8. सल्लेखसुत्त

Dhamma Skandha
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1. इस प्रकार मैंने सुना—एक समय भगवान् सावत्थि नगर में जेतवन उद्यान के अनाथपिण्डिक के आश्रम में ठहर रहे थे। तब सम्मानित महाचुन्द सायंकालीन एकांत-वास से उठकर भगवान् के पास पहुँचे; पहुँचकर भगवान् को प्रणाम किया और एक ओर बैठ गये। एक ओर बैठे हुए सम्मानित महाचुन्द ने भगवान् से कहा—“हे भन्ते! जो ये अनेक प्रकार की दृष्टियाँ संसार में उत्पन्न होती हैं—आत्मवाद से संयुक्त या लोकवाद से संयुक्त—क्या हे भन्ते! भिक्षु को ही प्रारम्भ से ही इन दृष्टियों का चिन्तन करने पर इन दृष्टियों का त्याग होता है, इन दृष्टियों का परित्याग होता है?”


2. “चुन्द! जो ये अनेक प्रकार की दृष्टियाँ संसार में उत्पन्न होती हैं—आत्मवाद से संयुक्त या लोकवाद से संयुक्त—जहाँ ये दृष्टियाँ उत्पन्न होती हैं, जहाँ अनुसरण करती हैं, जहाँ संचालित होती हैं, वहाँ ‘यह मेरा नहीं है, यह मैं नहीं हूँ, यह मेरा आत्मा नहीं है’—इस प्रकार यथार्थ रूप से सम्यक् प्रज्ञा से देखने पर इन दृष्टियों का त्याग होता है, इन दृष्टियों का परित्याग होता है।


“चुन्द! यह संभव है कि यहाँ कोई भिक्षु कामों से अलग होकर, अकुशल धम्मों से अलग होकर विचार-विचारणा सहित, विवेक से उत्पन्न प्रीति-सुख वाले प्रथम ध्यान में प्रवेश कर रहा। उसके लिए ऐसा होगा—‘मैं सल्लेख से रह रहा हूँ।’ किन्तु चुन्द! ये आर्यों के विनय में सल्लेख नहीं कहलाते। ये आर्यों के विनय में वर्तमान सुख-विहार कहलाते हैं।


“चुन्द! यह संभव है कि यहाँ कोई भिक्षु विचार-विचारणा का शांत होना, अंतर्मन का प्रसन्न होना, चित्त का एकाग्र होना अवितर्क-अविचार एकाग्रता से उत्पन्न प्रीति-सुख वाले द्वितीय ध्यान में प्रवेश कर रहा। उसके लिए ऐसा होगा—‘मैं सल्लेख से रह रहा हूँ।’ किन्तु चुन्द! ये आर्यों के विनय में सल्लेख नहीं कहलाते। ये आर्यों के विनय में वर्तमान सुख-विहार कहलाते हैं।


“चुन्द! यह संभव है कि यहाँ कोई भिक्षु प्रीति का वैराग्य होकर उपेक्षा करने वाला रहता हुआ, स्मृतिसंपन्न और सम्यक्-ज्ञान वाला शरीर द्वारा सुख का अनुभव करता हुआ, जो श्रेष्ठ इसे कहते हैं—‘उपेक्षा करने वाला स्मृतिसंपन्न सुख में रहने वाला’ तीसरा ध्यान में प्रवेश कर रहा। उसके लिए ऐसा होगा—‘मैं सल्लेख से रह रहा हूँ।’ किन्तु चुन्द! ये आर्यों के विनय में सल्लेख नहीं कहलाते। ये आर्यों के विनय में वर्तमान सुख-विहार कहलाते हैं।


“चुन्द! यह संभव है कि यहाँ कोई भिक्षु सुख का त्याग, दुःख का त्याग, पहले के हर्ष-अनहर्ष का अंत होकर दुःख-रहित असुख उपेक्षा-स्मृति-शुद्धि वाला चतुर्थ ध्यान में प्रवेश कर रहा। उसके लिए ऐसा होगा—‘मैं सल्लेख से रह रहा हूँ।’ किन्तु चुन्द! ये आर्यों के विनय में सल्लेख नहीं कहलाते। ये आर्यों के विनय में वर्तमान सुख-विहार कहलाते हैं।


“चुन्द! यह संभव है कि यहाँ कोई भिक्षु सर्वथा रूप-संज्ञाओं को पार कर, प्रतिघ-संज्ञाओं का अन्त होकर, नानात्व-संज्ञाओं का अमनसिकार करके, ‘अनन्त आकाश है’ ऐसा आकाशानञ्चायतन में प्रवेश कर रहा। उसके लिए ऐसा होगा—‘मैं सल्लेख से रह रहा हूँ।’ किन्तु चुन्द! ये आर्यों के विनय में सल्लेख नहीं कहलाते। ये आर्यों के विनय में शांत विहार कहलाते हैं।


“चुन्द! यह संभव है कि यहाँ कोई भिक्षु सर्वथा आकाशानञ्चायतन को पार कर ‘अनन्त विज्ञान है’ ऐसा विज्ञानञ्चायतन में प्रवेश कर रहा। उसके लिए ऐसा होगा—‘मैं सल्लेख से रह रहा हूँ।’ किन्तु चुन्द! ये आर्यों के विनय में सल्लेख नहीं कहलाते। ये आर्यों के विनय में शांत विहार कहलाते हैं।


“चुन्द! यह संभव है कि यहाँ कोई भिक्षु सर्वथा विज्ञानञ्चायतन को पार कर ‘कुछ भी नहीं है’ ऐसा आकिञ्चञ्ञायतन में प्रवेश कर रहा। उसके लिए ऐसा होगा—‘मैं सल्लेख से रह रहा हूँ।’ किन्तु चुन्द! ये आर्यों के विनय में सल्लेख नहीं कहलाते। ये आर्यों के विनय में शांत विहार कहलाते हैं।


“चुन्द! यह संभव है कि यहाँ कोई भिक्षु सर्वथा आकिञ्चञ्ञायतन को पार कर नेवसञ्ञा-नासञ्ञायतन में प्रवेश कर रहा। उसके लिए ऐसा होगा—‘मैं सल्लेख से रह रहा हूँ।’ किन्तु चुन्द! ये आर्यों के विनय में सल्लेख नहीं कहलाते। ये आर्यों के विनय में शांत विहार कहलाते हैं।”


3. “चुन्द! यहाँ सल्लेख करने योग्य है। ‘दूसरे हिंसक होंगे, हम यहाँ अहिंसक होंगे’ ऐसा सल्लेख करने योग्य है। ‘दूसरे प्राणी-हत्या करने वाले होंगे, हम यहाँ प्राणी-हत्या से विरत रहेंगे’ ऐसा सल्लेख करने योग्य है। ‘दूसरे चोर होंगे, हम यहाँ चोरी से विरत रहेंगे’ ऐसा सल्लेख करने योग्य है। ‘दूसरे अब्रह्मचारी होंगे, हम यहाँ ब्रह्मचारी होंगे’ ऐसा सल्लेख करने योग्य है। ‘दूसरे झूठे होंगे, हम यहाँ झूठ से विरत रहेंगे’ ऐसा सल्लेख करने योग्य है। ‘दूसरे पिसुण वाक्य वाले होंगे, हम यहाँ पिसुण वाक्य से विरत रहेंगे’ ऐसा सल्लेख करने योग्य है। ‘दूसरे कठोर वाक्य वाले होंगे, हम यहाँ कठोर वाक्य से विरत रहेंगे’ ऐसा सल्लेख करने योग्य है। ‘दूसरे प्रलाप करने वाले होंगे, हम यहाँ प्रलाप से विरत रहेंगे’ ऐसा सल्लेख करने योग्य है। ‘दूसरे लालची होंगे, हम यहाँ अनलालची होंगे’ ऐसा सल्लेख करने योग्य है। ‘दूसरे द्वेषी मन वाले होंगे, हम यहाँ अद्वेषी मन वाले होंगे’ ऐसा सल्लेख करने योग्य है। ‘दूसरे मिथ्यादृष्टि वाले होंगे, हम यहाँ सम्यग्दृष्टि वाले होंगे’ ऐसा सल्लेख करने योग्य है। ‘दूसरे मिथ्यासंकल्प वाले होंगे, हम यहाँ सम्यक्संकल्प वाले होंगे’ ऐसा सल्लेख करने योग्य है। ‘दूसरे मिथ्यावाक्य वाले होंगे, हम यहाँ सम्यग्वाक्य वाले होंगे’ ऐसा सल्लेख करने योग्य है। ‘दूसरे मिथ्याकर्म वाले होंगे, हम यहाँ सम्यग्कर्म वाले होंगे’ ऐसा सल्लेख करने योग्य है। ‘दूसरे मिथ्याजीव वाले होंगे, हम यहाँ सम्यग्जीव वाले होंगे’ ऐसा सल्लेख करने योग्य है। ‘दूसरे मिथ्यावायाम वाले होंगे, हम यहाँ सम्यग्वायाम वाले होंगे’ ऐसा सल्लेख करने योग्य है। ‘दूसरे मिथ्यास्मृति वाले होंगे, हम यहाँ सम्यग्स्मृति वाले होंगे’ ऐसा सल्लेख करने योग्य है। ‘दूसरे मिथ्यसमाधि वाले होंगे, हम यहाँ सम्यग्समाधि वाले होंगे’ ऐसा सल्लेख करने योग्य है। ‘दूसरे मिथ्याज्ञान वाले होंगे, हम यहाँ सम्यग्ज्ञान वाले होंगे’ ऐसा सल्लेख करने योग्य है। ‘दूसरे मिथ्याविमुक्ति वाले होंगे, हम यहाँ सम्यग्विमुक्ति वाले होंगे’ ऐसा सल्लेख करने योग्य है।


‘दूसरे थीनमिद्ध-ग्रस्त होंगे, हम यहाँ विगत-थीनमिद्ध होंगे’ ऐसा सल्लेख करने योग्य है। ‘दूसरे उद्धत होंगे, हम यहाँ अनुद्विग्न होंगे’ ऐसा सल्लेख करने योग्य है। ‘दूसरे विचिकित्सापूर्ण होंगे, हम यहाँ तीर्ण-विचिकित्सा होंगे’ ऐसा सल्लेख करने योग्य है। ‘दूसरे कोधपूर्ण होंगे, हम यहाँ अकोधपूर्ण होंगे’ ऐसा सल्लेख करने योग्य है। ‘दूसरे उपनाहपूर्ण होंगे, हम यहाँ अनुपनाहपूर्ण होंगे’ ऐसा सल्लेख करने योग्य है। ‘दूसरे मक्खी होंगे, हम यहाँ अमक्खी होंगे’ ऐसा सल्लेख करने योग्य है। ‘दूसरे पलासी होंगे, हम यहाँ अपलासी होंगे’ ऐसा सल्लेख करने योग्य है। ‘दूसरे इस्सुक (ईर्षुक) होंगे, हम यहाँ अनिस्सुक होंगे’ ऐसा सल्लेख करने योग्य है। ‘दूसरे मत्सरी होंगे, हम यहाँ अमत्सरी होंगे’ ऐसा सल्लेख करने योग्य है। ‘दूसरे सठ होंगे, हम यहाँ असठ होंगे’ ऐसा सल्लेख करने योग्य है। ‘दूसरे मायावी होंगे, हम यहाँ अमायावी होंगे’ ऐसा सल्लेख करने योग्य है। ‘दूसरे थद्ध (उत्तेजित) होंगे, हम यहाँ अत्थद्ध (शांत) होंगे’ ऐसा सल्लेख करने योग्य है। ‘दूसरे अतिमानी होंगे, हम यहाँ अनतिमानी होंगे’ ऐसा सल्लेख करने योग्य है। ‘दूसरे दुब्बच (कुप्रवचनीय) होंगे, हम यहाँ सुवच (सुप्रवचनीय) होंगे’ ऐसा सल्लेख करने योग्य है। ‘दूसरे पापमित्र होंगे, हम यहाँ कल्याणमित्र होंगे’ ऐसा सल्लेख करने योग्य है। ‘दूसरे प्रमत्त होंगे, हम यहाँ अप्रमत्त होंगे’ ऐसा सल्लेख करने योग्य है। ‘दूसरे असद्ध (अविश्वासी) होंगे, हम यहाँ सद्ध (विश्वासी) होंगे’ ऐसा सल्लेख करने योग्य है। ‘दूसरे अहिरीका (लज्जाशून्य) होंगे, हम यहाँ हिरीमन्त (लज्जावान) होंगे’ ऐसा सल्लेख करने योग्य है। ‘दूसरे अनोत्तप्पी (भयशून्य) होंगे, हम यहाँ ओत्तप्पी (भयावान) होंगे’ ऐसा सल्लेख करने योग्य है। ‘दूसरे अप्पस्सुत (कमश्रुत) होंगे, हम यहाँ बहुस्सुत (बहुश्रुत) होंगे’ ऐसा सल्लेख करने योग्य है। ‘दूसरे कुसीत (आलसी) होंगे, हम यहाँ आरद्धवीर्य (प्रयासशील) होंगे’ ऐसा सल्लेख करने योग्य है। ‘दूसरे मुट्ठस्मृति (स्मृति-विहीन) होंगे, हम यहाँ उपट्ठितस्मृति (स्मृतिसंपन्न) होंगे’ ऐसा सल्लेख करने योग्य है। ‘दूसरे दुप्पञ्ञ (मंदबुद्धि) होंगे, हम यहाँ प्रज्ञासंपन्न होंगे’ ऐसा सल्लेख करने योग्य है। ‘दूसरे सन्दिट्ठिपरामासी, आधानग्गाही, दुप्पटिनिस्सग्गी (दृष्टि-आसक्त, ग्रहण करने वाले, कठिन-परित्यागी) होंगे, हम यहाँ असन्दिट्ठिपरामासी, अनाधानग्गाही, सुप्पटिनिस्सग्गी (दृष्टि-अतिरिक्त, अग्रहण करने वाले, सुगम-परित्यागी) होंगे’ ऐसा सल्लेख करने योग्य है।”


4. “चुन्द! मैं कुशल धम्मों में चित्त की उत्पत्ति को बहुत सहायक कहता हूँ, तो फिर काय और वाक् से अनुवर्तना की तो बात ही क्या! इसलिए, चुन्द! ‘दूसरे हिंसक होंगे, हम यहाँ अहिंसक होंगे’ ऐसा चित्त उत्पन्न करना चाहिए। ‘दूसरे प्राणी-हत्या करने वाले होंगे, हम यहाँ प्राणी-हत्या से विरत रहेंगे’ ऐसा चित्त उत्पन्न करना चाहिए... ‘दूसरे सन्दिट्ठिपरामासी, आधानग्गाही, दुप्पटिनिस्सग्गी होंगे, हम यहाँ असन्दिट्ठिपरामासी, अनाधानग्गाही, सुप्पटिनिस्सग्गी होंगे’ ऐसा चित्त उत्पन्न करना चाहिए।”


5. “चुन्द! जैसे किसी के लिए विकृत मार्ग हो, उसके लिए दूसरा सम मार्ग परिक्रमण के लिए; या चुन्द! किसी के लिए विकृत घाट हो, उसके लिए दूसरा सम घाट परिक्रमण के लिए; इसी प्रकार, चुन्द! हिंसक पुरुष के लिए अहिंसा परिक्रमण के लिए है, प्राणी-हत्या करने वाले पुरुष के लिए प्राणी-हत्या से विरति परिक्रमण के लिए है, चोर पुरुष के लिए चोरी से विरति परिक्रमण के लिए है, अब्रह्मचारी पुरुष के लिए अब्रह्मचर्य से विरति परिक्रमण के लिए है, झूठे पुरुष के लिए झूठ से विरति परिक्रमण के लिए है, पिसुण वाक्य वाले पुरुष के लिए पिसुण वाक्य से विरति परिक्रमण के लिए है, कठोर वाक्य वाले पुरुष के लिए कठोर वाक्य से विरति परिक्रमण के लिए है, प्रलाप करने वाले पुरुष के लिए प्रलाप से विरति परिक्रमण के लिए है, लालची पुरुष के लिए अनलोभ परिक्रमण के लिए है, द्वेषी मन वाले पुरुष के लिए अद्वेष परिक्रमण के लिए है, मिथ्यादृष्टि वाले पुरुष के लिए सम्यग्दृष्टि परिक्रमण के लिए है, मिथ्यासंकल्प वाले पुरुष के लिए सम्यक्संकल्प परिक्रमण के लिए है, मिथ्यावाक्य वाले पुरुष के लिए सम्यग्वाक्य परिक्रमण के लिए है, मिथ्याकर्म वाले पुरुष के लिए सम्यग्कर्म परिक्रमण के लिए है, मिथ्याजीव वाले पुरुष के लिए सम्यग्जीव परिक्रमण के लिए है, मिथ्यावायाम वाले पुरुष के लिए सम्यग्वायाम परिक्रमण के लिए है, मिथ्यास्मृति वाले पुरुष के लिए सम्यग्स्मृति परिक्रमण के लिए है, मिथ्यसमाधि वाले पुरुष के लिए सम्यग्समाधि परिक्रमण के लिए है, मिथ्याज्ञान वाले पुरुष के लिए सम्यग्ज्ञान परिक्रमण के लिए है, मिथ्याविमुक्ति वाले पुरुष के लिए सम्यग्विमुक्ति परिक्रमण के लिए है।


थीनमिद्ध-ग्रस्त पुरुष के लिए विगत-थीनमिद्ध अवस्था परिक्रमण के लिए है, उद्धत पुरुष के लिए अनुद्विग्न अवस्था परिक्रमण के लिए है, विचिकित्सापूर्ण पुरुष के लिए तीर्ण-विचिकित्सा अवस्था परिक्रमण के लिए है, कोधपूर्ण पुरुष के लिए अकोध अवस्था परिक्रमण के लिए है, उपनाहपूर्ण पुरुष के लिए अनुपनाह अवस्था परिक्रमण के लिए है, मक्खी पुरुष के लिए अमक्ख अवस्था परिक्रमण के लिए है, पलासी पुरुष के लिए अपलास अवस्था परिक्रमण के लिए है, इस्सुक पुरुष के लिए अनिस्सुक अवस्था परिक्रमण के लिए है, मत्सरी पुरुष के लिए अमत्सर अवस्था परिक्रमण के लिए है, सठ पुरुष के लिए असठेय्य अवस्था परिक्रमण के लिए है, मायावी पुरुष के लिए अमाया अवस्था परिक्रमण के लिए है, थद्ध पुरुष के लिए अत्थद्ध अवस्था परिक्रमण के लिए है, अतिमानी पुरुष के लिए अनतिमान अवस्था परिक्रमण के लिए है, दुब्बच पुरुष के लिए सोवच अवस्था परिक्रमण के लिए है, पापमित्र पुरुष के लिए कल्याणमित्र अवस्था परिक्रमण के लिए है, प्रमत्त पुरुष के लिए अप्रमाद अवस्था परिक्रमण के लिए है, असद्ध पुरुष के लिए सद्ध अवस्था परिक्रमण के लिए है, अहिरीका पुरुष के लिए हिरी अवस्था परिक्रमण के लिए है, अनोत्तप्पी पुरुष के लिए ओत्तप्प अवस्था परिक्रमण के लिए है, अप्पस्सुत पुरुष के लिए बाहुसच्च अवस्था परिक्रमण के लिए है, कुसीत पुरुष के लिए वीर्यारम्भ अवस्था परिक्रमण के लिए है, मुट्ठस्मृति पुरुष के लिए उपट्ठितस्मृति अवस्था परिक्रमण के लिए है, दुप्पञ्ञ पुरुष के लिए प्रज्ञासम्पदा अवस्था परिक्रमण के लिए है, सन्दिट्ठिपरामासी-आधानग्गाही-दुप्पटिनिस्सग्गी पुरुष के लिए असन्दिट्ठिपरामासी-अनाधानग्गाही-सुप्पटिनिस्सग्गी अवस्था परिक्रमण के लिए है।”


6. “चुन्द! जैसे सभी अकुशल धम्म अधोभाग की ओर गामी हैं, सभी कुशल धम्म ऊर्ध्वभाग की ओर गामी हैं, इसी प्रकार, चुन्द! हिंसक पुरुष के लिए अहिंसा ऊर्ध्वभाग के लिए है, प्राणी-हत्या करने वाले पुरुष के लिए प्राणी-हत्या से विरति ऊर्ध्वभाग के लिए है... सन्दिट्ठिपरामासी-आधानग्गाही-दुप्पटिनिस्सग्गी पुरुष के लिए असन्दिट्ठिपरामासी-अनाधानग्गाही-सुप्पटिनिस्सग्गी अवस्था ऊर्ध्वभाग के लिए है।”


7. “चुन्द! जो स्वयं लिप्त हो वह दूसरे लिप्त को उधारेगा, ऐसा संभव नहीं है। चुन्द! जो स्वयं अलिप्त हो वह दूसरे लिप्त को उधारेगा, ऐसा संभव है। चुन्द! जो स्वयं अदंन्त, अविनीत, अपरिनिर्वृत हो वह दूसरे को दंन्त करेगा, विनीत करेगा, परिनिर्वृत करेगा, ऐसा संभव नहीं है। चुन्द! जो स्वयं दंन्त, विनीत, परिनिर्वृत हो वह दूसरे को दंन्त करेगा, विनीत करेगा, परिनिर्वृत करेगा, ऐसा संभव है। इसी प्रकार, चुन्द! हिंसक पुरुष के लिए अहिंसा परिनिर्वाण के लिए है, प्राणी-हत्या करने वाले पुरुष के लिए प्राणी-हत्या से विरति परिनिर्वाण के लिए है। चोर पुरुष के लिए चोरी से विरति परिनिर्वाण के लिए है। अब्रह्मचारी पुरुष के लिए अब्रह्मचर्य से विरति परिनिर्वाण के लिए है। झूठे पुरुष के लिए झूठ से विरति परिनिर्वाण के लिए है। पिसुण वाक्य वाले पुरुष के लिए पिसुण वाक्य से विरति परिनिर्वाण के लिए है। कठोर वाक्य वाले पुरुष के लिए कठोर वाक्य से विरति परिनिर्वाण के लिए है। प्रलाप करने वाले पुरुष के लिए प्रलाप से विरति परिनिर्वाण के लिए है। लालची पुरुष के लिए अनलोभ परिनिर्वाण के लिए है। द्वेषी मन वाले पुरुष के लिए अद्वेष परिनिर्वाण के लिए है। मिथ्यादृष्टि वाले पुरुष के लिए सम्यग्दृष्टि परिनिर्वाण के लिए है। मिथ्यासंकल्प वाले पुरुष के लिए सम्यक्संकल्प परिनिर्वाण के लिए है। मिथ्यावाक्य वाले पुरुष के लिए सम्यग्वाक्य परिनिर्वाण के लिए है। मिथ्याकर्म वाले पुरुष के लिए सम्यग्कर्म परिनिर्वाण के लिए है। मिथ्याजीव वाले पुरुष के लिए सम्यग्जीव परिनिर्वाण के लिए है। मिथ्यावायाम वाले पुरुष के लिए सम्यग्वायाम परिनिर्वाण के लिए है। मिथ्यास्मृति वाले पुरुष के लिए सम्यग्स्मृति परिनिर्वाण के लिए है। मिथ्यसमाधि वाले पुरुष के लिए सम्यग्समाधि परिनिर्वाण के लिए है। मिथ्याज्ञान वाले पुरुष के लिए सम्यग्ज्ञान परिनिर्वाण के लिए है। मिथ्याविमुक्ति वाले पुरुष के लिए सम्यग्विमुक्ति परिनिर्वाण के लिए है।


थीनमिद्ध-ग्रस्त पुरुष के लिए विगत-थीनमिद्ध अवस्था परिनिर्वाण के लिए है। उद्धत पुरुष के लिए अनुद्विग्न अवस्था परिनिर्वाण के लिए है। विचिकित्सापूर्ण पुरुष के लिए तीर्ण-विचिकित्सा अवस्था परिनिर्वाण के लिए है। कोधपूर्ण पुरुष के लिए अकोध अवस्था परिनिर्वाण के लिए है। उपनाहपूर्ण पुरुष के लिए अनुपनाह अवस्था परिनिर्वाण के लिए है। मक्खी पुरुष के लिए अमक्ख अवस्था परिनिर्वाण के लिए है। पलासी पुरुष के लिए अपलास अवस्था परिनिर्वाण के लिए है। इस्सुक पुरुष के लिए अनिस्सुक अवस्था परिनिर्वाण के लिए है। मत्सरी पुरुष के लिए अमत्सर अवस्था परिनिर्वाण के लिए है। सठ पुरुष के लिए असठेय्य अवस्था परिनिर्वाण के लिए है। मायावी पुरुष के लिए अमाया अवस्था परिनिर्वाण के लिए है। थद्ध पुरुष के लिए अत्थद्ध अवस्था परिनिर्वाण के लिए है। अतिमानी पुरुष के लिए अनतिमान अवस्था परिनिर्वाण के लिए है। दुब्बच पुरुष के लिए सोवच अवस्था परिनिर्वाण के लिए है। पापमित्र पुरुष के लिए कल्याणमित्र अवस्था परिनिर्वाण के लिए है। प्रमत्त पुरुष के लिए अप्रमाद अवस्था परिनिर्वाण के लिए है। असद्ध पुरुष के लिए सद्ध अवस्था परिनिर्वाण के लिए है। अहिरीका पुरुष के लिए हिरी अवस्था परिनिर्वाण के लिए है। अनोत्तप्पी पुरुष के लिए ओत्तप्प अवस्था परिनिर्वाण के लिए है। अप्पस्सुत पुरुष के लिए बाहुसच्च अवस्था परिनिर्वाण के लिए है। कुसीत पुरुष के लिए वीर्यारम्भ अवस्था परिनिर्वाण के लिए है। मुट्ठस्मृति पुरुष के लिए उपट्ठितस्मृति अवस्था परिनिर्वाण के लिए है। दुप्पञ्ञ पुरुष के लिए प्रज्ञासम्पदा अवस्था परिनिर्वाण के लिए है। सन्दिट्ठिपरामासी-आधानग्गाही-दुप्पटिनिस्सग्गी पुरुष के लिए असन्दिट्ठिपरामासी-अनाधानग्गाही-सुप्पटिनिस्सग्गी अवस्था परिनिर्वाण के लिए है।”


8. “इस प्रकार, चुन्द! मैंने सल्लेख प्रवाह का उपदेश किया, चित्त-उत्पत्ति प्रवाह का उपदेश किया, परिक्रमण प्रवाह का उपदेश किया, ऊर्ध्वभाग प्रवाह का उपदेश किया, परिनिर्वाण प्रवाह का उपदेश किया। चुन्द! जो गुरु के शिष्यों के हित के लिए, करुणामय होकर करुणा से ग्रहण करके करने योग्य है, वह मैंने तुम्हारे लिए किया है। ‘ये वृक्ष-मूल हैं, ये खाली झोपड़ियाँ हैं, ध्यान करो चुन्द! प्रमाद न करो, पश्चात्ताप न करने वाले हो जाओ’—यह हमारा उपदेश है।”


भगवान् ने इस प्रकार कहा। प्रसन्न होकर सम्मानित महाचुन्द भगवान् की वाणी का अभिनंदन करते हुए।


चौंसठ पदों का उपदेश किया गया, संधियाँ पाँच बताई गईं।

सल्लेख नामक सुत्त, गहन समुद्र के समान।


सल्लेख सुत्त समाप्त


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