9. द्वेधावितक्कसुत्त

Dhamma Skandha
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1. इस प्रकार मैंने सुना—एक समय भगवान् सावत्थि नगर में जेतवन उद्यान के अनाथपिण्डिक के आश्रम में ठहर रहे थे। वहाँ भगवान् ने भिक्षुओं को बुलाया—“भिक्षुओं!” “भदन्त!” वे भिक्षु भगवान् के सम्मति से उत्तर देते हुए बोले। भगवान् ने कहा—


“भिक्षुओं! बोधि-प्राप्ति से पहले ही, जब मैं बोधिसत्त्व था किन्तु बोधि प्राप्त न हुई थी, तब यह विचार हुआ—‘क्यों न मैं द्विविध करके, द्विविध करके वितर्कों में रहूँ।’ भिक्षुओं! मैंने जो काम-वितर्क है, जो व्यापाद-वितर्क है, जो हिंसा-वितर्क है—उन्हें एक भाग में रखा; जो नेक्खम्म-वितर्क है, जो अद्वेष-वितर्क है, जो अहिंसा-वितर्क है—उन्हें द्वितीय भाग में रखा।


2. “भिक्षुओं! मेरे इस प्रकार अप्रमत्त, उत्साही, संकल्पशील रहने पर काम-वितर्क उत्पन्न होता। मैं इस प्रकार जानता—‘यह मेरे लिए उत्पन्न काम-वितर्क है। और यह स्व-व्याबाधा की ओर संचालित होता, पर-व्याबाधा की ओर संचालित होता, दोनों व्याबाधा की ओर संचालित होता, प्रज्ञा-निरोधक, विघात-पक्षिक, अनिब्बान-संवत्तनिक।’ भिक्षुओं! ‘स्व-व्याबाधा की ओर संचालित होता’ ऐसा मेरे पटिसंविचरित करने पर अभ्यर्थ गमन होता; ‘पर-व्याबाधा की ओर संचालित होता’ ऐसा मेरे पटिसंविचरित करने पर अभ्यर्थ गमन होता; ‘दोनों व्याबाधा की ओर संचालित होता’ ऐसा मेरे पटिसंविचरित करने पर अभ्यर्थ गमन होता; ‘प्रज्ञा-निरोधक, विघात-पक्षिक, अनिब्बान-संवत्तनिक’ ऐसा मेरे पटिसंविचरित करने पर अभ्यर्थ गमन होता। भिक्षुओं! मैंने उत्पन्न-उत्पन्न काम-वितर्क को त्याग ही दिया, विनोद ही किया, व्यतिक्रम ही किया।


3. “भिक्षुओं! मेरे इस प्रकार अप्रमत्त, उत्साही, संकल्पशील रहने पर व्यापाद-वितर्क उत्पन्न होता... (इत्यादि)... हिंसा-वितर्क उत्पन्न होता। मैं इस प्रकार जानता—‘यह मेरे लिए उत्पन्न हिंसा-वितर्क है। और यह स्व-व्याबाधा की ओर संचालित होता, पर-व्याबाधा की ओर संचालित होता, दोनों व्याबाधा की ओर संचालित होता, प्रज्ञा-निरोधक, विघात-पक्षिक, अनिब्बान-संवत्तनिक।’ भिक्षुओं! ‘स्व-व्याबाधा की ओर संचालित होता’ ऐसा मेरे पटिसंविचरित करने पर अभ्यर्थ गमन होता; ‘पर-व्याबाधा की ओर संचालित होता’ ऐसा मेरे पटिसंविचरित करने पर अभ्यर्थ गमन होता; ‘दोनों व्याबाधा की ओर संचालित होता’ ऐसा मेरे पटिसंविचरित करने पर अभ्यर्थ गमन होता; ‘प्रज्ञा-निरोधक, विघात-पक्षिक, अनिब्बान-संवत्तनिक’ ऐसा मेरे पटिसंविचरित करने पर अभ्यर्थ गमन होता। भिक्षुओं! मैंने उत्पन्न-उत्पन्न हिंसा-वितर्क को त्याग ही दिया, विनोद ही किया, व्यतिक्रम ही किया।


भिक्षुओं! जो कोई भी भिक्षु जिस-जिस वितर्क का बहुल अनुवितर्क करता, अनुविचार करता, उसी-उसी प्रकार चित्त का नम्र होता। भिक्षुओं! यदि भिक्षु काम-वितर्क का बहुल अनुवितर्क करता, अनुविचार करता, नेक्खम्म-वितर्क को त्याग देता, काम-वितर्क को बहुल रखता, उसके चित्त का काम-वितर्क की ओर नम्र होता। भिक्षुओं! यदि व्यापाद-वितर्क का... (इत्यादि)... यदि भिक्षु हिंसा-वितर्क का बहुल अनुवितर्क करता, अनुविचार करता, अहिंसा-वितर्क को त्याग देता, हिंसा-वितर्क को बहुल रखता, उसके चित्त का हिंसा-वितर्क की ओर नम्र होता। भिक्षुओं! जैसे ग्रीष्म के पश्चिम मास में सब ओर गाँव-सीमा से घिरे हुए गोपालक गौओं की रक्षा करे। वह उन गौओं को इधर-उधर दंड से मारता, प्रतिमारता, संनिरुंधता, संनिवारेता। क्यों? क्योंकि भिक्षुओं! वह गोपालक देखता है कि उस कारण से वध या बंधन या जान या गरह। भिक्षुओं! इसी प्रकार मैंने अकुशल धम्मों का अधीनव, ओकार, कलुष देखा, कुशल धम्मों का नेक्खम्म, आनिसंस, शुद्धि-पक्ष।


4. “भिक्षुओं! मेरे इस प्रकार अप्रमत्त, उत्साही, संकल्पशील रहने पर नेक्खम्म-वितर्क उत्पन्न होता। मैं इस प्रकार जानता—‘यह मेरे लिए उत्पन्न नेक्खम्म-वितर्क है। और यह न तो स्व-व्याबाधा की ओर संचालित होता, न पर-व्याबाधा की ओर संचालित होता, न दोनों व्याबाधा की ओर संचालित होता, प्रज्ञा-वृद्धिक, अविघात-पक्षिक, निब्बान-संवत्तनिक।’ भिक्षुओं! यदि रात्रि को भी मैं उसका अनुवितर्क करूँ, अनुविचार करूँ, तो भी उस कारण से भय न देखता। भिक्षुओं! यदि दिवस को भी मैं उसका अनुवितर्क करूँ, अनुविचार करूँ, तो भी उस कारण से भय न देखता। भिक्षुओं! यदि रात्रि-दिवस भी मैं उसका अनुवितर्क करूँ, अनुविचार करूँ, तो भी उस कारण से भय न देखता। किन्तु भिक्षुओं! अति-दीर्घ अनुवितर्क करने, अनुविचार करने से काय क्लान्त होता। काय के क्लान्त होने पर चित्त ऊहता। ऊहते चित्त को दूर चित्त एकाग्र होता। भिक्षुओं! मैं अंतर्मन में ही चित्त को स्थिर करता, संनिसादता, एकाग्र करता, संयोजित करता। क्यों? ‘मेरा चित्त ऊह न हो।’


5. “भिक्षुओं! मेरे इस प्रकार अप्रमत्त, उत्साही, संकल्पशील रहने पर अद्वेष-वितर्क उत्पन्न होता... (इत्यादि)... अहिंसा-वितर्क उत्पन्न होता। मैं इस प्रकार जानता—‘यह मेरे लिए उत्पन्न अहिंसा-वितर्क है। और यह न तो स्व-व्याबाधा की ओर संचालित होता, न पर-व्याबाधा की ओर संचालित होता, न दोनों व्याबाधा की ओर संचालित होता, प्रज्ञा-वृद्धिक, अविघात-पक्षिक, निब्बान-संवत्तनिक।’ भिक्षुओं! यदि रात्रि को भी मैं उसका अनुवितर्क करूँ, अनुविचार करूँ, तो भी उस कारण से भय न देखता। भिक्षुओं! यदि दिवस को भी मैं उसका अनुवितर्क करूँ, अनुविचार करूँ, तो भी उस कारण से भय न देखता। भिक्षुओं! यदि रात्रि-दिवस भी मैं उसका अनुवितर्क करूँ, अनुविचार करूँ, तो भी उस कारण से भय न देखता। किन्तु भिक्षुओं! अति-दीर्घ अनुवितर्क करने, अनुविचार करने से काय क्लान्त होता। काय के क्लान्त होने पर चित्त ऊहता। ऊहते चित्त को दूर चित्त एकाग्र होता। भिक्षुओं! मैं अंतर्मन में ही चित्त को स्थिर करता, संनिसादता, एकाग्र करता, संयोजित करता। क्यों? ‘मेरा चित्त ऊह न हो।’


भिक्षुओं! जो कोई भी भिक्षु जिस-जिस वितर्क का बहुल अनुवितर्क करता, अनुविचार करता, उसी-उसी प्रकार चित्त का नम्र होता। भिक्षुओं! यदि भिक्षु नेक्खम्म-वितर्क का बहुल अनुवितर्क करता, अनुविचार करता, काम-वितर्क को त्याग देता, नेक्खम्म-वितर्क को बहुल रखता, उसके चित्त का नेक्खम्म-वितर्क की ओर नम्र होता। भिक्षुओं! यदि अद्वेष-वितर्क का... (इत्यादि)... यदि भिक्षु अहिंसा-वितर्क का बहुल अनुवितर्क करता, अनुविचार करता, हिंसा-वितर्क को त्याग देता, अहिंसा-वितर्क को बहुल रखता, उसके चित्त का अहिंसा-वितर्क की ओर नम्र होता। भिक्षुओं! जैसे ग्रीष्म के पश्चिम मास में सब ओर गाँव-सीमा से घिरे हुए गोपालक गौओं की रक्षा करे, उसके रुक्खमूल-गत या अब्भोकास-गत के लिए स्मरणीय ही होता—‘ये गौएँ’। भिक्षुओं! इसी प्रकार स्मरणीय ही था—‘ये धम्म हैं।’


6. “भिक्षुओं! मेरा वीर्य प्रबल था, अस्लीन, स्मृति उपस्थित असम्मुट्ठ, काय शिथिल असारद्ध, चित्त एकाग्र एकग्ग। भिक्षुओं! मैं कामों से अलग होकर, अकुशल धम्मों से अलग होकर विचार-विचारणा सहित, विवेक से उत्पन्न प्रीति-सुख वाले प्रथम ध्यान में प्रवेश करके रहा। विचार-विचारणा का शांत होना, अंतर्मन का प्रसन्न होना, चित्त का एकाग्र होना अवितर्क-अविचार समाधिज से उत्पन्न प्रीति-सुख वाले द्वितीय ध्यान में प्रवेश करके रहा। प्रीति का वैराग्य होकर उपेक्षा करने वाला रहा, स्मृतिसंपन्न सम्पजान, शरीर द्वारा सुख का अनुभव किया, जो आर्य कहते हैं ‘उपेक्षा करने वाला स्मृतिमान सुख में रहने वाला’, तीसरा ध्यान में प्रवेश करके रहा। सुख का त्याग, दुःख का त्याग, पूर्व सोमनस्स-दोमनस्स का अन्त होकर न दुःख न सुख उपेक्षा-स्मृति-पारिशुद्धि वाला चतुर्थ ध्यान में प्रवेश करके रहा।


7. “इस प्रकार एकाग्र चित्त में शुद्ध, प्रकाशित, निर्दोष, विगत-उपकलेश, कोमल, कार्य-योग्य, स्थित, अनेज्ज, पूर्वजन्म-स्मृति-ज्ञान के लिए चित्त को प्रवृत्त किया। भिक्षुओं! मैं अनेक प्रकार के पूर्वजन्मों का स्मरण करता... (इत्यादि)... इस प्रकार साकार-सुद्देस अनेक प्रकार के पूर्वजन्मों का स्मरण करता। भिक्षुओं! यह मेरी रात्रि के प्रथम भाग में प्रथम विज्ञान प्राप्त हुआ; अज्ञान नष्ट, ज्ञान उत्पन्न; अंधकार नष्ट, प्रकाश उत्पन्न; अप्रमत्त, उत्साही, संकल्पशील रहने पर।


8. “इस प्रकार एकाग्र चित्त में शुद्ध, प्रकाशित, निर्दोष, विगत-उपकलेश, कोमल, कार्य-योग्य, स्थित, अनेज्ज, प्राणियों के मरण-उत्पत्ति-ज्ञान के लिए चित्त को प्रवृत्त किया। भिक्षुओं! मैं दिव्य चक्षु से शुद्ध, मानुष्य चक्षु से श्रेष्ठ प्राणियों को मरते हुए, उत्पन्न होते हुए... (इत्यादि)... यथाकम्मूपग प्राणियों को जानता... (इत्यादि)...। भिक्षुओं! यह मेरी रात्रि के मध्य भाग में द्वितीय विज्ञान प्राप्त हुआ; अज्ञान नष्ट, ज्ञान उत्पन्न; अंधकार नष्ट, प्रकाश उत्पन्न; अप्रमत्त, उत्साही, संकल्पशील रहने पर।


9. “इस प्रकार एकाग्र चित्त में शुद्ध, प्रकाशित, निर्दोष, विगत-उपकलेश, कोमल, कार्य-योग्य, स्थित, अनेज्ज, आस्रव-क्षय-ज्ञान के लिए चित्त को प्रवृत्त किया। भिक्षुओं! मैं ‘यह दुःख है’ यथार्थ जानता, ‘यह दुःख-समुदय है’ यथार्थ जानता, ‘यह दुःख-निरोध है’ यथार्थ जानता, ‘यह दुःख-निरोधगामी मार्ग है’ यथार्थ जानता। ‘ये आस्रव हैं’ यथार्थ जानता, ‘यह आस्रव-समुदय है’ यथार्थ जानता, ‘यह आस्रव-निरोध है’ यथार्थ जानता, ‘यह आस्रव-निरोधगामी मार्ग है’ यथार्थ जानता। भिक्षुओं! मेरे इस प्रकार जानने पर, देखने पर काम-आस्रव भी चित्त मुक्त हुआ, भव-आस्रव भी चित्त मुक्त हुआ, अज्ञान-आस्रव भी चित्त मुक्त हुआ, मुक्त में ‘मुक्त है’ ऐसा ज्ञान हुआ—‘निरोधित है जन्म, पूर्ण किया गया ब्रह्मचर्य, किया गया करना योग्य, इससे आगे इस जीवन का कुछ नहीं’ ऐसा जानता। भिक्षुओं! यह मेरी रात्रि के पश्चिम भाग में तृतीय विज्ञान प्राप्त हुआ; अज्ञान नष्ट, ज्ञान उत्पन्न; अंधकार नष्ट, प्रकाश उत्पन्न; अप्रमत्त, उत्साही, संकल्पशील रहने पर।


10. “भिक्षुओं! जैसे जंगल में गहरे नाले में महान् पलाल। वहाँ महामृग-समूह निर्भर होकर रहता। भिक्षुओं! वहाँ कोई पुरुष उत्पन्न हो अनर्थकाम, अहितकाम, अयोग-क्षेमकाम। वह जिस मार्ग का सुरक्षित, सोवत्थिक, प्रीति-गामी था उसे बंद कर दे, कुम्मग्ग को खोल दे, ओकचर को स्थापित कर दे, ओकचारिक को ठहरा दे। भिक्षुओं! इस प्रकार वह महामृग-समूह दूसरे समय अनय-विपत्ति प्राप्त करेगा। भिक्षुओं! उसी महान् मृग-समूह में कोई पुरुष उत्पन्न हो अर्थकाम, हितकाम, योग-क्षेमकाम। वह जिस मार्ग का सुरक्षित, सोवत्थिक, प्रीति-गामी था उसे खोल दे, कुम्मग्ग को बंद कर दे, ओकचर को उखाड़ दे, ओकचारिक को नष्ट कर दे। भिक्षुओं! इस प्रकार वह महामृग-समूह दूसरे समय वृद्धि, विस्तार, वेपुल्ल प्राप्त करेगा।


भिक्षुओं! यह उपमा मेरे द्वारा अर्थ के विञ्ञापन के लिए कही गई। भिक्षुओं! इसका यह अर्थ है—महान् गहन पलाल ही कामों का संकेत है। महामृग-समूह ही प्राणियों का संकेत है। अनर्थकाम, अहितकाम, अयोग-क्षेमकाम पुरुष ही मार के पापिमा का संकेत है। कुम्मग्ग ही मिथ्या-अष्टांगिक मार्ग का संकेत है, अर्थात् मिथ्यादृष्टि, मिथ्यासंकल्प, मिथ्यावाक्य, मिथ्याकर्म, मिथ्याजीव, मिथ्यावायाम, मिथ्यास्मृति, मिथ्यसमाधि। ओकचर ही नंदी-राग का संकेत है। ओकचारिक ही अज्ञान का संकेत है। अर्थकाम, हितकाम, योग-क्षेमकाम पुरुष ही तथागत का संकेत है, अर्हत् सम्यक्-संबुद्ध का। सुरक्षित मार्ग, सोवत्थिक, प्रीति-गामी ही आर्य अष्टांगिक मार्ग का संकेत है, अर्थात् सम्यग्दृष्टि, सम्यक्संकल्प, सम्यग्वाक्य, सम्यग्कर्म, सम्यग्जीव, सम्यग्वायाम, सम्यग्स्मृति, सम्यग्समाधि।


भिक्षुओं! इस प्रकार मेरे द्वारा सुरक्षित मार्ग खोला गया, कुम्मग्ग बंद किया गया, ओकचर उखाड़ा गया, ओकचारिक नष्ट किया गया। भिक्षुओं! जो गुरु के शिष्यों के हित के लिए, करुणा से, करुणा ग्रहण करके करने योग्य है, वह मैंने तुम्हारे लिए किया। भिक्षुओं! ये वृक्ष-मूल हैं, ये खाली घर हैं; ध्यान करो, भिक्षुओं! प्रमाद न करो; पश्चात्ताप न करने वाले हो जाओ। यह हमारा उपदेश है।”


भगवान् ने इस प्रकार कहा। प्रसन्न होकर वे भिक्षु भगवान् की वाणी का अभिनंदन करते हुए।


द्वेधावितर्क सुत्त समाप्त, नवम्।


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