1. इस प्रकार मैंने सुना—एक समय भगवान् सावत्थि नगर में जेतवन उद्यान के अनाथपिण्डिक के आश्रम में ठहर रहे थे। वहाँ भगवान् ने भिक्षुओं को बुलाया—“भिक्षुओं!” “भदन्त!” वे भिक्षु भगवान् के सम्मति से उत्तर देते हुए बोले। भगवान् ने कहा—
“भिक्षुओं! किसी भी भिक्षु के पाँच चेतोखिल (चित्त के काँटे) अप्रहीण हों, पाँच चेतसोविनिबंध (चित्त के बंधन) असमुच्छिन्न (अनिरुद्ध) हों, तो इस धम्म-विनय में वृद्धि, विस्तार, वेपुल्ल प्राप्त करेगा—ऐसा संभव नहीं।
पाँच चेतोखिल अप्रहीण कौन से होते हैं? यहाँ, भिक्षुओं! भिक्षु गुरु में संदेह करता, विचिकिच्छ करता, न अधिमुत्त होता, न सम्पसीद होता। भिक्षुओं! जितना भिक्षु गुरु में संदेह करता, विचिकिच्छ करता, न अधिमुत्त होता, न सम्पसीद होता, उसके चित्त का नम्रता नहीं होती उत्साह के लिए, अनुयोग के लिए, सत्य के लिए, प्रयास के लिए। जिसका चित्त नम्रता नहीं करता उत्साह के लिए, अनुयोग के लिए, सत्य के लिए, प्रयास के लिए, उसके लिए यह प्रथम चेतोखिल अप्रहीण होता।
फिर भी, भिक्षुओं! भिक्षु धम्म में संदेह करता, विचिकिच्छ करता, न अधिमुत्त होता, न सम्पसीद होता... (इत्यादि)... उसके लिए यह द्वितीय चेतोखिल अप्रहीण होता।
फिर भी, भिक्षुओं! भिक्षु संघ में संदेह करता, विचिकिच्छ करता, न अधिमुत्त होता, न सम्पसीद होता... (इत्यादि)... उसके लिए यह तृतीय चेतोखिल अप्रहीण होता।
फिर भी, भिक्षुओं! भिक्षु शील में संदेह करता, विचिकिच्छ करता, न अधिमुत्त होता, न सम्पसीद होता। भिक्षुओं! जितना भिक्षु शील में संदेह करता, विचिकिच्छ करता, न अधिमुत्त होता, न सम्पसीद होता, उसके चित्त का नम्रता नहीं होती उत्साह के लिए, अनुयोग के लिए, सत्य के लिए, प्रयास के लिए। जिसका चित्त नम्रता नहीं करता उत्साह के लिए, अनुयोग के लिए, सत्य के लिए, प्रयास के लिए, उसके लिए यह चतुर्थ चेतोखिल अप्रहीण होता।
फिर भी, भिक्षुओं! भिक्षु सह-ब्रह्मचारी में क्रोधित होता, अनत्तमना, आहतचित्त, खिलजात होता। भिक्षुओं! जितना भिक्षु सह-ब्रह्मचारी में क्रोधित होता, अनत्तमना, आहतचित्त, खिलजात होता, उसके चित्त का नम्रता नहीं होती उत्साह के लिए, अनुयोग के लिए, सत्य के लिए, प्रयास के लिए। जिसका चित्त नम्रता नहीं करता उत्साह के लिए, अनुयोग के लिए, सत्य के लिए, प्रयास के लिए, उसके लिए यह पंचम चेतोखिल अप्रहीण होता। उसके पाँच चेतोखिल अप्रहीण होते।
2. “पाँच चेतसोविनिबंध असमुच्छिन्न कौन से होते हैं? यहाँ, भिक्षुओं! भिक्षु कामों में अवीरक्त होता, विगत-छन्द, विगत-पेम, विगत-पिपास, विगत-परिळाह, विगत-तृष्णा होता। भिक्षुओं! जितना भिक्षु कामों में अवीरक्त होता, विगत-छन्द, विगत-पेम, विगत-पिपास, विगत-परिळाह, विगत-तृष्णा होता, उसके चित्त का नम्रता होती उत्साह के लिए, अनुयोग के लिए, सत्य के लिए, प्रयास के लिए। जिसका चित्त नम्रता करता उत्साह के लिए, अनुयोग के लिए, सत्य के लिए, प्रयास के लिए, उसके लिए यह प्रथम चेतसोविनिबंध सुसमुच्छिन्न होता।
फिर भी, भिक्षुओं! भिक्षु काय में अवीरक्त होता... (इत्यादि)... उसके लिए यह द्वितीय चेतसोविनिबंध सुसमुच्छिन्न होता।
फिर भी, भिक्षुओं! भिक्षु रूप में अवीरक्त होता... (इत्यादि)... उसके लिए यह तृतीय चेतसोविनिबंध सुसमुच्छिन्न होता।
फिर भी, भिक्षुओं! भिक्षु उदरावदेहक मात्र भोजन करके शयन-सुख, प्रश्वास-सुख, मिद्ध-सुख में अनुरक्त रहता। भिक्षुओं! जितना भिक्षु उदरावदेहक मात्र भोजन करके शयन-सुख, प्रश्वास-सुख, मिद्ध-सुख में अनुरक्त रहता, उसके चित्त का नम्रता होती उत्साह के लिए, अनुयोग के लिए, सत्य के लिए, प्रयास के लिए। जिसका चित्त नम्रता करता उत्साह के लिए, अनुयोग के लिए, सत्य के लिए, प्रयास के लिए, उसके लिए यह चतुर्थ चेतसोविनिबंध सुसमुच्छिन्न होता।
फिर भी, भिक्षुओं! भिक्षु किसी-किसी देव-निकाय को लक्ष्य करके ब्रह्मचर्य चरता—‘इस शील से या व्रत से या तप से या ब्रह्मचर्य से मैं देव होऊँगा या श्रेष्ठ देव’। भिक्षुओं! जितना भिक्षु किसी-किसी देव-निकाय को लक्ष्य करके ब्रह्मचर्य चरता—‘इस शील से या व्रत से या तप से या ब्रह्मचर्य से मैं देव होऊँगा या श्रेष्ठ देव’, उसके चित्त का नम्रता होती उत्साह के लिए, अनुयोग के लिए, सत्य के लिए, प्रयास के लिए। जिसका चित्त नम्रता करता उत्साह के लिए, अनुयोग के लिए, सत्य के लिए, प्रयास के लिए, उसके लिए यह पंचम चेतसोविनिबंध सुसमुच्छिन्न होता। उसके पाँच चेतसोविनिबंध सुसमुच्छिन्न होते।
भिक्षुओं! किसी भी भिक्षु के ये पाँच चेतोखिल प्रहीण हों, ये पाँच चेतसोविनिबंध सुसमुच्छिन्न हों, तो इस धम्म-विनय में वृद्धि, विस्तार, वेपुल्ल प्राप्त करेगा—ऐसा संभव है।
3. “वह छन्द-समाधि-प्रयास-संस्कार-युक्त इद्धिपाद को भावना करता, वीर्य-समाधि-प्रयास-संस्कार-युक्त इद्धिपाद को भावना करता, चित्त-समाधि-प्रयास-संस्कार-युक्त इद्धिपाद को भावना करता, वीमंस-समाधि-प्रयास-संस्कार-युक्त इद्धिपाद को भावना करता, उत्साह से पाँचवाँ। भिक्षुओं! इस प्रकार उत्साह से पञ्चरसंग से युक्त भिक्षु अभिनिब्बिदा के योग्य होता, संबोधि के योग्य होता, अनुत्तर योग-क्षेम की प्राप्ति के योग्य होता। भिक्षुओं! जैसे मुर्गी के अंडे आठ या दस या बारह। वे मुर्गी के सम्यक् अधिसयित, सम्यक् परिसेदित, सम्यक् परिभावित। भिक्षुओं! मुर्गी को ऐसी इच्छा न हो—‘काश! मेरे मुर्गी-पोत पाद-नख-सिखा से या मुख-टुंड से अंड-कोश को फोड़कर सुरक्षित अभिनिब्भुत हों।’ किन्तु योग्य ही वे मुर्गी-पोत पाद-नख-सिखा से या मुख-टुंड से अंड-कोश को फोड़कर सुरक्षित अभिनिब्भुत होते। भिक्षुओं! इसी प्रकार इस प्रकार उत्साह से पञ्चरसंग से युक्त भिक्षु अभिनिब्बिदा के योग्य होता, संबोधि के योग्य होता, अनुत्तर योग-क्षेम की प्राप्ति के योग्य होता।”
भगवान् ने इस प्रकार कहा। प्रसन्न होकर वे भिक्षु भगवान् की वाणी का अभिनंदन करते हुए।
चेतोखिल सुत्त समाप्त, षष्ठ।
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