1. इस प्रकार मैंने सुना—एक समय भगवान् सावत्थि नगर में जेतवन उद्यान के अनाथपिण्डिक के आश्रम में ठहर रहे थे। वहाँ भगवान् ने भिक्षुओं को बुलाया—“भिक्षुओं!” “भदन्त!” वे भिक्षु भगवान् के सम्मति से उत्तर देते हुए बोले। भगवान् ने कहा—
“भिक्षुओं! जैसे कोई मैलयुक्त, मैलग्रस्त वस्त्र हो; यदि रंगरेज उसे किसी भी रंग के प्रकार में ले जाए—नील रंग, पीला रंग, लाल रंग, या मंजिष्ठ रंग—तो भी उसका रंग दुर्गम ही रहेगा, अपरिष्कृत रंग ही रहेगा। क्यों? क्योंकि, भिक्षुओं! वस्त्र की अपरिष्कृति के कारण। इसी प्रकार, भिक्षुओं! मैलयुक्त चित्त में दुर्गति अपेक्षित है। भिक्षुओं! जैसे कोई शुद्ध, प्रकाशित वस्त्र हो; यदि रंगरेज उसे किसी भी रंग के प्रकार में ले जाए—नील रंग, पीला रंग, लाल रंग, या मंजिष्ठ रंग—तो उसका रंग सुंदर ही रहेगा, शुद्ध रंग ही रहेगा। क्यों? क्योंकि, भिक्षुओं! वस्त्र की शुद्धि के कारण। इसी प्रकार, भिक्षुओं! अकलुषित चित्त में सुगति अपेक्षित है।”
2. “भिक्षुओं! चित्त के कौन से उपकलुषक (दोष) हैं? लोभ-विशमलोभ चित्त का उपकलुषक है, द्वेष चित्त का उपकलुषक है, क्रोध चित्त का उपकलुषक है, उपनाह (ईर्ष्या) चित्त का उपकलुषक है, मक्ख (अभिमान) चित्त का उपकलुषक है, पलास (धोखा) चित्त का उपकलुषक है, इस्सा (ईर्ष्या) चित्त का उपकलुषक है, मत्सर्य (कृपणता) चित्त का उपकलुषक है, माया (छल) चित्त का उपकलुषक है, सठेय्य (कपट) चित्त का उपकलुषक है, थम्ब (अभिमान) चित्त का उपकलुषक है, सारम्भ (उत्तेजना) चित्त का उपकलुषक है, मान (अहंकार) चित्त का उपकलुषक है, अतिमान (अतिअहंकार) चित्त का उपकलुषक है, मद (मोह) चित्त का उपकलुषक है, प्रमाद (लापरवाही) चित्त का उपकलुषक है।”
3. “भिक्षुओं! वह भिक्षु ‘लोभ-विशमलोभ चित्त का उपकलुषक है’—इस प्रकार जानकर लोभ-विशमलोभ को चित्त के उपकलुषक के रूप में त्याग देता है; ‘द्वेष चित्त का उपकलुषक है’—इस प्रकार जानकर द्वेष को चित्त के उपकलुषक के रूप में त्याग देता है; ‘क्रोध चित्त का उपकलुषक है’—इस प्रकार जानकर क्रोध को चित्त के उपकलुषक के रूप में त्याग देता है; ‘उपनाह चित्त का उपकलुषक है’—इस प्रकार जानकर उपनाह को चित्त के उपकलुषक के रूप में त्याग देता है; ‘मक्ख चित्त का उपकलुषक है’—इस प्रकार जानकर मक्ख को चित्त के उपकलुषक के रूप में त्याग देता है; ‘पलास चित्त का उपकलुषक है’—इस प्रकार जानकर पलास को चित्त के उपकलुषक के रूप में त्याग देता है; ‘इस्सा चित्त का उपकलुषक है’—इस प्रकार जानकर इस्सा को चित्त के उपकलुषक के रूप में त्याग देता है; ‘मत्सर्य चित्त का उपकलुषक है’—इस प्रकार जानकर मत्सर्य को चित्त के उपकलुषक के रूप में त्याग देता है; ‘माया चित्त का उपकलुषक है’—इस प्रकार जानकर माया को चित्त के उपकलुषक के रूप में त्याग देता है; ‘सठेय्य चित्त का उपकलुषक है’—इस प्रकार जानकर सठेय्य को चित्त के उपकलुषक के रूप में त्याग देता है; ‘थम्ब चित्त का उपकलुषक है’—इस प्रकार जानकर थम्ब को चित्त के उपकलुषक के रूप में त्याग देता है; ‘सारम्भ चित्त का उपकलुषक है’—इस प्रकार जानकर सारम्भ को चित्त के उपकलुषक के रूप में त्याग देता है; ‘मान चित्त का उपकलुषक है’—इस प्रकार जानकर मान को चित्त के उपकलुषक के रूप में त्याग देता है; ‘अतिमान चित्त का उपकलुषक है’—इस प्रकार जानकर अतिमान को चित्त के उपकलुषक के रूप में त्याग देता है; ‘मद चित्त का उपकलुषक है’—इस प्रकार जानकर मद को चित्त के उपकलुषक के रूप में त्याग देता है; ‘प्रमाद चित्त का उपकलुषक है’—इस प्रकार जानकर प्रमाद को चित्त के उपकलुषक के रूप में त्याग देता है।”
4. “भिक्षुओं! जब किसी भिक्षु को ‘लोभ-विशमलोभ चित्त का उपकलुषक है’—इस प्रकार जानकर लोभ-विशमलोभ चित्त का उपकलुषक त्याग दिया जाता है, ‘द्वेष चित्त का उपकलुषक है’—इस प्रकार जानकर द्वेष चित्त का उपकलुषक त्याग दिया जाता है; ‘क्रोध चित्त का उपकलुषक है’—इस प्रकार जानकर क्रोध चित्त का उपकलुषक त्याग दिया जाता है; ‘उपनाह चित्त का उपकलुषक है’—इस प्रकार जानकर उपनाह चित्त का उपकलुषक त्याग दिया जाता है; ‘मक्ख चित्त का उपकलुषक है’—इस प्रकार जानकर मक्ख चित्त का उपकलुषक त्याग दिया जाता है; ‘पलास चित्त का उपकलुषक है’—इस प्रकार जानकर पलास चित्त का उपकलुषक त्याग दिया जाता है; ‘इस्सा चित्त का उपकलुषक है’—इस प्रकार जानकर इस्सा चित्त का उपकलुषक त्याग दिया जाता है; ‘मत्सर्य चित्त का उपकलुषक है’—इस प्रकार जानकर मत्सर्य चित्त का उपकलुषक त्याग दिया जाता है; ‘माया चित्त का उपकलुषक है’—इस प्रकार जानकर माया चित्त का उपकलुषक त्याग दिया जाता है; ‘सठेय्य चित्त का उपकलुषक है’—इस प्रकार जानकर सठेय्य चित्त का उपकलुषक त्याग दिया जाता है; ‘थम्ब चित्त का उपकलुषक है’—इस प्रकार जानकर थम्ब चित्त का उपकलुषक त्याग दिया जाता है; ‘सारम्भ चित्त का उपकलुषक है’—इस प्रकार जानकर सारम्भ चित्त का उपकलुषक त्याग दिया जाता है; ‘मान चित्त का उपकलुषक है’—इस प्रकार जानकर मान चित्त का उपकलुषक त्याग दिया जाता है; ‘अतिमान चित्त का उपकलुषक है’—इस प्रकार जानकर अतिमान चित्त का उपकलुषक त्याग दिया जाता है; ‘मद चित्त का उपकलुषक है’—इस प्रकार जानकर मद चित्त का उपकलुषक त्याग दिया जाता है; ‘प्रमाद चित्त का उपकलुषक है’—इस प्रकार जानकर प्रमाद चित्त का उपकलुषक त्याग दिया जाता है।”
5. “वह बुद्ध में अनवेकल्ल प्रसन्न विश्वास से सम्पन्न होता है—‘यह भगवान् अर्हत् हैं, सम्यक्-संबुद्ध, ज्ञान-चर्या में सम्पन्न, सुगत, लोक-विदू, अनुत्तर पुरुष-दम्म-सारथि, देव-मनुष्यों के सिद्ध, बुद्ध, भगवान्’; धम्म में अनवेकल्ल प्रसन्न विश्वास से सम्पन्न होता है—‘भगवान् द्वारा सुसंकेट धम्म, प्रत्यक्ष दर्शन योग्य, कालातीत, ईहापस्सिक, स्वयं-प्रमाण करने योग्य, प्रज्ञावान् द्वारा प्रत्यक्ष जानने योग्य’; संघ में अनवेकल्ल प्रसन्न विश्वास से सम्पन्न होता है—‘भगवान् के शिष्य-संघ सु-प्रतिपन्न है, उजु-प्रतिपन्न है, ञेय-प्रतिपन्न है, सामीचि-प्रतिपन्न है, अर्थात् चार पुरुष-युग, आठ पुरुष-पुंगव। यह भगवान् का शिष्य-संघ अहुणे-worthy, पाहुणे-worthy, दक्खिणे-worthy, अञ्जलि-कर-योग्य, संसार के अनुत्तर पुण्य-क्षेत्र’।”
6. “जैसे उसके चित्त की धारणा होती है—वह मुक्त है, त्यागी हुई, निस्सृत, निर्भर-रहित—वैसे ही वह ‘मैं बुद्ध में अनवेकल्ल प्रसन्न विश्वास से सम्पन्न हूँ’ ऐसा जानकर अर्थ-वेदना प्राप्त करता है, धम्म-वेदना प्राप्त करता है, धम्म से संनादित आनंद प्राप्त करता है। आनंदित होने पर प्रीति उत्पन्न होती है, प्रीति मन वाले का शरीर शिथिल होता है, शिथिल शरीर सुख का अनुभव करता है, सुखी का चित्त एकाग्र होता है। ‘धम्म में... (इत्यादि)... संघ में अनवेकल्ल प्रसन्न विश्वास से सम्पन्न हूँ’ ऐसा जानकर अर्थ-वेदना प्राप्त करता है, धम्म-वेदना प्राप्त करता है, धम्म से संनादित आनंद प्राप्त करता है; आनंदित होने पर प्रीति उत्पन्न होती है, प्रीति मन वाले का शरीर शिथिल होता है, शिथिल शरीर सुख का अनुभव करता है, सुखी का चित्त एकाग्र होता है। ‘मेरा चित्त मुक्त है, त्यागी हुआ, निस्सृत, निर्भर-रहित’ ऐसा जानकर अर्थ-वेदना प्राप्त करता है, धम्म-वेदना प्राप्त करता है, धम्म से संनादित आनंद प्राप्त करता है; आनंदित होने पर प्रीति उत्पन्न होती है, प्रीति मन वाले का शरीर शिथिल होता है, शिथिल शरीर सुख का अनुभव करता है, सुखी का चित्त एकाग्र होता है।”
7. “भिक्षुओं! वह भिक्षु इस प्रकार शीलवान, इस प्रकार धम्मवान, इस प्रकार प्रज्ञावान, यदि चावल का भोजन खाए, विविध रंगीन दालें, अनेक सूप, अनेक व्यंजन, तो भी उसके लिए वह बाधा नहीं बनता। भिक्षुओं! जैसे मैलयुक्त, मैलग्रस्त वस्त्र शुद्ध जल से प्राप्त होकर शुद्ध हो जाता है, प्रकाशित हो जाता है, या सोना ऊपरी भाग प्राप्त होकर शुद्ध हो जाता है, प्रकाशित हो जाता है, इसी प्रकार, भिक्षुओं! भिक्षु इस प्रकार शीलवान, इस प्रकार धम्मवान, इस प्रकार प्रज्ञावान, यदि चावल का भोजन खाए, विविध रंगीन दालें, अनेक सूप, अनेक व्यंजन, तो भी उसके लिए वह बाधा नहीं बनता।”
७७. “वह मैत्री-सहित चित्त से एक दिशा की ओर प्रसारित होकर रहता है, इसी प्रकार दूसरी, इसी प्रकार तीसरी, इसी प्रकार चौथी। इस प्रकार ऊपर-नीचे, पार्श्व, सर्वत्र, सर्वथा, सर्वावस्थित लोक को मैत्री-सहित चित्त से व्यापक, विस्तृत, अपरिमित, अराग, अद्वेष प्रसारित होकर रहता है; करुणा-सहित चित्त से... (इत्यादि)... मुदिता-सहित चित्त से... (इत्यादि)... उपेक्षा-सहित चित्त से एक दिशा की ओर प्रसारित होकर रहता है, इसी प्रकार दूसरी, इसी प्रकार तीसरी, इसी प्रकार चौथी। इस प्रकार ऊपर-नीचे, पार्श्व, सर्वत्र, सर्वथा, सर्वावस्थित लोक को उपेक्षा-सहित चित्त से व्यापक, विस्तृत, अपरिमित, अराग, अद्वेष प्रसारित होकर रहता है।”
8. “वह जानता है—‘यह है, यह हीन है, यह उत्तम है, इस संज्ञा वाले के लिए इससे आगे निस्सरण है।’ उसके इस प्रकार जानने पर, देखने पर काम-आस्रव भी चित्त मुक्त होता है, भव-आस्रव भी चित्त मुक्त होता है, अज्ञान-आस्रव भी चित्त मुक्त होता है। मुक्त में ‘मुक्त है’ ऐसा ज्ञान होता है। ‘निरोधित है जन्म, पूर्ण किया गया ब्रह्मचर्य, किया गया करना योग्य, इससे आगे इस जीवन का कुछ नहीं’ ऐसा जानता है। भिक्षुओं! उसे ही कहते हैं—‘भिक्षु स्नान कर चुका है, स्नान के बीच में।’”
9. उस समय सुन्दरिकभारद्वाज ब्राह्मण भगवान् से थोड़ी दूरी पर बैठा था। तब सुन्दरिकभारद्वाज ब्राह्मण ने भगवान् से कहा—“क्या हे गोतम! बहुका नदी में स्नान करने जाते हैं?” “ब्राह्मण! बहुका नदी क्या करेगी?” “हे गोतम! बहुका नदी लोक-सम्मत है बहुजनों के लिए, पुण्य-सम्मत है हे गोतम! बहुका नदी बहुजनों के लिए, बहुका नदी में ही बहुजन अपने पापकर्म बहा ले जाते हैं।” तब भगवान् ने सुन्दरिकभारद्वाज ब्राह्मण को गाथाओं से संबोधित किया—
“बहुका अधिकक्क, गय, सुन्दरिक, पयागा भी।
सरस्सती और बहुमति नदी भी।
नित्य बाल ही प्रवेश करता है, काले कर्म वाला शुद्ध नहीं होता॥
“सुन्दरिका क्या करेगी, पयागा क्या, बहुका नदी क्या।
वैर करने वाले पापी पुरुष को, वह पापकर्मी को शुद्ध नहीं करेगी॥
“शुद्ध का ही सदा फल है, शुद्ध का उपवास सदा।
शुद्ध के सुकर्म का, व्रत सदा ही संपन्न होता है।
यहाँ ही स्नान करो ब्राह्मण, समस्त प्राणियों के प्रति करो रक्षा॥
“यदि झूठ न बोलो, यदि प्राणी न मारा।
यदि चोरी न की, यदि विश्वासी अकृपण।
गया जाकर क्या करोगे, कुएँ का पानी भी तेरे लिए गया।”
10. इस प्रकार कहने पर सुन्दरिकभारद्वाज ब्राह्मण ने भगवान् से कहा—“अति उत्तम है, हे गोतम! अति उत्तम है, हे गोतम! जैसे, हे गोतम! संकुचित को फैलाएँ, ढके हुए को खोलें, भूले हुए को मार्ग दिखाएँ, अंधकार में तेल का दीपक धारण करें—‘चक्षु वाले रूप देखें’; वैसे ही हे गोतम! के द्वारा अनेक प्रकारों से धम्म प्रकाशित है। मैं भवन्तं गोतम को शरण जाता हूँ, धम्म को और भिक्षु-संगह को। कदाचित् मैं भोते गोतम के पास पब्बज्जा प्राप्त करूँ, उपसम्पदा प्राप्त करूँ।” सुन्दरिकभारद्वाज ब्राह्मण को भगवान् के पास न तो पब्बज्जा मिली, न उपसम्पदा। किंतु शीघ्र ही सम्मानित भारद्वाज एकांत में रहकर, अप्रमत्त, उत्साही, संकल्पशील होकर—जिस प्रयोजन के लिए कुलपुत्र सम्यक् गृहस्थ जीवन त्यागकर भिक्षु बनते हैं, उस अनुत्तर प्रयोजन—ब्रह्मचर्य का परिसमाप्ति, वर्तमान में स्वयं प्रत्यक्ष जानकर प्रमाण करके प्राप्त करके रहा। “निरोधित है जन्म, पूर्ण किया गया ब्रह्मचर्य, किया गया करना योग्य, इससे आगे इस जीवन का कुछ नहीं” ऐसा प्रत्यक्ष जान लिया। सम्मानित भारद्वाज में से एक अर्हत् हो गया।
वत्थ (वस्त्र) सुत्त समाप्त