6. आकाङ्क्षेय्यसुत्त

Dhamma Skandha
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1. इस प्रकार मैंने सुना—एक समय भगवान् सावत्थि नगर में जेतवन उद्यान के अनाथपिण्डिक के आश्रम में ठहर रहे थे। वहाँ भगवान् ने भिक्षुओं को बुलाया—“भिक्षुओं!” “भदन्त!” वे भिक्षु भगवान् के सम्मति से उत्तर देते हुए बोले। भगवान् ने कहा—

“भिक्षुओं! पूर्ण शील वाले रहें, पूर्ण प्रातिमोक्ष संवरे वाले; प्रातिमोक्ष संवरण से संयुक्त रहें, आचार-व्यवहार में सम्पन्न, सूक्ष्म दोषों में भय रखने वाले; ग्रहण करके शील के नियमों का पालन करें।

2. यदि, भिक्षुओं! कोई भिक्षु इच्छा करे—‘मैं सह-ब्रह्मचारीयों के लिए प्रिय और मनोहर होऊँ, आदरणीय और सम्माननीय’ तो उसे शीलों में ही पूर्णतापूर्वक रहना चाहिए, अंतर्मन में चित्त की शांति का अनुसरण करना चाहिए, ध्यान को निरंतर रखना चाहिए, विपश्यना से सम्पन्न होकर, खाली झोपड़ियों में भ्रमण करना चाहिए।

यदि, भिक्षुओं! कोई भिक्षु इच्छा करे—‘मैं वस्त्र, भिक्षा-भोजन, निवास-स्थान, औषधि-सामग्री का लाभी बनूँ’ तो उसे शीलों में ही पूर्णतापूर्वक रहना चाहिए, अंतर्मन में चित्त की शांति का अनुसरण करना चाहिए, ध्यान को निरंतर रखना चाहिए, विपश्यना से सम्पन्न होकर, खाली झोपड़ियों में भ्रमण करना चाहिए।

यदि, भिक्षुओं! कोई भिक्षु इच्छा करे—‘जिनके वस्त्र, भिक्षा-भोजन, निवास-स्थान, औषधि-सामग्री का मैं उपभोग करता हूँ, उनके लिए वे कर्म महाफलदायी हों, महान् पुण्यप्रद’ तो उसे शीलों में ही पूर्णतापूर्वक रहना चाहिए, अंतर्मन में चित्त की शांति का अनुसरण करना चाहिए, ध्यान को निरंतर रखना चाहिए, विपश्यना से सम्पन्न होकर, खाली झोपड़ियों में भ्रमण करना चाहिए।

यदि, भिक्षुओं! कोई भिक्षु इच्छा करे—‘जो मेरे नाते-रिश्तेदार, मित्र, सगे-संबंधी, प्रियजन प्रसन्नचित्त होकर स्मरण करते हैं, उनके लिए वह महाफलदायी हो, महान् पुण्यप्रद’ तो उसे शीलों में ही पूर्णतापूर्वक रहना चाहिए, अंतर्मन में चित्त की शांति का अनुसरण करना चाहिए, ध्यान को निरंतर रखना चाहिए, विपश्यना से सम्पन्न होकर, खाली झोपड़ियों में भ्रमण करना चाहिए।

3. यदि, भिक्षुओं! कोई भिक्षु इच्छा करे—‘मैं विरक्ति-सहिष्णु बनूँ, विरक्ति मुझे न सहन करनी पड़े, उत्पन्न विरक्ति को जीतकर, जीतकर रहूँ’ तो उसे शीलों में ही पूर्णतापूर्वक रहना चाहिए... (इत्यादि)... खाली झोपड़ियों में भ्रमण करना चाहिए।

यदि, भिक्षुओं! कोई भिक्षु इच्छा करे—‘मैं भय-भयंकर-सहिष्णु बनूँ, भय-भयंकर मुझे न सहन करना पड़े, उत्पन्न भय-भयंकर को जीतकर, जीतकर रहूँ’ तो उसे शीलों में ही पूर्णतापूर्वक रहना चाहिए... (इत्यादि)... खाली झोपड़ियों में भ्रमण करना चाहिए।

यदि, भिक्षुओं! कोई भिक्षु इच्छा करे—‘मैं चार ध्यानों के, चित्त के आनंदपूर्ण, वर्तमान सुख-विहार के अनुकूल लाभी बनूँ, कष्टरहित लाभी, असंभव लाभी’ तो उसे शीलों में ही पूर्णतापूर्वक रहना चाहिए... (इत्यादि)... खाली झोपड़ियों में भ्रमण करना चाहिए।

यदि, भिक्षुओं! कोई भिक्षु इच्छा करे—‘जो वे रूपातीत, अरूप ध्यान के विमोक्ष हैं, उनमें शरीर से प्रत्यक्ष अनुभव करके रहूँ’ तो उसे शीलों में ही पूर्णतापूर्वक रहना चाहिए... (इत्यादि)... खाली झोपड़ियों में भ्रमण करना चाहिए।
4. यदि, भिक्षुओं! कोई भिक्षु इच्छा करे—‘तीन संयोजनों के क्षय से मैं स्रोतापत्ति फल प्राप्त करूँ, अविनिपात धर्म वाला, निश्चित, बोधि का आश्रय’ तो उसे शीलों में ही पूर्णतापूर्वक रहना चाहिए... (इत्यादि)... खाली झोपड़ियों में भ्रमण करना चाहिए।

यदि, भिक्षुओं! कोई भिक्षु इच्छा करे—‘तीन संयोजनों के क्षय से, राग-द्वेष-मोह की क्षीणता से मैं सकदागामी बनूँ, एक बार इस लोक में आकर दुःख का अन्त करूँ’ तो उसे शीलों में ही पूर्णतापूर्वक रहना चाहिए... (इत्यादि)... खाली झोपड़ियों में भ्रमण करना चाहिए।

यदि, भिक्षुओं! कोई भिक्षु इच्छा करे—‘पाँच ओरम्भागीय संयोजनों के क्षय से मैं उद्धान्सोत प्राप्त करूँ, वहाँ परिनिर्वाण प्राप्त करने वाला, तस्मात् लोक से अनावृत्ति धर्म वाला’ तो उसे शीलों में ही पूर्णतापूर्वक रहना चाहिए... (इत्यादि)... खाली झोपड़ियों में भ्रमण करना चाहिए।

5. यदि, भिक्षुओं! कोई भिक्षु इच्छा करे—‘मैं अनेक प्रकार की ऋद्धि का प्रत्यक्ष अनुभव करूँ—एक होकर अनेक हो जाऊँ, अनेक होकर एक हो जाऊँ; प्रकट और अप्रकट हो जाऊँ; दीवार, बाड़ा, पहाड़ को पार करके बिना रुकावट जाऊँ, जैसे आकाश में; पृथ्वी को डुबोकर उभारूँ, जैसे जल में; जल में डूबे हुए चलूँ, जैसे पृथ्वी पर; आकाश में पद्मासन में चलूँ, जैसे पक्षी; इन चंद्रमा-सूर्य को, इतने महान् बलशाली, महान् प्रभावशाली को हाथ से स्पर्श करूँ, सहलाऊँ; ब्रह्मलोक तक शरीर से जाकर निवास करूँ’ तो उसे शीलों में ही पूर्णतापूर्वक रहना चाहिए... (इत्यादि)... खाली झोपड़ियों में भ्रमण करना चाहिए।

यदि, भिक्षुओं! कोई भिक्षु इच्छा करे—‘दिव्य श्रोत्र-धातु से शुद्ध, मानुष्य श्रोत्र से श्रेष्ठ, दोनों पक्षों के शब्द सुनूँ—दिव्य और मानवीय, दूर के और निकट के’ तो उसे शीलों में ही पूर्णतापूर्वक रहना चाहिए... (इत्यादि)... खाली झोपड़ियों में भ्रमण करना चाहिए।

यदि, भिक्षुओं! कोई भिक्षु इच्छा करे—‘पर प्राणियों, पर व्यक्तियों के चित्त को चित्त से प्रत्यक्ष जानूँ—रागयुक्त चित्त को ‘रागयुक्त चित्त है’ जानूँ, विरक्त चित्त को ‘विरक्त चित्त है’ जानूँ; द्वेषयुक्त चित्त को ‘द्वेषयुक्त चित्त है’ जानूँ, निर्वेष चित्त को ‘निर्वेष चित्त है’ जानूँ; मोहयुक्त चित्त को ‘मोहयुक्त चित्त है’ जानूँ, विमोह चित्त को ‘विमोह चित्त है’ जानूँ; संकुचित चित्त को ‘संकुचित चित्त है’ जानूँ, विक्षिप्त चित्त को ‘विक्षिप्त चित्त है’ जानूँ; विस्तृत चित्त को ‘विस्तृत चित्त है’ जानूँ, अविस्तृत चित्त को ‘अविस्तृत चित्त है’ जानूँ; परम चित्त को ‘परम चित्त है’ जानूँ, अपरम चित्त को ‘अपरम चित्त है’ जानूँ; संयमित चित्त को ‘संयमित चित्त है’ जानूँ, असंयमित चित्त को ‘असंयमित चित्त है’ जानूँ; मुक्त चित्त को ‘मुक्त चित्त है’ जानूँ, अमुक्त चित्त को ‘अमुक्त चित्त है’ जानूँ’ तो उसे शीलों में ही पूर्णतापूर्वक रहना चाहिए... (इत्यादि)... खाली झोपड़ियों में भ्रमण करना चाहिए।

यदि, भिक्षुओं! कोई भिक्षु इच्छा करे—‘मैं अनेक प्रकार के पूर्वजन्मों का स्मरण करूँ, जैसे—एक जन्म, दो जन्म, तीन जन्म, चार जन्म, पाँच जन्म, दस जन्म, बीस जन्म, तीस जन्म, चालीस जन्म, पचास जन्म, सौ जन्म, हजार जन्म, लाख जन्म, अनेक संकुचित-कल्पों में, अनेक विस्तारित-कल्पों में, अनेक संकुचित-विस्तारित-कल्पों में—‘वहाँ मैं ऐसा नाम वाला, ऐसा वंश वाला, ऐसा रूप वाला, ऐसा भोजन वाला, ऐसा सुख-दुःख अनुभव करने वाला, ऐसा आयु-सीमा वाला था, वहाँ से मरकर वहाँ उत्पन्न हुआ; वहाँ मैं ऐसा नाम वाला, ऐसा वंश वाला, ऐसा रूप वाला, ऐसा भोजन वाला, ऐसा सुख-दुःख अनुभव करने वाला, ऐसा आयु-सीमा वाला था, वहाँ से मरकर यहाँ उत्पन्न हुआ।’ इस प्रकार साकार और संकेतित अनेक प्रकार के पूर्वजन्मों का स्मरण करूँ’ तो उसे शीलों में ही पूर्णतापूर्वक रहना चाहिए... (इत्यादि)... खाली झोपड़ियों में भ्रमण करना चाहिए।

यदि, भिक्षुओं! कोई भिक्षु इच्छा करे—‘दिव्य नेत्र से शुद्ध, मानुष्य नेत्र से श्रेष्ठ, प्राणियों को मरते हुए, उत्पन्न होते हुए, नीच, उत्तम, सुंदर, कुरूप, सौभाग्यशाली, दुर्भाग्यशाली, कर्मानुसार जाते हुए प्राणियों को देखूँ जानूँ—‘ये भोन्ते प्राणी शारीरिक दुष्कर्म से युक्त, वाणी दुष्कर्म से युक्त, मानस दुष्कर्म से युक्त, श्रेष्ठों के निंदक, तिर्यक् दृष्टि वाले, तिर्यक् दृष्टि-कर्म ग्रहण करने वाले; वे शरीर के विघटन के बाद, मृत्यु के बाद नीच योनि, दुर्गति, पतन, नरक में उत्पन्न हुए। ये भोन्ते प्राणी शारीरिक सुकर्म से युक्त, वाणी सुकर्म से युक्त, मानस सुकर्म से युक्त, श्रेष्ठों के प्रशंसक, सम्यक् दृष्टि वाले, सम्यक् दृष्टि-कर्म ग्रहण करने वाले; वे शरीर के विघटन के बाद, मृत्यु के बाद सौभाग्यशाली योनि, स्वर्ग लोक में उत्पन्न हुए।’ इस प्रकार दिव्य नेत्र से शुद्ध, मानुष्य नेत्र से श्रेष्ठ, प्राणियों को मरते हुए, उत्पन्न होते हुए, नीच, उत्तम, सुंदर, कुरूप, सौभाग्यशाली, दुर्भाग्यशाली, कर्मानुसार जाते हुए प्राणियों को देखूँ जानूँ’ तो उसे शीलों में ही पूर्णतापूर्वक रहना चाहिए, अंतर्मन में चित्त की शांति का अनुसरण करना चाहिए, ध्यान को निरंतर रखना चाहिए, विपश्यना से सम्पन्न होकर, खाली झोपड़ियों में भ्रमण करना चाहिए।

6. यदि, भिक्षुओं! कोई भिक्षु इच्छा करे—‘आस्रवों के क्षय से अनास्रव चित्त-विमुक्ति, प्रज्ञा-विमुक्ति को वर्तमान में स्वयं प्रत्यक्ष जानकर, प्रमाण करके प्राप्त करके रहूँ’ तो उसे शीलों में ही पूर्णतापूर्वक रहना चाहिए, अंतर्मन में चित्त की शांति का अनुसरण करना चाहिए, ध्यान को निरंतर रखना चाहिए, विपश्यना से सम्पन्न होकर, खाली झोपड़ियों में भ्रमण करना चाहिए।

“भिक्षुओं! पूर्ण शील वाले रहें, पूर्ण प्रातिमोक्ष संवरे वाले; प्रातिमोक्ष संवरण से संयुक्त रहें, आचार-व्यवहार में सम्पन्न, सूक्ष्म दोषों में भय रखने वाले; ग्रहण करके शील के नियमों का पालन करें”—यह जो कहा गया है, यह उसी के कारण कहा गया है।”

भगवान् ने इस प्रकार कहा। प्रसन्न होकर वे भिक्षु भगवान् की वाणी का अभिनंदन करते हुए।

आकाङ्क्षेय्य (इच्छा) सुत्त

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