4. रथविनीत सुत्त

Dhamma Skandha
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 रथविनीत सुत्त


1. ऐसा मैंने सुना—एक समय भगवान राजगृह में वेणुवन कलन्दकनिवाप में विहार कर रहे थे। तब बहुत से जातिभूम के भिक्षु जातिभूमि में वर्षावास बिताकर जहाँ भगवान थे वहाँ पहुँचे; पहुँचकर भगवान को अभिवादन करके एक ओर बैठ गए। एक ओर बैठे उन भिक्षुओं से भगवान ने यह कहा—


“भिक्षुओ, जातिभूमि में जातिभूम के भिक्षुओं में सब्रह्मचारियों के बीच ऐसा कौन प्रसिद्ध है—‘स्वयं अल्पेच्छुक है और भिक्षुओं को अल्पेच्छुता की बात भी करता है, स्वयं संतुष्ट है और भिक्षुओं को संतुष्टि की बात भी करता है, स्वयं एकान्तप्रिय है और भिक्षुओं को एकान्त की बात भी करता है, स्वयं असंसर्गी है और भिक्षुओं को असंसर्ग की बात भी करता है, स्वयं आरब्धवीर्य है और भिक्षुओं को वीर्यारम्भ की बात भी करता है, स्वयं शीलसंपन्न है और भिक्षुओं को शीलसंपदा की बात भी करता है, स्वयं समाधिसंपन्न है और भिक्षुओं को समाधिसंपदा की बात भी करता है, स्वयं प्रज्ञासंपन्न है और भिक्षुओं को प्रज्ञासंपदा की बात भी करता है, स्वयं विमुक्तिसंपन्न है और भिक्षुओं को विमुक्तिसंपदा की बात भी करता है, स्वयं विमुक्तिज्ञानदर्शनसंपन्न है और भिक्षुओं को विमुक्तिज्ञानदर्शनसंपदा की बात भी करता है, सब्रह्मचारियों का उपदेशक, ज्ञापक, संदर्शक, समादापक, समुत्तेजक और संप्रहंसक है’?”  


“भन्ते, पुण्ण नाम आयुष्मान मन्ताणिपुत्र जातिभूमि में जातिभूम के भिक्षुओं में सब्रह्मचारियों के बीच ऐसा प्रसिद्ध है—‘स्वयं अल्पेच्छुक है और भिक्षुओं को अल्पेच्छुता की बात भी करता है… (यथापूर्व) … उपदेशक, ज्ञापक, संदर्शक, समादापक, समुत्तेजक और संप्रहंसक है’।”


2. उस समय आयुष्मान सारिपुत्र भगवान के अदूर बैठे हुए थे। तब आयुष्मान सारिपुत्र के मन में यह हुआ—“आयुष्मान पुण्ण मन्ताणिपुत्र का लाभ है, आयुष्मान पुण्ण मन्ताणिपुत्र का सुलभ लाभ है, जिनकी विज्ञ सब्रह्मचारी शास्ता के सम्मुख बार-बार अनुमोदन करते हुए गुण वर्णन करते हैं, और शास्ता भी उनका अनुमोदन करते हैं। कदाचित् कभी हम भी आयुष्मान पुण्ण मन्ताणिपुत्र के साथ मिलें, कदाचित् कोई कथा-संलाप हो।”


3. तब भगवान राजगृह में यथासुख विहार करके सावत्थी की ओर चारिका के लिए निकल पड़े। क्रमशः चारिका करते हुए सावत्थी पहुँचे। वहाँ भगवान सावत्थी में जेतवन अनाथपिण्डिक के आराम में विहार करने लगे। आयुष्मान पुण्ण मन्ताणिपुत्र ने सुना—“भगवान किरात सावत्थी पहुँच गए हैं; सावत्थी में जेतवन अनाथपिण्डिक के आराम में विहार कर रहे हैं।”


4. तब आयुष्मान पुण्ण मन्ताणिपुत्र ने शयनासन समेटकर पात्र-चीवर लेकर सावत्थी की ओर चारिका के लिए निकल पड़े। क्रमशः चारिका करते हुए सावत्थी जेतवन अनाथपिण्डिक आराम पहुँचे; जहाँ भगवान थे वहाँ पहुँचे; पहुँचकर भगवान को अभिवादन करके एक ओर बैठ गए। एक ओर बैठे आयुष्मान पुण्ण मन्ताणिपुत्र को भगवान ने धर्मकथा से संदर्शित, समादापित, समुत्तेजित और संप्रहसित किया। तब आयुष्मान पुण्ण मन्ताणिपुत्र भगवान द्वारा धर्मकथा से संदर्शित, समादापित, समुत्तेजित और संप्रहसित होकर भगवान के भाषण का अभिनन्दन और अनुमोदन करके आसन से उठे, भगवान को अभिवादन करके प्रदक्षिणा करके अन्धवन की ओर दिवाविहार के लिए चले गए।


5. तब कोई एक भिक्षु जहाँ आयुष्मान सारिपुत्र थे वहाँ पहुँचा; पहुँचकर आयुष्मान सारिपुत्र से यह कहा—“आयुष्मान सारिपुत्र, जिस पुण्ण नाम भिक्षु मन्ताणिपुत्र की आप बार-बार प्रशंसा करते थे, वह भगवान द्वारा धर्मकथा से संदर्शित, समादापित, समुत्तेजित और संप्रहसित होकर भगवान के भाषण का अभिनन्दन और अनुमोदन करके आसन से उठे, भगवान को अभिवादन करके प्रदक्षिणा करके अन्धवन की ओर दिवाविहार के लिए चले गए।”


तब आयुष्मान सारिपुत्र तुरन्त-सा निषीदन लेकर आयुष्मान पुण्ण मन्ताणिपुत्र के पीछे-पीछे सिर की ओर देखते हुए चले। तब आयुष्मान पुण्ण मन्ताणिपुत्र अन्धवन में प्रवेश करके किसी एक वृक्षमूल में दिवाविहार के लिए बैठ गए। आयुष्मान सारिपुत्र भी अन्धवन में प्रवेश करके किसी एक वृक्षमूल में दिवाविहार के लिए बैठ गए।


तब आयुष्मान सारिपुत्र सायंकाल प्रतिसल्लान से उठकर जहाँ आयुष्मान पुण्ण मन्ताणिपुत्र थे वहाँ पहुँचे; पहुँचकर आयुष्मान पुण्ण मन्ताणिपुत्र के साथ सम्मोदन किया। सम्मोदनीय और सारणीय कथा करके एक ओर बैठ गए। एक ओर बैठे आयुष्मान सारिपुत्र ने आयुष्मान पुण्ण मन्ताणिपुत्र से यह कहा—


6.  “आयुष्मान, क्या हमारे लिए भगवान के पास ब्रह्मचर्य वास किया जाता है?”  

“हाँ, आयुष्मान।”  


“क्या आयुष्मान, शीलविशुद्धि के लिए भगवान के पास ब्रह्मचर्य वास किया जाता है?”  

“नहीं, आयुष्मान।”  


“क्या आयुष्मान, चित्तविशुद्धि के लिए भगवान के पास ब्रह्मचर्य वास किया जाता है?”  

“नहीं, आयुष्मान।”  


“क्या आयुष्मान, दृष्टिविशुद्धि के लिए भगवान के पास ब्रह्मचर्य वास किया जाता है?”  

“नहीं, आयुष्मान।”  


“क्या आयुष्मान, कांक्षावितरणविशुद्धि के लिए भगवान के पास ब्रह्मचर्य वास किया जाता है?”  

“नहीं, आयुष्मान।”  


“क्या आयुष्मान, मार्गामार्गज्ञानदर्शनविशुद्धि के लिए भगवान के पास ब्रह्मचर्य वास किया जाता है?”  

“नहीं, आयुष्मान।”  


“क्या आयुष्मान, प्रतिपदाज्ञानदर्शनविशुद्धि के लिए भगवान के पास ब्रह्मचर्य वास किया जाता है?”  

“नहीं, आयुष्मान।”  


“क्या आयुष्मान, ज्ञानदर्शनविशुद्धि के लिए भगवान के पास ब्रह्मचर्य वास किया जाता है?”  

“नहीं, आयुष्मान।”  


“‘क्या आयुष्मान, शीलविशुद्धि के लिए…’ से लेकर ‘ज्ञानदर्शनविशुद्धि के लिए भगवान के पास ब्रह्मचर्य वास किया जाता है?’ पूछने पर आप ‘नहीं, आयुष्मान’ कहते हैं। तो फिर आयुष्मान, किस प्रयोजन से भगवान के पास ब्रह्मचर्य वास किया जाता है?”  

“आयुष्मान, अनुपादापरिनिर्वाण के लिए भगवान के पास ब्रह्मचर्य वास किया जाता है।”


“क्या आयुष्मान, शीलविशुद्धि अनुपादापरिनिर्वाण है?”  

“नहीं, आयुष्मान।”  


“क्या आयुष्मान, चित्तविशुद्धि अनुपादापरिनिर्वाण है?”  

“नहीं, आयुष्मान।”  


“क्या आयुष्मान, दृष्टिविशुद्धि अनुपादापरिनिर्वाण है?”  

“नहीं, आयुष्मान।”  


“क्या आयुष्मान, कांक्षावितरणविशुद्धि अनुपादापरिनिर्वाण है?”  

“नहीं, आयुष्मान।”  


“क्या आयुष्मान, मार्गामार्गज्ञानदर्शनविशुद्धि अनुपादापरिनिर्वाण है?”  

“नहीं, आयुष्मान।”  


“क्या आयुष्मान, प्रतिपदाज्ञानदर्शनविशुद्धि अनुपादापरिनिर्वाण है?”  

“नहीं, आयुष्मान।”  


“क्या आयुष्मान, ज्ञानदर्शनविशुद्धि अनुपादापरिनिर्वाण है?”  

“नहीं, आयुष्मान।”  


“क्या आयुष्मान, इन धर्मों से भिन्न कोई अनुपादापरिनिर्वाण है?”  

“नहीं, आयुष्मान।”  


“‘क्या आयुष्मान, शीलविशुद्धि अनुपादापरिनिर्वाण है?’ से लेकर ‘इन धर्मों से भिन्न कोई अनुपादापरिनिर्वाण है?’ पूछने पर आप ‘नहीं, आयुष्मान’ कहते हैं। तो फिर आयुष्मान, इस भाषण का अर्थ कैसे समझना चाहिए?”

रथविनीत सुत्त

7. “आयुष्मान, यदि भगवान शीलविशुद्धि को अनुपादापरिनिर्वाण कहें, तो सउपादान को ही अनुपादापरिनिर्वाण कहेंगे। यदि चित्तविशुद्धि को… दृष्टिविशुद्धि को… कांक्षावितरणविशुद्धि को… मार्गामार्गज्ञानदर्शनविशुद्धि को… प्रतिपदाज्ञानदर्शनविशुद्धि को… ज्ञानदर्शनविशुद्धि को अनुपादापरिनिर्वाण कहें, तो सउपादान को ही अनुपादापरिनिर्वाण कहेंगे। यदि आयुष्मान, इन धर्मों से भिन्न अनुपादापरिनिर्वाण होता, तो पृथग्जन भी परिनिर्वाण प्राप्त कर लेता; क्योंकि पृथग्जन इन धर्मों से भिन्न ही है। इसलिए आयुष्मान, मैं तुम्हें एक उपमा दूँगा; उपमा से भी कुछ विज्ञ पुरुष भाषण का अर्थ समझ लेते हैं।


8. “जैसे आयुष्मान, राजा पसेनदि कोसल सावत्थी में रह रहे हों और साकेत में कोई अत्यावश्यक कार्य उत्पन्न हो। उनके लिए सावत्थी और साकेत के बीच सात रथविनीत (रथ-परिवर्तन) तैयार कर दिए जाएँ। तब आयुष्मान, राजा पसेनदि कोसल सावत्थी से निकलकर अंतःपुरद्वार से पहले रथविनीत पर चढ़ें, पहले रथविनीत से दूसरे रथविनीत तक पहुँचें, पहले को छोड़कर दूसरे पर चढ़ें। दूसरे से तीसरे तक पहुँचें, दूसरे को छोड़कर तीसरे पर चढ़ें। तीसरे से चौथे तक… चौथे से पाँचवें तक… पाँचवें से छठे तक… छठे से सातवें तक पहुँचें, छठे को छोड़कर सातवें पर चढ़ें। सातवें रथविनीत से साकेत के अंतःपुरद्वार तक पहुँच जाएँ। वहाँ पहुँचे राजा से मित्र, अमात्य, ज्ञाति और सलोहित पूछें—‘महाराज, क्या आप इसी रथविनीत से सावत्थी से साकेत अंतःपुरद्वार तक पहुँचे?’ तो आयुष्मान, राजा पसेनदि कोसल सम्यक् उत्तर देते हुए कैसे उत्तर दें?”


“आयुष्मान, राजा पसेनदि कोसल सम्यक् उत्तर देते हुए इस प्रकार उत्तर दें—‘यहाँ मुझे सावत्थी में रहते हुए साकेत में कोई अत्यावश्यक कार्य उत्पन्न हुआ। मेरे लिए सावत्थी और साकेत के बीच सात रथविनीत तैयार किए गए। तब मैं सावत्थी से निकलकर अंतःपुरद्वार से पहले रथविनीत पर चढ़ा। पहले से दूसरे तक पहुँचा, पहले को छोड़कर दूसरे पर चढ़ा। दूसरे से तीसरे तक… (यथापूर्व) … छठे से सातवें तक पहुँचा, छठे को छोड़कर सातवें पर चढ़ा। सातवें रथविनीत से साकेत अंतःपुरद्वार तक पहुँचा।’ इस प्रकार आयुष्मान, राजा पसेनदि कोसल सम्यक् उत्तर देते हुए उत्तर दें।”


“ठीक उसी प्रकार आयुष्मान, शीलविशुद्धि केवल चित्तविशुद्धि के लिए है, चित्तविशुद्धि केवल दृष्टिविशुद्धि के लिए है, दृष्टिविशुद्धि केवल कांक्षावितरणविशुद्धि के लिए है, कांक्षावितरणविशुद्धि केवल मार्गामार्गज्ञानदर्शनविशुद्धि के लिए है, मार्गामार्गज्ञानदर्शनविशुद्धि केवल प्रतिपदाज्ञानदर्शनविशुद्धि के लिए है, प्रतिपदाज्ञानदर्शनविशुद्धि केवल ज्ञानदर्शनविशुद्धि के लिए है, ज्ञानदर्शनविशुद्धि केवल अनुपादापरिनिर्वाण के लिए है। आयुष्मान, अनुपादापरिनिर्वाण के लिए ही भगवान के पास ब्रह्मचर्य वास किया जाता है।”


9. ऐसा कहे जाने पर आयुष्मान सारिपुत्र ने आयुष्मान पुण्ण मन्ताणिपुत्र से कहा—“आयुष्मान का नाम क्या है, और सब्रह्मचारी आपको कैसे जानते हैं?”  

“आयुष्मान, मेरा नाम पुण्ण है; और सब्रह्मचारी मुझे मन्ताणिपुत्र के नाम से जानते हैं।”  


“आश्चर्य है आयुष्मान! अद्भुत है आयुष्मान! जैसे सुश्रुत शिष्य शास्ता के शासन को सम्यक् जानता है, उसी प्रकार आयुष्मान पुण्ण मन्ताणिपुत्र ने गम्भीर-गम्भीर प्रश्नों का बार-बार उत्तर दिया। सब्रह्मचारियों का लाभ है, सब्रह्मचारियों का सुलभ लाभ है, जो आयुष्मान पुण्ण मन्ताणिपुत्र का दर्शन और परिचर्या पाते हैं। यदि सब्रह्मचारी आयुष्मान पुण्ण मन्ताणिपुत्र को सिर पर वस्त्र-पिण्ड लेकर घुमाते हुए भी दर्शन और परिचर्या पाएँ, तो भी उनका लाभ और सुलभ है; हमारा भी लाभ और सुलभ है, जो हम आयुष्मान पुण्ण मन्ताणिपुत्र का दर्शन और परिचर्या पाते हैं।”


ऐसा कहे जाने पर आयुष्मान पुण्ण मन्ताणिपुत्र ने आयुष्मान सारिपुत्र से कहा—“आयुष्मान का नाम क्या है, और सब्रह्मचारी आपको कैसे जानते हैं?”  

“आयुष्मान, मेरा नाम उपतिस्स है; और सब्रह्मचारी मुझे सारिपुत्र के नाम से जानते हैं।”  


“शास्ता के समान शिष्य के साथ वार्तालाप करते हुए भी हम नहीं जान पाए कि ‘यह आयुष्मान सारिपुत्र हैं’। यदि हम जानते कि ‘यह आयुष्मान सारिपुत्र हैं’, तो इतना भी नहीं बोलते। आश्चर्य है आयुष्मान! अद्भुत है आयुष्मान! जैसे सुश्रुत शिष्य शास्ता के शासन को सम्यक् जानता है, उसी प्रकार आयुष्मान सारिपुत्र ने गम्भीर-गम्भीर प्रश्नों को बार-बार पूछा। सब्रह्मचारियों का लाभ है, सब्रह्मचारियों का सुलभ लाभ है, जो आयुष्मान सारिपुत्र का दर्शन और परिचर्या पाते हैं। यदि सब्रह्मचारी आयुष्मान सारिपुत्र को सिर पर वस्त्र-पिण्ड लेकर घुमाते हुए भी दर्शन और परिचर्या पाएँ, तो भी उनका लाभ और सुलभ है; हमारा भी लाभ और सुलभ है, जो हम आयुष्मान सारिपुत्र का दर्शन और परिचर्या पाते हैं।”


इस प्रकार वे दोनों महामातंग एक-दूसरे के सुभाषित का अनुमोदन करते रहे।


रथविनीत सुत्त समाप्त

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