8. मधुपिण्डिकसुत्त

Dhamma Skandha
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1. इस प्रकार मैंने सुना—एक समय भगवान् सकक देश में कपिलवस्तु के निग्रोधाराम में ठहर रहे थे। तब भगवान् प्रातःकाल वस्त्र धारण करके, पात्र-वस्त्र लेकर कपिलवस्तु में भिक्षा के लिए प्रवेश किए। कपिलवस्तु में भिक्षा करके भोजन के पश्चात् भिक्षापात्र लौटाकर महावन की ओर गए दिवाविहार के लिए। महावन को प्रवेशित करके बेलुवलट्ठिका मूल के नीचे दिवाविहार के लिए बैठ गये। दंडपाणि सकक भी जंघाविहार करता हुआ अनुचंकममान, अनुविचरमान महावन की ओर गया। महावन को प्रवेशित करके बेलुवलट्ठिका के पास, भगवान् के पास गया; जाकर भगवान् से अभिवादन किया। अभिवादन के बाद मैत्रीपूर्ण बातचीत पूरी करने पर दंड को मलकर एक ओर खड़े हो गये। एक ओर खड़े हुए दंडपाणि सकक ने भगवान् से कहा—“समण किस वादी हैं, किस नाम से कहलाते हैं?” “मित्र! मैं यथावादी हूँ समस्त देव-लोक, समस्त मार-लोक, समस्त ब्रह्मा-लोक, समस्त संन्यासी-ब्राह्मण-लोक, समस्त देव-मनुष्य-लोक में किसी से विवाद में नहीं खड़ा होता, और जैसे कामों से विमुक्त रहने वाले उस ब्राह्मण को अकथंकथी, छिन्न-कुक्कुच्च, भवाभव में विगत-तृष्णा संज्ञा अनुसरण नहीं करती—मैं उसी प्रकार वादी हूँ, उसी प्रकार कहलाता हूँ।”


इस प्रकार कहने पर दंडपाणि सकक ने सिर हिलाकर, जिह्वा लोलकर, त्रिविसाख नलाटिक को नलाटे से निकालकर दंड मलकर चले गए।


2. तब भगवान् सायंकालीन एकांत-वास से उठकर निग्रोधाराम की ओर गए; जाकर आसन पर बैठ गये। बैठकर भगवान् ने भिक्षुओं को बुलाया—“भिक्षुओं! मैं प्रातःकाल वस्त्र धारण करके, पात्र-वस्त्र लेकर कपिलवस्तु में भिक्षा के लिए प्रवेश किया। कपिलवस्तु में भिक्षा करके भोजन के पश्चात् भिक्षापात्र लौटाकर महावन की ओर गया दिवाविहार के लिए। महावन को प्रवेशित करके बेलुवलट्ठिका मूल के नीचे दिवाविहार के लिए बैठा। दंडपाणि सकक भी, भिक्षुओं! जंघाविहार करता हुआ अनुचंकममान, अनुविचरमान महावन की ओर गया। महावन को प्रवेशित करके बेलुवलट्ठिका के पास, मेरे पास गया; जाकर मुझसे अभिवादन किया। अभिवादन के बाद मैत्रीपूर्ण बातचीत पूरी करने पर दंड मलकर एक ओर खड़े हो गये। एक ओर खड़े हुए, भिक्षुओं! दंडपाणि सकक ने मुझसे कहा—‘समण किस वादी हैं, किस नाम से कहलाते हैं?’


भिक्षुओं! इस प्रकार कहने पर मैंने दंडपाणि सकक से कहा—मित्र! मैं यथावादी हूँ समस्त देव-लोक, समस्त मार-लोक, समस्त ब्रह्मा-लोक, समस्त संन्यासी-ब्राह्मण-लोक, समस्त देव-मनुष्य-लोक में किसी से विवाद में नहीं खड़ा होता, और जैसे कामों से विमुक्त रहने वाले उस ब्राह्मण को अकथंकथी, छिन्न-कुक्कुच्च, भवाभव में विगत-तृष्णा संज्ञा अनुसरण नहीं करती—मैं उसी प्रकार वादी हूँ, उसी प्रकार कहलाता हूँ। भिक्षुओं! इस प्रकार कहने पर दंडपाणि सकक ने सिर हिलाकर, जिह्वा लोलकर, त्रिविसाख नलाटिक को नलाटे से निकालकर दंड मलकर चले गए।”


3. इस प्रकार कहने पर किसी भिक्षु ने भगवान् से कहा—“भन्ते! भगवान् समस्त देव-लोक... (इत्यादि)... किस वादी हैं? भन्ते! कामों से विमुक्त रहने वाले उस ब्राह्मण को अकथंकथी, छिन्नकुक्कुच्च, भवाभव में विगत-तृष्णा संज्ञा कैसे अनुसरण नहीं करती?” “भिक्षु! जिस कारण से पुरुष को पपञ्च-संज्ञा-संख्या संचालित होती हैं। यहाँ यदि अभिनंदनीय, अभिवादनीय, आश्रित न हो। यह राग-प्रवृत्ति का अन्त है... (इत्यादि)... यह दंडादान-शस्त्रादान-कलह-विग्गह-विवाद-तुवंतुव-पेसुññ-मुसावाद का अन्त है। यहाँ ये पापक अकुशल धम्म अपरिसेस निरुज्झते हैं।” भगवान् ने इस प्रकार कहा। सुगत ने कहा और आसन से उठकर विहार में प्रवेश किया।


4. तब उन भिक्षुओं को भगवान् के चले जाने के थोड़ी देर बाद यह विचार हुआ—‘मित्रों! भगवान् संक्षिप्त उद्देस कहकर विस्तार से अर्थ न विभाजित करके आसन से उठकर विहार में प्रवेश कर गए—“भिक्षु! जिस कारण से पुरुष को पपञ्च-संज्ञा-संख्या संचालित होती हैं। यहाँ यदि अभिनंदनीय... (इत्यादि)... ये पापक अकुशल धम्म अपरिसेस निरुज्झते हैं।” भगवान् के इस संक्षिप्त उद्देस के उद्दिष्ट, विस्तार से अर्थ अविभक्त के विस्तार से अर्थ कौन विभाजित करेगा?’ तब उन भिक्षुओं को यह विचार हुआ—‘सम्मानित महाकच्चान गुरु के भी प्रशंसित, सम्मानित, विद्वानों के सह-ब्रह्मचारी हैं। सम्मानित महाकच्चान इस भगवान् के संक्षिप्त उद्देस के उद्दिष्ट, विस्तार से अर्थ अविभक्त के विस्तार से अर्थ विभाजित करने के योग्य हैं। क्यों न हम सम्मानित महाकच्चान के पास जाकर इस अर्थ की प्रतिपुच्छा करें।’


तब वे भिक्षु सम्मानित महाकच्चान के पास गए; जाकर सम्मानित महाकच्चान से अभिवादन किया। अभिवादन के बाद मैत्रीपूर्ण बातचीत पूरी करने पर एक ओर बैठ गये। एक ओर बैठे हुए वे भिक्षु सम्मानित महाकच्चान से बोले—“मित्र कच्चान! भगवान् संक्षिप्त उद्देस कहकर विस्तार से अर्थ न विभाजित करके आसन से उठकर विहार में प्रवेश कर गए—“भिक्षु! जिस कारण से पुरुष को पपञ्च-संज्ञा-संख्या संचालित होती हैं। यहाँ यदि अभिनंदनीय... (इत्यादि)... ये पापक अकुशल धम्म अपरिसेस निरुज्झते हैं।” मित्र कच्चान! भगवान् के चले जाने के थोड़ी देर बाद हमारा यह विचार हुआ—‘मित्रों! भगवान् संक्षिप्त उद्देस कहकर विस्तार से अर्थ न विभाजित करके आसन से उठकर विहार में प्रवेश कर गए—“भिक्षु! जिस कारण से पुरुष को पपञ्च-संज्ञा-संख्या संचालित होती हैं। यहाँ यदि अभिनंदनीय... (इत्यादि)... ये पापक अकुशल धम्म अपरिसेस निरुज्झते हैं।” भगवान् के इस संक्षिप्त उद्देस के उद्दिष्ट, विस्तार से अर्थ अविभक्त के विस्तार से अर्थ कौन विभाजित करेगा?’ मित्र कच्चान! हमारा यह विचार हुआ—‘सम्मानित महाकच्चान गुरु के भी प्रशंसित, सम्मानित, विद्वानों के सह-ब्रह्मचारी हैं। सम्मानित महाकच्चान इस भगवान् के संक्षिप्त उद्देस के उद्दिष्ट, विस्तार से अर्थ अविभक्त के विस्तार से अर्थ विभाजित करने के योग्य हैं। क्यों न हम सम्मानित महाकच्चान के पास जाकर इस अर्थ की प्रतिपुच्छा करें।’ भन्ते! तब हम सम्मानित महाकच्चान के पास गए; जाकर इस अर्थ की प्रतिपुच्छा की। मित्र कच्चान! सम्मानित महाकच्चान ने इन आकारों से, इन पदों से, इन व्यंजनों से अर्थ विभाजित किया।”


5. “मित्रों! जैसे कोई पुरुष सार-ार्थी, सार-खोजी, सार-परीक्षक महान् वृक्ष के नीचे खड़ा होकर मूल को पार करके, खंड को पार करके, साखा-पत्रों में सार की खोज करे; मित्रों! इतना ही समान है सम्मानितों के गुरु के सामने खड़े होकर, भगवान् को पार करके हमें इस अर्थ की प्रतिपुच्छा करने का सोचना। मित्रों! भगवान् जानते हुए जानते हैं, देखते हुए देखते हैं, चक्षु-भूत, ज्ञान-भूत, धम्म-भूत, ब्रह्म-भूत, वक्ता, प्रवक्ता, अर्थ के निन्नेता, अमृत के दाता, धम्म के स्वामी तथागत हैं। और यह समय भी था कि भगवान् से ही इस अर्थ की प्रतिपुच्छा करो। भिक्षुओं! जैसे भगवान् व्याख्या करें वैसे धारण करो।”


“मित्र कच्चान! भगवान् जानते हुए जानते हैं, देखते हुए देखते हैं, चक्षु-भूत, ज्ञान-भूत, धम्म-भूत, ब्रह्म-भूत, वक्ता, प्रवक्ता, अर्थ के निन्नेता, अमृत के दाता, धम्म के स्वामी तथागत हैं। और यह समय भी था कि भगवान् से ही इस अर्थ की प्रतिपुच्छा करो। जैसे भगवान् व्याख्या करें वैसे धारण करें। किन्तु मित्र महाकच्चान गुरु के भी प्रशंसित, सम्मानित, विद्वानों के सह-ब्रह्मचारी हैं। सम्मानित महाकच्चान इस भगवान् के संक्षिप्त उद्देस के उद्दिष्ट, विस्तार से अर्थ अविभक्त के विस्तार से अर्थ विभाजित करने के योग्य हैं। मित्र महाकच्चान! गुरुण को रखकर विभाजित करो।” “इसलिए, मित्रों! सुनो, अच्छी तरह मन में रखो, मैं कह रहा हूँ।” “ऐसा है, मित्र!” वे भिक्षु सम्मानित महाकच्चान के सम्मति से बोले। सम्मानित महाकच्चान ने कहा—


6. “मित्रों! जो भगवान् ने संक्षिप्त उद्देस कहकर विस्तार से अर्थ न विभाजित करके आसन से उठकर विहार में प्रवेश कर गए—“भिक्षु! जिस कारण से पुरुष को पपञ्च-संज्ञा-संख्या संचालित होती हैं। यहाँ यदि अभिनंदनीय, अभिवादनीय, आश्रित न हो। यह राग-प्रवृत्ति का अन्त है... (इत्यादि)... यहाँ ये पापक अकुशल धम्म अपरिसेस निरुज्झते हैं।” मित्रों! मैं इस भगवान् के संक्षिप्त उद्देस के उद्दिष्ट, विस्तार से अर्थ अविभक्त के इस प्रकार विस्तार से अर्थ जानता हूँ—


मित्रों! चक्षु के कारण, रूपों के कारण चक्षु-विज्ञान उत्पन्न होता, तीनों के संयोग से स्पर्श होता, स्पर्श-कारण से वेदना होती, जो अनुभव करता उसे संज्ञान करता, जो संज्ञान करता उसे वितर्क करता, जो वितर्क करता उसे पपञ्च करता, जो पपञ्च करता उसके कारण पुरुष को पपञ्च-संज्ञा-संख्या संचालित होती अतीत-भविष्य-वर्तमान चक्षु-विज्ञेय रूपों में। श्रोत्र के कारण, शब्दों के कारण... (इत्यादि)... घ्राण के कारण, गंधों के कारण... जिह्वा के कारण, रसों के कारण... काय के कारण, स्पर्शों के कारण... मन के कारण, धम्मों के कारण मनो-विज्ञान उत्पन्न होता, तीनों के संयोग से स्पर्श होता, स्पर्श-कारण से वेदना होती, जो अनुभव करता उसे संज्ञान करता, जो संज्ञान करता उसे वितर्क करता, जो वितर्क करता उसे पपञ्च करता, जो पपञ्च करता उसके कारण पुरुष को पपञ्च-संज्ञा-संख्या संचालित होती अतीत-भविष्य-वर्तमान मनो-विज्ञेय धम्मों में।


मित्रों! चक्षु के होने पर, रूपों के होने पर, चक्षु-विज्ञान के होने पर स्पर्श-प्रज्ञप्ति प्रज्ञापित होगी—ऐसा संभव है। स्पर्श-प्रज्ञप्ति के होने पर वेदना-प्रज्ञप्ति प्रज्ञापित होगी—ऐसा संभव है। वेदना-प्रज्ञप्ति के होने पर संज्ञा-प्रज्ञप्ति प्रज्ञापित होगी—ऐसा संभव है। संज्ञा-प्रज्ञप्ति के होने पर वितर्क-प्रज्ञप्ति प्रज्ञापित होगी—ऐसा संभव है। वितर्क-प्रज्ञप्ति के होने पर पपञ्च-संज्ञा-संख्या-संचालन-प्रज्ञप्ति प्रज्ञापित होगी—ऐसा संभव है। श्रोत्र के होने पर, शब्दों के होने पर... (इत्यादि)... मन के होने पर, धम्मों के होने पर, मनो-विज्ञान के होने पर स्पर्श-प्रज्ञप्ति प्रज्ञापित होगी—ऐसा संभव है। स्पर्श-प्रज्ञप्ति के होने पर वेदना-प्रज्ञप्ति प्रज्ञापित होगी—ऐसा संभव है। वेदना-प्रज्ञप्ति के होने पर संज्ञा-प्रज्ञप्ति प्रज्ञापित होगी—ऐसा संभव है। संज्ञा-प्रज्ञप्ति के होने पर वितर्क-प्रज्ञप्ति प्रज्ञापित होगी—ऐसा संभव है। वितर्क-प्रज्ञप्ति के होने पर पपञ्च-संज्ञा-संख्या-संचालन-प्रज्ञप्ति प्रज्ञापित होगी—ऐसा संभव है।


मित्रों! चक्षु के न होने पर, रूपों के न होने पर, चक्षु-विज्ञान के न होने पर स्पर्श-प्रज्ञप्ति प्रज्ञापित होगी—ऐसा संभव नहीं। स्पर्श-प्रज्ञप्ति के न होने पर वेदना-प्रज्ञप्ति प्रज्ञापित होगी—ऐसा संभव नहीं। वेदना-प्रज्ञप्ति के न होने पर संज्ञा-प्रज्ञप्ति प्रज्ञापित होगी—ऐसा संभव नहीं। संज्ञा-प्रज्ञप्ति के न होने पर वितर्क-प्रज्ञप्ति प्रज्ञापित होगी—ऐसा संभव नहीं। वितर्क-प्रज्ञप्ति के न होने पर पपञ्च-संज्ञा-संख्या-संचालन-प्रज्ञप्ति प्रज्ञापित होगी—ऐसा संभव नहीं। श्रोत्र के न होने पर, शब्दों के न होने पर... (इत्यादि)... मन के न होने पर, धम्मों के न होने पर, मनो-विज्ञान के न होने पर स्पर्श-प्रज्ञप्ति प्रज्ञापित होगी—ऐसा संभव नहीं। स्पर्श-प्रज्ञप्ति के न होने पर वेदना-प्रज्ञप्ति प्रज्ञापित होगी—ऐसा संभव नहीं। वेदना-प्रज्ञप्ति के न होने पर संज्ञा-प्रज्ञप्ति प्रज्ञापित होगी—ऐसा संभव नहीं। संज्ञा-प्रज्ञप्ति के न होने पर वितर्क-प्रज्ञप्ति प्रज्ञापित होगी—ऐसा संभव नहीं। वितर्क-प्रज्ञप्ति के न होने पर पपञ्च-संज्ञा-संख्या-संचालन-प्रज्ञप्ति प्रज्ञापित होगी—ऐसा संभव नहीं।


मित्रों! जो भगवान् ने संक्षिप्त उद्देस कहकर विस्तार से अर्थ न विभाजित करके आसन से उठकर विहार में प्रवेश कर गए—“भिक्षु! जिस कारण से पुरुष को पपञ्च-संज्ञा-संख्या संचालित होती हैं। यहाँ यदि अभिनंदनीय, अभिवादनीय, आश्रित न हो। यह राग-प्रवृत्ति का अन्त है... (इत्यादि)... यहाँ ये पापक अकुशल धम्म अपरिसेस निरुज्झते हैं।” मित्रों! मैं इस भगवान् के संक्षिप्त उद्देस के उद्दिष्ट, विस्तार से अर्थ अविभक्त के इस प्रकार विस्तार से अर्थ जानता हूँ। मित्रों! यदि इच्छुक हो तो भगवान् के पास जाकर इस अर्थ की प्रतिपुच्छा करो। जैसे भगवान् व्याख्या करें वैसे धारण करो।”


7. तब वे भिक्षु सम्मानित महाकच्चान की वाणी का अभिनंदन और अनुमोदन करके आसन से उठकर भगवान् के पास गये; जाकर भगवान् को प्रणाम किया और एक ओर बैठ गये। एक ओर बैठे हुए वे भिक्षु भगवान् से बोले—“भन्ते! जो भगवान् ने संक्षिप्त उद्देस कहकर विस्तार से अर्थ न विभाजित करके आसन से उठकर विहार में प्रवेश कर गए—“भिक्षु! जिस कारण से पुरुष को पपञ्च-संज्ञा-संख्या संचालित होती हैं। यहाँ यदि अभिनंदनीय... (इत्यादि)... ये पापक अकुशल धम्म अपरिसेस निरुज्झते हैं।” भन्ते! भगवान् के चले जाने के थोड़ी देर बाद हमारा यह विचार हुआ—‘मित्रों! भगवान् संक्षिप्त उद्देस कहकर विस्तार से अर्थ न विभाजित करके आसन से उठकर विहार में प्रवेश कर गए—“भिक्षु! जिस कारण से पुरुष को पपञ्च-संज्ञा-संख्या संचालित होती हैं। यहाँ यदि अभिनंदनीय... (इत्यादि)... ये पापक अकुशल धम्म अपरिसेस निरुज्झते हैं।” भगवान् के इस संक्षिप्त उद्देस के उद्दिष्ट, विस्तार से अर्थ अविभक्त के विस्तार से अर्थ कौन विभाजित करेगा?’ भन्ते! हमारा यह विचार हुआ—‘सम्मानित महाकच्चान गुरु के भी प्रशंसित, सम्मानित, विद्वानों के सह-ब्रह्मचारी हैं। सम्मानित महाकच्चान इस भगवान् के संक्षिप्त उद्देस के उद्दिष्ट, विस्तार से अर्थ अविभक्त के विस्तार से अर्थ विभाजित करने के योग्य हैं। क्यों न हम सम्मानित महाकच्चान के पास जाकर इस अर्थ की प्रतिपुच्छा करें।’ भन्ते! तब हम सम्मानित महाकच्चान के पास गये; जाकर इस अर्थ की प्रतिपुच्छा की। भन्ते! सम्मानित महाकच्चान ने इन आकारों से, इन पदों से, इन व्यंजनों से अर्थ विभाजित किया।”


“भिक्षुओं! महाकच्चान विद्वान् हैं; भिक्षुओं! महाकच्चान महाप्रज्ञ हैं। भिक्षुओं! यदि तुम मुझसे इस अर्थ की प्रतिपुच्छा करो, तो मैं भी उसी प्रकार व्याख्या करूँ जैसा महाकच्चान ने किया। मित्रों! यही इसका अर्थ है। उसी प्रकार धारण करो।”


इस प्रकार कहने पर सम्मानित आनंद ने भगवान् से कहा—“भन्ते! जैसे कोई पुरुष भूख-कमजोरी से पीड़ित मधुपिंडिक प्राप्त करे, वह जिधर सोए उतना ही सादुरस, असेचन प्राप्त करे। भन्ते! इसी प्रकार भिक्षु चेतसो दब्बजातिक हो, जिधर इस धम्म-प्रवाह की प्रज्ञा से अर्थ उपपरीक्षित करे, उतना ही अत्तमनता प्राप्त करे, उतना ही चित्त का प्रसाद प्राप्त करे। भन्ते! इस धम्म-प्रवाह का नाम क्या है?” “इसलिए तुम, आनंद! इस धम्म-प्रवाह को मधुपिंडिक-प्रवाह ही धारण करो।”


भगवान् ने इस प्रकार कहा। प्रसन्न होकर सम्मानित आनंद भगवान् की वाणी का अभिनंदन करते हुए।


मधुपिंडिक सुत्त समाप्त, अष्टम।


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