7. वनपत्थसुत्त

Dhamma Skandha
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1. इस प्रकार मैंने सुना—एक समय भगवान् सावत्थि नगर में जेतवन उद्यान के अनाथपिण्डिक के आश्रम में ठहर रहे थे। वहाँ भगवान् ने भिक्षुओं को बुलाया—“भिक्षुओं!” “भदन्त!” वे भिक्षु भगवान् के सम्मति से उत्तर देते हुए बोले। भगवान् ने कहा—“भिक्षुओं! मैं तुम्हें वनपथ-प्रवाह का उपदेश दूँगा, सुनो, अच्छी तरह मन में रखो, मैं कह रहा हूँ।” “ऐसा है, भन्ते!” वे भिक्षु भगवान् के सम्मति से बोले। भगवान् ने कहा—


2. “भिक्षुओं! यहाँ भिक्षु किसी-किसी वनपथ पर निर्भर होकर रहता है। उसके उस वनपथ पर निर्भर होकर रहने पर स्मृति न उपस्थित होती, असंयमित चित्त एकाग्र नहीं होता, अपरिक्षीण आस्रव क्षय को नहीं जाते, अनुप्राप्त अनुत्तर योग-क्षेम प्राप्त नहीं होता। जो ये भिक्षु द्वारा जीविका के लिए संग्रहित करने योग्य हैं—वस्त्र, भिक्षा-भोजन, निवास-स्थान, गिलान-पच्चय-भेसज्ज-परिक्खार—वे कष्ट से प्राप्त होते। इसलिए, भिक्षुओं! भिक्षु को इस प्रकार पटिसंविचरित करना चाहिए—‘मैं इस वनपथ पर निर्भर होकर रहता हूँ। मेरे इस वनपथ पर निर्भर होकर रहने पर स्मृति न उपस्थित होती, असंयमित चित्त एकाग्र नहीं होता, अपरिक्षीण आस्रव क्षय को नहीं जाते, अनुप्राप्त अनुत्तर योग-क्षेम प्राप्त नहीं होता। जो ये भिक्षु द्वारा जीविका के लिए संग्रहित करने योग्य हैं—वस्त्र, भिक्षा-भोजन, निवास-स्थान, गिलान-पच्चय-भेसज्ज-परिक्खार—वे कष्ट से प्राप्त होते।’ इसलिए, भिक्षुओं! भिक्षु को रात्रि-भाग या दिवस-भाग में उस वनपथ से प्रस्थान करना चाहिए, न रहना चाहिए।


3. “भिक्षुओं! यहाँ भिक्षु किसी-किसी वनपथ पर निर्भर होकर रहता है। उसके उस वनपथ पर निर्भर होकर रहने पर स्मृति न उपस्थित होती, असंयमित चित्त एकाग्र नहीं होता, अपरिक्षीण आस्रव क्षय को नहीं जाते, अनुप्राप्त अनुत्तर योग-क्षेम प्राप्त नहीं होता। जो ये भिक्षु द्वारा जीविका के लिए संग्रहित करने योग्य हैं—वस्त्र, भिक्षा-भोजन, निवास-स्थान, गिलान-पच्चय-भेसज्ज-परिक्खार—वे थोड़े कष्ट से प्राप्त होते। इसलिए, भिक्षुओं! भिक्षु को इस प्रकार पटिसंविचरित करना चाहिए—‘मैं इस वनपथ पर निर्भर होकर रहता हूँ। मेरे इस वनपथ पर निर्भर होकर रहने पर स्मृति न उपस्थित होती, असंयमित चित्त एकाग्र नहीं होता, अपरिक्षीण आस्रव क्षय को नहीं जाते, अनुप्राप्त अनुत्तर योग-क्षेम प्राप्त नहीं होता। जो ये भिक्षु द्वारा जीविका के लिए संग्रहित करने योग्य हैं—वस्त्र, भिक्षा-भोजन, निवास-स्थान, गिलान-पच्चय-भेसज्ज-परिक्खार—वे थोड़े कष्ट से प्राप्त होते। किन्तु मैं वस्त्र-कारण से गृहत्याग कर अनगार नहीं हुआ, न भिक्षा-भोजन-कारण से... न निवास-स्थान-कारण से... न गिलान-पच्चय-भेसज्ज-परिक्खार-कारण से गृहत्याग कर अनगार हुआ। फिर भी मेरे इस वनपथ पर निर्भर होकर रहने पर स्मृति न उपस्थित होती, असंयमित चित्त एकाग्र नहीं होता, अपरिक्षीण आस्रव क्षय को नहीं जाते, अनुप्राप्त अनुत्तर योग-क्षेम प्राप्त नहीं होता।’ इसलिए, भिक्षुओं! भिक्षु को संभव होने पर उस वनपथ से प्रस्थान करना चाहिए, न रहना चाहिए।


4. “भिक्षुओं! यहाँ भिक्षु किसी-किसी वनपथ पर निर्भर होकर रहता है। उसके उस वनपथ पर निर्भर होकर रहने पर स्मृति उपस्थित होती, असंयमित चित्त एकाग्र होता, अपरिक्षीण आस्रव क्षय को जाते, अनुप्राप्त अनुत्तर योग-क्षेम प्राप्त होता। जो ये भिक्षु द्वारा जीविका के लिए संग्रहित करने योग्य हैं—वस्त्र, भिक्षा-भोजन, निवास-स्थान, गिलान-पच्चय-भेसज्ज-परिक्खार—वे कष्ट से प्राप्त होते। इसलिए, भिक्षुओं! भिक्षु को इस प्रकार पटिसंविचरित करना चाहिए—‘मैं इस वनपथ पर निर्भर होकर रहता हूँ। मेरे इस वनपथ पर निर्भर होकर रहने पर स्मृति उपस्थित होती, असंयमित चित्त एकाग्र होता, अपरिक्षीण आस्रव क्षय को जाते, अनुप्राप्त अनुत्तर योग-क्षेम प्राप्त होता। जो ये भिक्षु द्वारा जीविका के लिए संग्रहित करने योग्य हैं—वस्त्र, भिक्षा-भोजन, निवास-स्थान, गिलान-पच्चय-भेसज्ज-परिक्खार—वे कष्ट से प्राप्त होते। किन्तु मैं वस्त्र-कारण से गृहत्याग कर अनगार नहीं हुआ, न भिक्षा-भोजन-कारण से... न निवास-स्थान-कारण से... न गिलान-पच्चय-भेसज्ज-परिक्खार-कारण से गृहत्याग कर अनगार हुआ। फिर भी मेरे इस वनपथ पर निर्भर होकर रहने पर स्मृति उपस्थित होती, असंयमित चित्त एकाग्र होता, अपरिक्षीण आस्रव क्षय को जाते, अनुप्राप्त अनुत्तर योग-क्षेम प्राप्त होता।’ इसलिए, भिक्षुओं! भिक्षु को संभव होने पर उस वनपथ में रहना चाहिए, न प्रस्थान करना चाहिए।


5. “भिक्षुओं! यहाँ भिक्षु किसी-किसी वनपथ पर निर्भर होकर रहता है। उसके उस वनपथ पर निर्भर होकर रहने पर स्मृति उपस्थित होती, असंयमित चित्त एकाग्र होता, अपरिक्षीण आस्रव क्षय को जाते, अनुप्राप्त अनुत्तर योग-क्षेम प्राप्त होता। जो ये भिक्षु द्वारा जीविका के लिए संग्रहित करने योग्य हैं—वस्त्र, भिक्षा-भोजन, निवास-स्थान, गिलान-पच्चय-भेसज्ज-परिक्खार—वे थोड़े कष्ट से प्राप्त होते। इसलिए, भिक्षुओं! भिक्षु को इस प्रकार पटिसंविचरित करना चाहिए—‘मैं इस वनपथ पर निर्भर होकर रहता हूँ। मेरे इस वनपथ पर निर्भर होकर रहने पर स्मृति उपस्थित होती, असंयमित चित्त एकाग्र होता, अपरिक्षीण आस्रव क्षय को जाते, अनुप्राप्त अनुत्तर योग-क्षेम प्राप्त होता। जो ये भिक्षु द्वारा जीविका के लिए संग्रहित करने योग्य हैं—वस्त्र, भिक्षा-भोजन, निवास-स्थान, गिलान-पच्चय-भेसज्ज-परिक्खार—वे थोड़े कष्ट से प्राप्त होते।’ इसलिए, भिक्षुओं! भिक्षु को जीवन भर उस वनपथ में रहना चाहिए, न प्रस्थान करना चाहिए।


6. “भिक्षुओं! यहाँ भिक्षु किसी-किसी गाँव पर निर्भर होकर रहता... (इत्यादि)... किसी-किसी निगम पर निर्भर होकर रहता... किसी-किसी नगर पर निर्भर होकर रहता... किसी-किसी जनपद पर निर्भर होकर रहता... किसी-किसी व्यक्ति पर निर्भर होकर रहता। उसके उस व्यक्ति पर निर्भर होकर रहने पर स्मृति न उपस्थित होती, असंयमित चित्त एकाग्र नहीं होता, अपरिक्षीण आस्रव क्षय को नहीं जाते, अनुप्राप्त अनुत्तर योग-क्षेम प्राप्त नहीं होता। जो ये भिक्षु द्वारा जीविका के लिए संग्रहित करने योग्य हैं—वस्त्र, भिक्षा-भोजन, निवास-स्थान, गिलान-पच्चय-भेसज्ज-परिक्खार—वे कष्ट से प्राप्त होते। इसलिए, भिक्षुओं! भिक्षु को इस प्रकार पटिसंविचरित करना चाहिए—‘मैं इस व्यक्ति पर निर्भर होकर रहता हूँ। मेरे इस व्यक्ति पर निर्भर होकर रहने पर स्मृति न उपस्थित होती, असंयमित चित्त एकाग्र नहीं होता, अपरिक्षीण आस्रव क्षय को नहीं जाते, अनुप्राप्त अनुत्तर योग-क्षेम प्राप्त नहीं होता। जो ये भिक्षु द्वारा जीविका के लिए संग्रहित करने योग्य हैं—वस्त्र, भिक्षा-भोजन, निवास-स्थान, गिलान-पच्चय-भेसज्ज-परिक्खार—वे कष्ट से प्राप्त होते।’ इसलिए, भिक्षुओं! भिक्षु को रात्रि-भाग या दिवस-भाग में वह व्यक्ति बिना पूछे प्रस्थान करना चाहिए, न अनुबंधित होना चाहिए।


7. “भिक्षुओं! यहाँ भिक्षु किसी-किसी व्यक्ति पर निर्भर होकर रहता है। उसके उस व्यक्ति पर निर्भर होकर रहने पर स्मृति न उपस्थित होती, असंयमित चित्त एकाग्र नहीं होता, अपरिक्षीण आस्रव क्षय को नहीं जाते, अनुप्राप्त अनुत्तर योग-क्षेम प्राप्त नहीं होता। जो ये भिक्षु द्वारा जीविका के लिए संग्रहित करने योग्य हैं—वस्त्र, भिक्षा-भोजन, निवास-स्थान, गिलान-पच्चय-भेसज्ज-परिक्खार—वे थोड़े कष्ट से प्राप्त होते। इसलिए, भिक्षुओं! भिक्षु को इस प्रकार पटिसंविचरित करना चाहिए—‘मैं इस व्यक्ति पर निर्भर होकर रहता हूँ। मेरे इस व्यक्ति पर निर्भर होकर रहने पर स्मृति न उपस्थित होती, असंयमित चित्त एकाग्र नहीं होता, अपरिक्षीण आस्रव क्षय को नहीं जाते, अनुप्राप्त अनुत्तर योग-क्षेम प्राप्त नहीं होता। जो ये भिक्षु द्वारा जीविका के लिए संग्रहित करने योग्य हैं—वस्त्र, भिक्षा-भोजन, निवास-स्थान, गिलान-पच्चय-भेसज्ज-परिक्खार—वे थोड़े कष्ट से प्राप्त होते। किन्तु मैं वस्त्र-कारण से गृहत्याग कर अनगार नहीं हुआ, न भिक्षा-भोजन-कारण से... न निवास-स्थान-कारण से... न गिलान-पच्चय-भेसज्ज-परिक्खार-कारण से गृहत्याग कर अनगार हुआ। फिर भी मेरे इस व्यक्ति पर निर्भर होकर रहने पर स्मृति न उपस्थित होती, असंयमित चित्त एकाग्र नहीं होता, अपरिक्षीण आस्रव क्षय को नहीं जाते, अनुप्राप्त अनुत्तर योग-क्षेम प्राप्त नहीं होता।’ इसलिए, भिक्षुओं! भिक्षु को संभव होने पर वह व्यक्ति पूछकर प्रस्थान करना चाहिए, न अनुबंधित होना चाहिए।


8. “भिक्षुओं! यहाँ भिक्षु किसी-किसी व्यक्ति पर निर्भर होकर रहता है। उसके उस व्यक्ति पर निर्भर होकर रहने पर स्मृति उपस्थित होती, असंयमित चित्त एकाग्र होता, अपरिक्षीण आस्रव क्षय को जाते, अनुप्राप्त अनुत्तर योग-क्षेम प्राप्त होता। जो ये भिक्षु द्वारा जीविका के लिए संग्रहित करने योग्य हैं—वस्त्र, भिक्षा-भोजन, निवास-स्थान, गिलान-पच्चय-भेसज्ज-परिक्खार—वे कष्ट से प्राप्त होते। इसलिए, भिक्षुओं! भिक्षु को इस प्रकार पटिसंविचरित करना चाहिए—‘मैं इस व्यक्ति पर निर्भर होकर रहता हूँ। मेरे इस व्यक्ति पर निर्भर होकर रहने पर स्मृति उपस्थित होती, असंयमित चित्त एकाग्र होता, अपरिक्षीण आस्रव क्षय को जाते, अनुप्राप्त अनुत्तर योग-क्षेम प्राप्त होता। जो ये भिक्षु द्वारा जीविका के लिए संग्रहित करने योग्य हैं—वस्त्र, भिक्षा-भोजन, निवास-स्थान, गिलान-पच्चय-भेसज्ज-परिक्खार—वे कष्ट से प्राप्त होते। किन्तु मैं वस्त्र-कारण से गृहत्याग कर अनगार नहीं हुआ, न भिक्षा-भोजन-कारण से... न निवास-स्थान-कारण से... न गिलान-पच्चय-भेसज्ज-परिक्खार-कारण से गृहत्याग कर अनगार हुआ। फिर भी मेरे इस व्यक्ति पर निर्भर होकर रहने पर स्मृति उपस्थित होती, असंयमित चित्त एकाग्र होता, अपरिक्षीण आस्रव क्षय को जाते, अनुप्राप्त अनुत्तर योग-क्षेम प्राप्त होता।’ इसलिए, भिक्षुओं! भिक्षु को संभव होने पर वह व्यक्ति अनुबंधित होना चाहिए, न प्रस्थान करना चाहिए।


9. “भिक्षुओं! यहाँ भिक्षु किसी-किसी व्यक्ति पर निर्भर होकर रहता है। उसके उस व्यक्ति पर निर्भर होकर रहने पर स्मृति उपस्थित होती, असंयमित चित्त एकाग्र होता, अपरिक्षीण आस्रव क्षय को जाते, अनुप्राप्त अनुत्तर योग-क्षेम प्राप्त होता। जो ये भिक्षु द्वारा जीविका के लिए संग्रहित करने योग्य हैं—वस्त्र, भिक्षा-भोजन, निवास-स्थान, गिलान-पच्चय-भेसज्ज-परिक्खार—वे थोड़े कष्ट से प्राप्त होते। इसलिए, भिक्षुओं! भिक्षु को इस प्रकार पटिसंविचरित करना चाहिए—‘मैं इस व्यक्ति पर निर्भर होकर रहता हूँ। मेरे इस व्यक्ति पर निर्भर होकर रहने पर स्मृति उपस्थित होती, असंयमित चित्त एकाग्र होता, अपरिक्षीण आस्रव क्षय को जाते, अनुप्राप्त अनुत्तर योग-क्षेम प्राप्त होता। जो ये भिक्षु द्वारा जीविका के लिए संग्रहित करने योग्य हैं—वस्त्र, भिक्षा-भोजन, निवास-स्थान, गिलान-पच्चय-भेसज्ज-परिक्खार—वे थोड़े कष्ट से प्राप्त होते।’ इसलिए, भिक्षुओं! भिक्षु को जीवन भर वह व्यक्ति अनुबंधित होना चाहिए, न प्रस्थान करना चाहिए, अपितु उत्पन्न होने पर भी।”


भगवान् ने इस प्रकार कहा। प्रसन्न होकर वे भिक्षु भगवान् की वाणी का अभिनंदन करते हुए।

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