3. वम्मिकसुत्त

Dhamma Skandha
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 वम्मिकसुत्त


मैंने इस प्रकार सुना—एक समय भगवान् श्रावस्ती में जेतवन अनाथपिण्डिक के आराम में विहार कर रहे थे। उस समय आयुष्मान् कुमारकाश्यप अन्धवन में विहार कर रहे थे। तब एक देवता रात्रि के बीतने पर अत्यन्त सुन्दर रूप धारण कर समस्त अन्धवन को प्रकाशमान करते हुए आयुष्मान् कुमारकाश्यप के पास आए, पास जाकर एक ओर खड़े हो गए। एक ओर खड़े होकर उस देवता ने आयुष्मान् कुमारकाश्यप से कहा—


“भिक्षु! भिक्षु! यह वम्मिक रात में धुआँ छोड़ता है और दिन में जलता है। ब्राह्मण ऐसा कहता है—‘खोदो, सुमेध! शस्त्र लेकर।’ खोदते हुए सुमेध ने शस्त्र लेकर एक लङ्गी देखी। ‘लङ्गी, भदन्त!’ ब्राह्मण ने कहा—‘लङ्गी को उठा फेंको; खोदो, सुमेध! शस्त्र लेकर।’ खोदते हुए सुमेध ने शस्त्र लेकर एक उद्धुमायिका देखी। ‘उद्धुमायिका, भदन्त!’ ब्राह्मण ने कहा—‘उद्धुमायिका को उठा फेंको; खोदो, सुमेध! शस्त्र लेकर।’ खोदते हुए सुमेध ने शस्त्र लेकर एक द्विधापथ देखा। ‘द्विधापथ, भदन्त!’ ब्राह्मण ने कहा—‘द्विधापथ को उठा फेंको; खोदो, सुमेध! शस्त्र लेकर।’ खोदते हुए सुमेध ने शस्त्र लेकर एक चङ्गवार देखा। ‘चङ्गवार, भदन्त!’ ब्राह्मण ने कहा—‘चङ्गवार को उठा फेंको; खोदो, सुमेध! शस्त्र लेकर।’ खोदते हुए सुमेध ने शस्त्र लेकर एक कूर्म देखा। ‘कूर्म, भदन्त!’ ब्राह्मण ने कहा—‘कूर्म को उठा फेंको; खोदो, सुमेध! शस्त्र लेकर।’ खोदते हुए सुमेध ने शस्त्र लेकर एक असिसूना देखी। ‘असिसूना, भदन्त!’ ब्राह्मण ने कहा—‘असिसूना को उठा फेंको; खोदो, सुमेध! शस्त्र लेकर।’ खोदते हुए सुमेध ने शस्त्र लेकर एक मांसपेशी देखी। ‘मांसपेशी, भदन्त!’ ब्राह्मण ने कहा—‘मांसपेशी को उठा फेंको; खोदो, सुमेध! शस्त्र लेकर।’ खोदते हुए सुमेध ने शस्त्र लेकर एक नाग देखा। ‘नाग, भदन्त!’ ब्राह्मण ने कहा—‘नाग रहने दो, नाग को मत छेड़ो; नाग को नमस्कार करो।’”


“इन प्रश्नों को तुम भिक्षु! भगवान् के पास जाकर पूछो, और जैसा भगवान् उत्तर दें वैसा ही धारण करो। मैं इस देव-लोक, मार-लोक, ब्रह्म-लोक में, श्रमण-ब्राह्मणों सहित प्रजा में, देव-मनुष्यों सहित इस लोक में किसी को नहीं देखता जो इन प्रश्नों का समाधान करके चित्त को सन्तुष्ट कर सके, सिवाय तथागत के या तथागत के श्रावक के, या उनसे सुनकर।” —यह कहकर वह देवता वहीं अन्तर्धान हो गई।


तब आयुष्मान् कुमारकाश्यप उस रात्रि के बीतने पर भगवान् के पास गए, पास जाकर भगवान् को अभिवादन कर एक ओर बैठ गए। एक ओर बैठकर आयुष्मान् कुमारकाश्यप ने भगवान् से कहा—“भन्ते! आज रात एक देवता रात्रि के बीतने पर अत्यन्त सुन्दर रूप धारण कर समस्त अन्धवन को प्रकाशमान करते हुए मेरे पास आई, पास जाकर एक ओर खड़ी हो गई। एक ओर खड़ी होकर भन्ते! उस देवता ने मुझसे कहा—‘भिक्षु! भिक्षु! यह वम्मिक रात में धुआँ छोड़ता है और दिन में जलता है।’ ब्राह्मण ऐसा कहता है—‘खोदो, सुमेध! शस्त्र लेकर।’ ... (पूरा वर्णन दोहराया) ... ‘या उनसे सुनकर।’ यह कहकर भन्ते! वह देवता वहीं अन्तर्धान हो गई। भन्ते! वम्मिक क्या है? रात में धुआँ छोड़ना क्या है? दिन में जलना क्या है? ब्राह्मण कौन है? सुमेध कौन है? शस्त्र क्या है? खोदना क्या है? लङ्गी क्या है? उद्धुमायिका क्या है? द्विधापथ क्या है? चङ्गवार क्या है? कूर्म क्या है? असिसूना क्या है? मांसपेशी क्या है? नाग कौन है?”


भगवान् ने कहा—


“भिक्षु! ‘वम्मिक’ यह चार महाभूतों से बने, माता-पिता से उत्पन्न, ओदन-कुम्मास से पुष्ट, अनित्य, मर्दन, भेदन और विनाश-धर्म वाले इस शरीर का नाम है।

वम्मिकसुत्त

भिक्षु! जो दिन में कर्मों को आरम्भ करके रात में अनुचिन्तन और अनुविचार करता है—यह रात में धुआँ छोड़ना है। जो रात में अनुचिन्तन और अनुविचार करके दिन में काय, वाणी या मन से कर्मों में प्रवृत्त होता है—यह दिन में जलना है।


भिक्षु! ‘ब्राह्मण’ यह तथागत, अर्हत्, सम्यक् सम्बुद्ध का नाम है। ‘सुमेध’ यह शैक्ष भिक्षु का नाम है।


भिक्षु! ‘शस्त्र’ यह आर्य प्रज्ञा का नाम है। ‘खोदना’ यह वीर्यारम्भ का नाम है।


भिक्षु! ‘लङ्गी’ यह अविद्या का नाम है। लङ्गी को उठा फेंको, अविद्या का परित्याग करो; खोदो, सुमेध! शस्त्र लेकर—इसका यही अर्थ है।


भिक्षु! ‘उद्धुमायिका’ यह क्रोध-उपायास का नाम है। उद्धुमायिका को उठा फेंको, क्रोध-उपायास का परित्याग करो; खोदो, सुमेध! शस्त्र लेकर—इसका यही अर्थ है।


भिक्षु! ‘द्विधापथ’ यह विचिकित्सा का नाम है। द्विधापथ को उठा फेंको, विचिकित्सा का परित्याग करो; खोदो, सुमेध! शस्त्र लेकर—इसका यही अर्थ है।


भिक्षु! ‘चङ्गवार’ यह पाँच नीवरणों का नाम है—कामच्छन्द नीवरण, व्यापाद नीवरण, स्त्यानमिद्ध नीवरण, औद्धत्य-कौकृत्य नीवरण और विचिकित्सा नीवरण। चङ्गवार को उठा फेंको, पाँच नीवरणों का परित्याग करो; खोदो, सुमेध! शस्त्र लेकर—इसका यही अर्थ है।


भिक्षु! ‘कूर्म’ यह पाँच उपादानस्कन्धों का नाम है—रूप-उपादानस्कन्ध, वेदना-उपादानस्कन्ध, संज्ञा-उपादानस्कन्ध, संस्कार-उपादानस्कन्ध और विज्ञान-उपादानस्कन्ध। कूर्म को उठा फेंको, पाँच उपादानस्कन्धों का परित्याग करो; खोदो, सुमेध! शस्त्र लेकर—इसका यही अर्थ है।


भिक्षु! ‘असिसूना’ यह पाँच कामगुणों का नाम है—चक्षु-विज्ञेय रूप जो इष्ट, कान्त, मनाप, प्रियरूप, काम-उपसंहित और रजनीय हैं; श्रोत्र-विज्ञेय शब्द...; घ्राण-विज्ञेय गन्ध...; जिह्वा-विज्ञेय रस...; काय-विज्ञेय स्प्रष्टव्य जो इष्ट, कान्त, मनाप, प्रियरूप, काम-उपसंहित और रजनीय हैं। असिसूना को उठा फेंको, पाँच कामगुणों का परित्याग करो; खोदो, सुमेध! शस्त्र लेकर—इसका यही अर्थ है।


भिक्षु! ‘मांसपेशी’ यह नन्दीराग का नाम है। मांसपेशी को उठा फेंको, नन्दीराग का परित्याग करो; खोदो, सुमेध! शस्त्र लेकर—इसका यही अर्थ है।


भिक्षु! ‘नाग’ यह क्षीणास्रव भिक्षु का नाम है। नाग रहने दो, नाग को मत छेड़ो; नाग को नमस्कार करो—इसका यही अर्थ है।”


यह भगवान् ने कहा। आयुष्मान् कुमारकाश्यप भगवान् के भाषण से प्रसन्न हुए।


वम्मिकसुत्त समाप्त

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