर, दुर्दर्श, दुरनुबोध, शान्त, प्रणীত, अतर्क-अवचर, निपुण, पण्डित-वेदनीय। किन्तु यह प्रजा आलय-रमा, आलय-रता, आलय-सम्मुदिता है। आलय-रमा, आलय-रता, आलय-सम्मुदिता प्रजा के लिए यह स्थान दुर्दर्श है—इदप्पच्चयता प्रतिच्चसमुप्पाद। और यह स्थान भी दुर्दर्श है—सब संस्कारों का शमथ, सब उपधियों का प्रतिनिस्सर्ग, तृष्णाक्षय, विराग, निरोध, निर्वाण। यदि मैं धर्म का उपदेश करूँ और दूसरे न समझें, तो वह मेरे लिए क्लान्ति होगी, वह मेरे लिए विहेसा होगी।’ भिक्षुओ, तब मुझे ये अद्भुत गाथाएँ पहले कभी न सुनी हुई प्रतीत हुईं—
‘कष्ट से अधिगत, अब क्या प्रकाशित करूँ।
राग-द्वेष-परेतों से यह धर्म सुसम्बुद्ध नहीं॥
‘प्रतिस्रोतगामी, निपुण, गम्भीर, दुर्दर्श, अणु।
रागरक्त नहीं देखेंगे, तमोखन्ध से आवृत॥’”
11. “भिक्षुओ, इस प्रकार विचार करते हुए मेरा चित्त अप्रवृत्ति की ओर झुक गया, धर्मदेशना की ओर नहीं। तब भिक्षुओ, ब्रह्मा सहम्पति ने मेरे चेतस से चेतोपरिवितर्क जानकर सोचा—‘नष्ट हो जाएगा लोक, विनष्ट हो जाएगा लोक, जहाँ तथागत अर्हत् सम्यक्सम्बुद्ध का चित्त अप्रवृत्ति की ओर झुक रहा है, धर्मदेशना की ओर नहीं।’ तब भिक्षुओ, ब्रह्मा सहम्पति—जैसे बलवान् पुरुष समिञ्जित बाहु को फैला दे या फैलाए बाहु को समिञ्जित कर दे—वैसे ही ब्रह्मलोक से अन्तर्हित होकर मेरे सामने प्रकट हुए। तब भिक्षुओ, ब्रह्मा सहम्पति एक कंधे पर उत्तरासंग करके मेरी ओर अञ्जलि जोड़कर मुझसे कहा—‘भन्ते, भगवान धर्म का उपदेश करें, सुगत धर्म का उपदेश करें। कुछ सत्त्व अप्परजस्कजातिक हैं; अश्रवण से धर्म से परिहीन हो रहे हैं। धर्म के ज्ञाता होंगे।’ भिक्षुओ, यह ब्रह्मा सहम्पति ने कहा। यह कहकर फिर यह कहा—
‘मगध में पहले प्रकट हुआ,
अशुद्ध धर्म समलों द्वारा चिन्तित।
अमृत का द्वार खोलो,
विमलानुबुद्ध धर्म सुनें॥
‘जैसे शैल पर पर्वत-शिखर पर खड़ा,
चारों ओर जनता को देखे।
तथोपम धर्ममय सुमेध,
प्रासाद पर चढ़कर समन्तचक्षु।
शोकावतीर्ण जनता को अपेतशोक,
जाति-जरा-अभिभूत को देखो॥
‘उठो वीर, विजितसंग्राम,
सत्त्ववाह, ऋणरहित, लोक में विचर।
भगवान धर्म का उपदेश करें,
ज्ञाता होंगे॥’”
12. “तब भिक्षुओ, ब्रह्मा की अध्येषणा जानकर और सत्त्वों पर कारुण्यता से बुद्धचक्षु से लोक को अवलोकन किया। भिक्षुओ, बुद्धचक्षु से लोक को अवलोकन करते हुए मैंने सत्त्वों को देखा—अप्परजस्क, महारजस्क; तीक्ष्णेन्द्रिय, मृदुइन्द्रिय; स्वाकार, द्वाकार; सुविज्ञाप्य, दुविज्ञाप्य; कुछ परलोक-वज्र-भयदर्शी होकर विहार करते, कुछ नहीं। जैसे कमलिनी या पद्मिनी या पुण्डरीकिनी में कुछ कमल जल में उत्पन्न, जल में संवर्धित, जल से ऊपर न निकले हुए अन्तोनिमग्गपोसी होते; कुछ जल से सम होकर स्थित होते; कुछ जल को लाँघकर स्थित होते और जल से अनुपलित्त होते—ठीक वैसे ही भिक्षुओ, बुद्धचक्षु से लोक को अवलोकन करते हुए मैंने सत्त्वों को देखा…। तब भिक्षुओ, मैंने ब्रह्मा सहम्पति को गाथा से उत्तर दिया—
‘उनके लिए अमृत के द्वार खुले हैं,
जो श्रोता हैं, श्रद्धा को प्रमुक्त करें।
विहिंसासंज्ञी होकर मैंने प्रवीण नहीं कहा,
प्रणीत धर्म मनुष्यों में, हे ब्रह्म॥’
“तब भिक्षुओ, ब्रह्मा सहम्पति ‘भगवान ने धर्मदेशना का अवसर दिया’ ऐसा जानकर मुझे अभिवादन करके प्रदक्षिणा करके वहीं अन्तर्धान हो गए।”
13. “तब भिक्षुओ, मेरे मन में यह हुआ—‘किसे मैं पहले धर्म का उपदेश करूँ; कौन इस धर्म को शीघ्र समझेगा?’ तब मेरे मन में यह हुआ—‘यह आळार कालाम पण्डित, व्युत्पन्न, मेधावी, दीर्घकाल से अप्परजस्कजातिक है। क्यों न मैं आळार कालाम को पहले धर्म का उपदेश करूँ। वह इस धर्म को शीघ्र समझेगा।’ तब भिक्षुओ, देवता आकर मुझसे कहा—‘भन्ते, आळार कालाम सात दिन पहले काल-गत हो गए।’ और मेरे ज्ञान-दर्शन उत्पन्न हुआ—‘आळार कालाम सात दिन पहले काल-गत हो गए।’ तब मेरे मन में यह हुआ—‘आळार कालाम महाज्ञानीय थे। यदि वे इस धर्म को सुनते, तो शीघ्र समझ लेते।’
“फिर मेरे मन में यह हुआ—‘किसे मैं पहले धर्म का उपदेश करूँ…?’ तब मेरे मन में यह हुआ—‘यह उदक रामपुत्र पण्डित…।’ तब देवता ने कहा—‘भन्ते, उदक रामपुत्र कल रात्रि काल-गत हो गए।’… ‘उदक रामपुत्र महाज्ञानीय थे…।’
“फिर मेरे मन में यह हुआ—‘किसे मैं पहले धर्म का उपदेश करूँ…?’ तब मेरे मन में यह हुआ—‘पञ्चवर्गीय भिक्षु मेरे बहुत उपकारी हैं, जिन्होंने मुझे प्रधान-प्रहितचित्त की उपासना की। क्यों न मैं पञ्चवर्गीय भिक्षुओं को पहले धर्म का उपदेश करूँ।’ तब मेरे मन में यह हुआ—‘अभी पञ्चवर्गीय भिक्षु कहाँ विहार करते हैं?’ भिक्षुओ, मैंने दिव्यचक्षु से विशुद्ध अतिक्रान्तमानुषिक से पञ्चवर्गीय भिक्षुओं को वाराणसी में इसिपतन मृगदाय में विहार करते देखा। तब भिक्षुओ, उरुवेला में यथासुख विहार करके वाराणसी की ओर चारिका के लिए निकल पड़ा।”
14. “भिक्षुओ, उपक आजीवक ने मुझे गया और बोधि के बीच मार्ग पर जाते देखा। देखकर मुझसे कहा—‘आयुष्मान, आपके इन्द्रिय प्रसन्न हैं, छविवर्ण परिशुद्ध और पर्यवदात है! आयुष्मान, आप किसके उद्देश्य से प्रव्रजित हुए, आपका शास्ता कौन है, आप किसके धर्म को रुचिकर मानते हैं?’ ऐसा कहे जाने पर भिक्षुओ, मैंने उपक आजीवक से गाथाओं में कहा—
‘सबका अभिभू, सबका विदू हूँ मैं,
सब धर्मों में अनुपलित्त।
सबका त्यागी, तृष्णाक्षय में विमुक्त,
स्वयं अभिज्ञा से किसे उद्देश्य करूँ॥
‘मेरा कोई आचार्य नहीं, मेरे सदृश नहीं है।
सदेवक लोक में मेरा कोई प्रतिपुद्गल नहीं॥
‘मैं लोक में अर्हत् हूँ, मैं अनुत्तर शास्ता हूँ।
अकेला सम्यक्सम्बुद्ध हूँ, शीतभूत निर्वृत हूँ॥
‘धर्मचक्र प्रवर्तन के लिए काशीपुर को जा रहा हूँ।
अन्धीभूत लोक में अमृत-दुन्दुभि बजाऊँगा॥’
‘आयुष्मान, जैसा आप प्रतिज्ञान करते हैं, आप अनन्तजिन होने के योग्य हैं!’
‘जैसे मैं हूँ वैसे ही जिन होते हैं, जिन्होंने आस्रवक्षय प्राप्त किया।
मेरे द्वारा पापक धर्म जीते गए, इसलिए उपक मैं जिन हूँ॥’
“ऐसा कहे जाने पर भिक्षुओ, उपक आजीवक ‘हो सकता है आयुष्मान’ कहकर सिर हिलाकर उन्मार्ग लेकर चला गया।”
15. “तब भिक्षुओ, क्रमशः चारिका करते हुए वाराणसी इसिपतन मृगदाय में जहाँ पञ्चवर्गीय भिक्षु थे वहाँ पहुँचा। भिक्षुओ, पञ्चवर्गीय भिक्षुओं ने मुझे दूर से आते देखा। देखकर एक-दूसरे से कहा—‘आयुष्मान, यह श्रमण गोतम आ रहा है—बाहुल्यिक, प्रधान से विभ्रान्त, बाहुल्य की ओर लौटा हुआ। इसे न अभिवादन करना, न प्रत्युत्थान करना; न इसका पात्र-चीवर ग्रहण करना। केवल आसन रखना, यदि चाहे तो बैठे।’ भिक्षुओ, जैसे-जैसे मैं निकट आया, वैसे-वैसे पञ्चवर्गीय भिक्षु अपनी कति के अनुसार नहीं रह सके। कुछ मुझे प्रत्युद्गमन करके पात्र-चीवर ग्रहण करने लगे, कुछ आसन बिछाने लगे, कुछ पादोदक उपस्थित करने लगे। फिर भी वे मुझे नाम से और आयुष्मान-सम्बोधन से संबोधित करते रहे।
“ऐसा कहे जाने पर भिक्षुओ, मैंने पञ्चवर्गीय भिक्षुओं से कहा—‘भिक्षुओ, तथागत को नाम से और आयुष्मान-सम्बोधन से संबोधित मत करो। भिक्षुओ, तथागत अर्हत् सम्यक्सम्बुद्ध है। भिक्षुओ, कान लगाओ, अमृत अधिगत है, मैं अनुशासन करता हूँ, मैं धर्म का उपदेश करता हूँ। जैसा अनुशासित वैसा प्रतिपन्न होकर शीघ्र ही—जिसके लिए कुलपुत्र सम्यक् घर से अनगारिक होकर प्रव्रजित होते हैं—उस अनुत्तर ब्रह्मचर्य-पर्यवसान को दृष्टधर्म में स्वयं अभिज्ञा से साक्षात्कार करके उपसम्पन्न होकर विहार करोगे।’ ऐसा कहे जाने पर भिक्षुओ, पञ्चवर्गीय भिक्षुओं ने मुझसे कहा—‘आयुष्मान गोतम, उस ईर्या, उस प्रतिपदा, उस दुष्करकारिका से भी आप उत्तरिमनुष्यधर्म अलमार्यज्ञानदर्शनविशेष को नहीं प्राप्त हुए, तो अब बाहुल्यिक, प्रधान से विभ्रान्त, बाहुल्य की ओर लौटे हुए आप उत्तरिमनुष्यधर्म अलमार्यज्ञानदर्शनविशेष को कैसे प्राप्त करेंगे?’ ऐसा कहे जाने पर भिक्षुओ, मैंने कहा—‘भिक्षुओ, तथागत बाहुल्यिक नहीं, प्रधान से विभ्रान्त नहीं, बाहुल्य की ओर लौटा हुआ नहीं। भिक्षुओ, तथागत अर्हत् सम्यक्सम्बुद्ध है। कान लगाओ… विहार करोगे।’ दूसरी बार भी… तीसरी बार भी पञ्चवर्गीय भिक्षुओं ने यही कहा।
“ऐसा कहे जाने पर भिक्षुओ, मैंने पञ्चवर्गीय भिक्षुओं से कहा—‘भिक्षुओ, क्या तुम मुझे इससे पहले ऐसा प्रभावित याद करते हो?’ ‘नहीं भन्ते।’ ‘भिक्षुओ, तथागत अर्हत् सम्यक्सम्बुद्ध है। कान लगाओ… विहार करोगे।’
“भिक्षुओ, मैं पञ्चवर्गीय भिक्षुओं को समझाने में समर्थ हुआ। भिक्षुओ, दो भिक्षुओं को मैं उपदेश देता, तीन भिक्षु पिण्डाचार करते। तीन भिक्षु जो पिण्डाचार करके लाते उससे छः जन जीवित रहते। तीन भिक्षुओं को उपदेश देता, दो भिक्षु पिण्डाचार करते…। तब भिक्षुओ, पञ्चवर्गीय भिक्षु मेरे द्वारा इस प्रकार उपदिष्ट और अनुशासित होकर स्वयं जातिधर्मा होते हुए जातिधर्म में आदीनव जानकर अजात अनुत्तर योगक्षेम निर्वाण को प्राप्त हुए… स्वयं संक्लेशधर्मा होते हुए संक्लेशधर्म में आदीनव जानकर असंक्लिष्ट अनुत्तर योगक्षेम निर्वाण को प्राप्त हुए। और उनके ज्ञान-दर्शन उत्पन्न हुआ—‘अकुप्य है हमारी विमुक्ति, यह अन्तिम जाति है, अब पुनःभव नहीं है।’”
16. “भिक्षुओ, ये पाँच कामगुण हैं। कौन से पाँच? चक्षु-विज्ञेय रूप—इष्ट, कान्त, मनोज्ञ, प्रियरूप, कामोपसंहित, रजनीय; श्रोत्र-विज्ञेय शब्द… घ्राण-विज्ञेय गन्ध… जिह्वा-विज्ञेय रस… काय-विज्ञेय स्प्रष्टव्य—इष्ट, कान्त, मनोज्ञ, प्रियरूप, कामोपसंहित, रजनीय। भिक्षुओ, ये पाँच कामगुण हैं। भिक्षुओ, जो कोई श्रमण या ब्राह्मण इन पाँच कामगुणों को बँधा हुआ, मूच्छित, आसक्त, अनादीनवदर्शी, अनिस्सरणप्रज्ञ होकर उपभोग करते हैं, उन्हें इस प्रकार जानना चाहिए—‘अनय-प्राप्त, व्यसन-प्राप्त, पापमती के इच्छानुसार किए जाने योग्य।’ जैसे भिक्षुओ, आरण्यक मृग बँधा हुआ पाशराशि पर लेट जाए। उसे इस प्रकार जानना चाहिए—‘अनय-प्राप्त, व्यसन-प्राप्त, लुद्द के इच्छानुसार किए जाने योग्य। लुद्द आने पर जहाँ चाहे नहीं जा सकेगा।’ ठीक वैसे ही भिक्षुओ, जो कोई श्रमण या ब्राह्मण इन पाँच कामगुणों को बँधा हुआ… उपभोग करते हैं, उन्हें इस प्रकार जानना चाहिए—‘अनय-प्राप्त… पापमती के इच्छानुसार किए जाने योग्य।’
“भिक्षुओ, जो कोई श्रमण या ब्राह्मण इन पाँच कामगुणों को अबँधा, अमूच्छित, अनासक्त, आदीनवदर्शी, निस्सरणप्रज्ञ होकर उपभोग करते हैं, उन्हें इस प्रकार जानना चाहिए—‘अनय-अप्राप्त, व्यसन-अप्राप्त, पापमती के इच्छानुसार किए जाने योग्य नहीं।’ जैसे भिक्षुओ, आरण्यक मृग अबँधा पाशराशि पर लेट जाए। उसे इस प्रकार जानना चाहिए—‘अनय-अप्राप्त… लुद्द के इच्छानुसार किए जाने योग्य नहीं। लुद्द आने पर जहाँ चाहे जा सकेगा।’ ठीक वैसे ही…
“जैसे भिक्षुओ, आरण्यक मृग अरण्य-पवन में विचरता हुआ निर्भय जाता है, निर्भय खड़ा होता है, निर्भय बैठता है, निर्भय शय्या कल्पित करता है। उसका क्या कारण? भिक्षुओ, लुद्द की पहुँच में नहीं आया। ठीक वैसे ही भिक्षुओ, भिक्षु कामों से विविक्त होकर, अकुशल धर्मों से विविक्त होकर, सवितर्क-सविचार, विवेकज प्रीति-सुख वाले प्रथम ध्यान को प्राप्त करके विहार करता है। भिक्षुओ, इसे कहते हैं—भिक्षु ने मार को अन्ध बना दिया, पद-रहित करके मार-चक्षु को अदर्शन में पहुँचा दिया, पापमती को।
“फिर भिक्षुओ, भिक्षु वितर्क-विचार के उपशान्त होने पर… द्वितीय ध्यान…
“फिर… तृतीय ध्यान…
“फिर… चतुर्थ ध्यान…
“फिर… आकासानन्त्यायतन…
“फिर… विज्ञानानन्त्यायतन…
“फिर… आकिंचन्यायतन…
“फिर… नैवसंज्ञानासंज्ञायतन…
“फिर भिक्षुओ, भिक्षु सब नैवसंज्ञानासंज्ञायतन का समतिक्रम करके संज्ञा-वेदित-निरोध को प्राप्त करके विहार करता है, और प्रज्ञा से देखने पर उसके आस्रव परिक्षीण हो जाते हैं। भिक्षुओ, इसे कहते हैं—भिक्षु ने मार को अन्ध बना दिया, पद-रहित करके मार-चक्षु को अदर्शन में पहुँचा दिया, पापमती को। लोक में विषक्तिका को तर गया। निर्भय जाता है, निर्भय खड़ा होता है, निर्भय बैठता है, निर्भय शय्या कल्पित करता है। उसका क्या कारण? भिक्षुओ, पापमती की पहुँच में नहीं आया।”
यह भगवान ने कहा। सन्तुष्ट होकर उन भिक्षुओं ने भगवान के भाषण का अभिनन्दन किया।
पासरासि सुत्त समाप्त।

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