4. चूळदुक्खक्खन्धसुत्त

Dhamma Skandha
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1. इस प्रकार मैंने सुना—एक समय भगवान् सकक देश में कपिलवस्तु के निग्रोधाराम में ठहर रहे थे। तब महानाम सकक भगवान् के पास जाकर प्रणाम किया और एक ओर बैठ गये। एक ओर बैठे हुए महानाम सकक ने भगवान् से कहा—“भन्ते! मैं लंबे समय से भगवान् द्वारा इस प्रकार धम्म का उपदेश जानता हूँ—‘लोभ चित्त का उपकलुषक है, द्वेष चित्त का उपकलुषक है, मोह चित्त का उपकलुषक है।’ भन्ते! मैं भगवान् द्वारा धम्म का उपदेश इस प्रकार जानता हूँ—‘लोभ चित्त का उपकलुषक है, द्वेष चित्त का उपकलुषक है, मोह चित्त का उपकलुषक है।’ किन्तु भन्ते! कभी-कभी लोभ-धम्म भी चित्त को आक्रांत करके स्थित रहते हैं, द्वेष-धम्म भी चित्त को आक्रांत करके स्थित रहते हैं, मोह-धम्म भी चित्त को आक्रांत करके स्थित रहते हैं। भन्ते! मेरे लिए ऐसा होता है—‘मेरा कौन सा धम्म अंतर्मन में अप्रहीण है जिससे कभी-कभी लोभ-धम्म भी चित्त को आक्रांत करके स्थित रहते हैं, द्वेष-धम्म भी चित्त को आक्रांत करके स्थित रहते हैं, मोह-धम्म भी चित्त को आक्रांत करके स्थित रहते हैं।’”


2. “महानाम! वही तेरा धम्म अंतर्मन में अप्रहीण है जिससे कभी-कभी लोभ-धम्म भी चित्त को आक्रांत करके स्थित रहते हैं, द्वेष-धम्म भी चित्त को आक्रांत करके स्थित रहते हैं, मोह-धम्म भी चित्त को आक्रांत करके स्थित रहते हैं। महानाम! यदि वह तेरा धम्म अंतर्मन में प्रहीण होता, तो तू गृह में अवसित न रहता, कामों का उपभोग न करता। महानाम! क्योंकि वही तेरा धम्म अंतर्मन में अप्रहीण है इसलिए तू गृह में अवसित रहता है, कामों का उपभोग करता है।


3. “‘कामों का अस्साद कम है, बहु दुःख है, बहु उपायास है, अधीनव यहाँ अधिक है’—महानाम! यद्यपि आर्य शिष्य के लिए यथार्थ सम्यक् प्रज्ञा से सुदीर्घ देखा जाता है, किन्तु वह कामों से अलग, अकुशल धम्मों से अलग प्रीति-सुख प्राप्त नहीं करता, उससे शांततर अन्य; तब भी वह कामों में अनावट्टी नहीं होता। महानाम! जब आर्य शिष्य के लिए ‘कामों का अस्साद कम है, बहु दुःख है, बहु उपायास है, अधीनव यहाँ अधिक है’—यह यथार्थ सम्यक् प्रज्ञा से सुदीर्घ देखा जाता है, वह कामों से अलग, अकुशल धम्मों से अलग प्रीति-सुख प्राप्त करता, उससे शांततर अन्य; तब वह कामों में अनावट्टी होता है।


महानाम! मुझे भी बोधि-प्राप्ति से पहले, जब मैं बोधिसत्त्व था किन्तु बोधि प्राप्त न हुई थी, ‘कामों का अस्साद कम है, बहु दुःख है, बहु उपायास है, अधीनव यहाँ अधिक है’—यह यथार्थ सम्यक् प्रज्ञा से सुदीर्घ देखा गया था, मैं कामों से अलग, अकुशल धम्मों से अलग प्रीति-सुख प्राप्त नहीं हुआ था, उससे शांततर अन्य; तब मैं कामों में अनावट्टी नहीं हुआ था। महानाम! जब ‘कामों का अस्साद कम है, बहु दुःख है, बहु उपायास है, अधीनव यहाँ अधिक है’—यह यथार्थ सम्यक् प्रज्ञा से सुदीर्घ देखा गया, मैं कामों से अलग, अकुशल धम्मों से अलग प्रीति-सुख प्राप्त हुआ, उससे शांततर अन्य; तब मैं कामों में अनावट्टी हुआ।


4. “महानाम! कामों का अस्साद क्या है? महानाम! पाँच काम-गुण। कौन से पाँच? चक्षु-विज्ञेय रूप इच्छित, कांक्षित, मनोहर, प्रिय-रूप, काम-उपसंहित, रंजनीय; श्रोत्र-विज्ञेय शब्द... (इत्यादि)... घ्राण-विज्ञेय गंध... जिह्वा-विज्ञेय रस... काय-विज्ञेय स्पर्श इच्छित, कांक्षित, मनोहर, प्रिय-रूप, काम-उपसंहित, रंजनीय—महानाम! ये पाँच काम-गुण हैं। महानाम! जो इन पाँच काम-गुणों के कारण उत्पन्न सुख, सोमनस है—वह कामों का अस्साद है।


महानाम! कामों का अधीनव क्या है? यहाँ, महानाम! कुलपुत्र जिस किसी व्यवसाय से जीविका चलाता—यदि मुद्रा से, यदि गणना से, यदि लेखा से, यदि कृषि से, यदि वाणिज्य से, यदि गो-रक्षा से, यदि शिल्प से, यदि राज-कर्म से, यदि अन्य व्यवसाय से—शीत में आगे रहकर, उष्ण में आगे रहकर, डंक, मच्छर, वायु, सूर्य, शीत, संपर्क से पीड़ित, भूख-पिपासा से मरता हुआ; महानाम! यह भी कामों का अधीनव प्रत्यक्ष है, दुःख-स्कंध है, काम-कारण, काम-निदान, काम-अधिकरण, कामों का ही कारण।


महानाम! यदि उस कुलपुत्र के उद्यम, ग्रहण, प्रयास से वे भोग न प्राप्त हों। वह शोक करता, क्लान्त होता, परिदेव करता, उरत्तालिं करता, रोता, मोह प्राप्त करता—‘मेरा उद्यम व्यर्थ गया, मेरा प्रयास अफल रहा।’ महानाम! यह भी कामों का अधीनव प्रत्यक्ष है, दुःख-स्कंध है, काम-कारण, काम-निदान, काम-अधिकरण, कामों का ही कारण।


महानाम! यदि उस कुलपुत्र के उद्यम, ग्रहण, प्रयास से वे भोग प्राप्त हों। वह उन भोगों की रक्षा-अधिकरण दुःख, दोमनस का अनुभव करता—‘कहीं राजा न हर लें, चोर न हर लें, अग्नि न जला दे, जल न बहा ले, अप्रिय दायाद न हर लें।’ उसके इस प्रकार रक्षा करने पर, गोपन करने पर वे भोग राजा हर लेते, चोर हर लेते, अग्नि जला देती, जल बहा लेता, अप्रिय दायाद हर लेते। वह शोक करता, क्लान्त होता, परिदेव करता, उरत्तालिं करता, रोता, मोह प्राप्त करता—‘जो मेरा था वह अब नहीं है।’ महानाम! यह भी कामों का अधीनव प्रत्यक्ष है, दुःख-स्कंध है, काम-कारण, काम-निदान, काम-अधिकरण, कामों का ही कारण।


फिर भी, महानाम! काम-कारण, काम-निदान, काम-अधिकरण, कामों का ही कारण से राजा भी राजाओं से विवाद करते, क्षत्रिय भी क्षत्रियों से विवाद करते, ब्राह्मण भी ब्राह्मणों से विवाद करते, गृहपति भी गृहपतियों से विवाद करते, माता भी पुत्र से विवाद करती, पुत्र भी माता से विवाद करता, पिता भी पुत्र से विवाद करता, पुत्र भी पिता से विवाद करता, भाई भी भाई से विवाद करता, भाई भी बहन से विवाद करता, बहन भी भाई से विवाद करती, सहायक भी सहायक से विवाद करता। वे कलह-विग्गह-विवाद में पड़कर एक-दूसरे को पानी से भी प्रहार करते, लाठी से भी प्रहार करते, दंड से भी प्रहार करते, शस्त्र से भी प्रहार करते। वे वहाँ मरण भी प्राप्त करते, मरण मात्र भी दुःख है। महानाम! यह भी कामों का अधीनव प्रत्यक्ष है, दुःख-स्कंध है, काम-कारण, काम-निदान, काम-अधिकरण, कामों का ही कारण।


फिर भी, महानाम! काम-कारण, काम-निदान, काम-अधिकरण, कामों का ही कारण से चमड़े को ग्रहण करके, धनुष-कोश को सजाकर, दोनों ओर से बंधे हुए संग्राम में प्रवेश करते, बाणों में खिप्पमान, सत्तियों में खिप्पमान, असीसियों में चमकते हुए। वे वहाँ बाणों से भी भेदित होते, सत्तियों से भी भेदित होते, असीसियों से सिर काटा जाता। वे वहाँ मरण भी प्राप्त करते, मरण मात्र भी दुःख है। महानाम! यह भी कामों का अधीनव प्रत्यक्ष है, दुःख-स्कंध है, काम-कारण, काम-निदान, काम-अधिकरण, कामों का ही कारण।


फिर भी, महानाम! काम-कारण, काम-निदान, काम-अधिकरण, कामों का ही कारण से चमड़े को ग्रहण करके, धनुष-कोश को सजाकर, अदाव-लेपना उपकारी संग्राम में प्रवेश करते, बाणों में खिप्पमान, सत्तियों में खिप्पमान, असीसियों में चमकते हुए। वे वहाँ बाणों से भी भेदित होते, सत्तियों से भी भेदित होते, छकणकाय से भी ओसिंचित होते, अभिवग्गेन से भी ओमद्दित होते, असीसियों से सिर काटा जाता। वे वहाँ मरण भी प्राप्त करते, मरण मात्र भी दुःख है। महानाम! यह भी कामों का अधीनव प्रत्यक्ष है, दुःख-स्कंध है, काम-कारण, काम-निदान, काम-अधिकरण, कामों का ही कारण।


फिर भी, महानाम! काम-कारण, काम-निदान, काम-अधिकरण, कामों का ही कारण से संधि भी काटते, निल्लोप भी हरते, एकागारिक भी करते, परिपंथ में भी खड़े होते, पर-दार भी जाते। उसे राजा पकड़कर विविध कर्म-कारा करते—कसाई से भी पीटते, वेत्तों से भी पीटते, अड्ढदंडकों से भी पीटते; हाथ भी काटते, पैर भी काटते, हाथ-पैर भी काटते, कान भी काटते, नासिका भी काटते, कान-नासिका भी काटते; बिलंगथालिक भी करते, संखमुंडिक भी करते, राहुमुख भी करते, जोतिमालिक भी करते, हाथपज्जोतिक भी करते, एरकवत्तिक भी करते, चीरकवासिक भी करते, एणेय्यक भी करते, बलिसमंसिक भी करते, कहापणिक भी करते, खारापतच्छिक भी करते, पलिघपरिवत्तिक भी करते, पलालपीठक भी करते, तत्तेन तेल से भी ओसिंचित करते, सुनखों से भी खाने देते, जीवित को भी सूली पर उत्तासेते, असीसियों से भी सिर काटते। वे वहाँ मरण भी प्राप्त करते, मरण मात्र भी दुःख है। महानाम! यह भी कामों का अधीनव प्रत्यक्ष है, दुःख-स्कंध है, काम-कारण, काम-निदान, काम-अधिकरण, कामों का ही कारण।


फिर भी, महानाम! काम-कारण, काम-निदान, काम-अधिकरण, कामों का ही कारण से काय से दुष्कर्म करते, वाक् से दुष्कर्म करते, मन से दुष्कर्म करते। वे काय से दुष्कर्म करके, वाक् से दुष्कर्म करके, मन से दुष्कर्म करके, काय-भेदा परमरणा, अपाय दुर्गति विनिपात नरक में उत्पन्न होते। महानाम! यह भी कामों का अधीनव सम्परायिक है, दुःख-स्कंध है, काम-कारण, काम-निदान, काम-अधिकरण, कामों का ही कारण।


5. “महानाम! एक समय मैं राजगृह में गिज्झकूट पर्वत पर ठहरा था। उस समय अनेक निग्गंठ इसिगिलि-पस्से कालसिला पर उभ्यट्ठक होकर आसन-त्यागी, ओपक्कमिक दुःख तीव्र खर कटुका वेदना का अनुभव कर रहे थे। महानाम! तब मैं सायंकालीन एकांत-वास से उठकर इसिगिलि-पस्से कालसिला के पास, उन निग्गंठों के पास गया; जाकर उन निग्गंठों से बोला—‘मित्रों निग्गंठ! क्या तुम उभ्यट्ठक होकर आसन-त्यागी, ओपक्कमिक दुःख तीव्र खर कटुका वेदना का अनुभव कर रहे हो?’ महानाम! इस प्रकार कहने पर वे निग्गंठ मुझसे बोले—‘मित्र! निग्गंठ नाटपुत्त सर्वज्ञ, सर्व-दर्शी, अपरिसेस ज्ञान-दर्शन के दावेदार हैं—“चरते हुए भी मेरे, खड़े हुए भी, सोते हुए भी, जागते हुए भी निरंतर संयमित ज्ञान-दर्शन उपस्थित है।” वे इस प्रकार कहते हैं—“निग्गंठों! तुम्हारा पहले किया गया पापकर्म है, उसे इस कठोर दुर्कर कार्य से नष्ट करो; जो अब काय से संयुक्त, वाक् से संयुक्त, मन से संयुक्त वह भविष्य में पाप का अकरण; इस प्रकार पुराने कर्मों का तप से व्यतिक्रम, नए कर्मों का अकरण, भविष्य में अनवस्सव; भविष्य में अनवस्सव से कर्म-क्षय, कर्म-क्षय से दुःख-क्षय, दुःख-क्षय से वेदना-क्षय, वेदना-क्षय से समस्त दुःख का नाश होगा।” और यह हमें रुचिकर है भी और स्वीकार्य है भी, इसलिए हम प्रसन्न हैं।’”


6. “महानाम! इस प्रकार कहने पर मैं उन निग्गंठों से बोला—‘मित्रों निग्गंठ! क्या तुम जानते हो—हमें पहले था या नहीं था?’ ‘नहीं, मित्र!’ ‘मित्रों निग्गंठ! क्या तुम जानते हो—हमें पहले पापकर्म किया या नहीं किया?’ ‘नहीं, मित्र!’ ‘मित्रों निग्गंठ! क्या तुम जानते हो—इस प्रकार या इस प्रकार पापकर्म किया?’ ‘नहीं, मित्र!’ ‘मित्रों निग्गंठ! क्या तुम जानते हो—इतना दुःख नष्ट हो गया, इतना दुःख नष्ट करना है, इतने दुःख के नष्ट होने पर समस्त दुःख नष्ट हो जाएगा?’ ‘नहीं, मित्र!’ ‘मित्रों निग्गंठ! क्या तुम जानते हो—वर्तमान में अकुशल धम्मों का त्याग, कुशल धम्मों की प्राप्ति?’ ‘नहीं, मित्र!’


‘इस प्रकार मित्रों निग्गंठ! तुम न जानते हो—हमें पहले था या नहीं था, न जानते हो—हमें पहले पापकर्म किया या नहीं किया, न जानते हो—इस प्रकार या इस प्रकार पापकर्म किया, न जानते हो—इतना दुःख नष्ट हो गया, इतना दुःख नष्ट करना है, इतने दुःख के नष्ट होने पर समस्त दुःख नष्ट हो जाएगा। न जानते हो—वर्तमान में अकुशल धम्मों का त्याग, कुशल धम्मों की प्राप्ति। इस प्रकार होने पर, मित्रों निग्गंठ! जो संसार में लोभी रक्त-पाणि क्रूर-कर्म करने वाले मनुष्यों में जन्मे वे निग्गंठों में संन्यास लेते हैं?’ ‘मित्र गोतम! सुख से सुख प्राप्त नहीं होता, दुःख से सुख प्राप्त होता है; यदि मित्र गोतम! सुख से सुख प्राप्त होता तो मगध का राजा सेनिय बिम्बिसार सुख प्राप्त करता, मगध का राजा सेनिय बिम्बिसार सम्मानित गोतम से अधिक सुख-विहारी होता।’”


‘मित्रों निग्गंठ! सहसा अप्रतिसंस्कार वाणी बोली गई—सुख से सुख प्राप्त नहीं होता, दुःख से सुख प्राप्त होता है; यदि मित्र गोतम! सुख से सुख प्राप्त होता तो मगध का राजा सेनिय बिम्बिसार सुख प्राप्त करता, मगध का राजा सेनिय बिम्बिसार सम्मानित गोतम से अधिक सुख-विहारी होता।’ और मैं ही वहाँ प्रतिपुच्छा करने योग्य हूँ—मित्रों निग्गंठ! सम्मानितों में से राजा या मगध का सेनिय बिम्बिसार या सम्मानित गोतम कौन अधिक सुख-विहारी है? ‘मित्र गोतम! हमसे सहसा अप्रतिसंस्कार वाणी बोली गई, सुख से सुख प्राप्त नहीं होता, दुःख से सुख प्राप्त होता है; यदि मित्र गोतम! सुख से सुख प्राप्त होता तो मगध का राजा सेनिय बिम्बिसार सुख प्राप्त करता, मगध का राजा सेनिय बिम्बिसार सम्मानित गोतम से अधिक सुख-विहारी होता। और यह रहने दो, अब भी हम सम्मानित गोतम से पूछते हैं—सम्मानितों में से राजा या मगध का सेनिय बिम्बिसार या सम्मानित गोतम कौन अधिक सुख-विहारी है?’


‘इसलिए मित्रों निग्गंठ! तुम ही वहाँ प्रतिपुच्छा करो, जैसे तुम्हें स्वीकार्य हो वैसे उत्तर दो। मित्रों निग्गंठ! क्या सोचते हो, मगध का राजा सेनिय बिम्बिसार काय से अविचलित, वाक् से अभाषमान, सात रात्रि-दिवस एकान्त सुख का अनुभव करके रह सकता? ‘नहीं, मित्र!’


‘मित्रों निग्गंठ! क्या सोचते हो, मगध का राजा सेनिय बिम्बिसार काय से अविचलित, वाक् से अभाषमान, छह रात्रि-दिवस... (इत्यादि)... पाँच रात्रि-दिवस... चार रात्रि-दिवस... तीन रात्रि-दिवस... दो रात्रि-दिवस... एक रात्रि-दिवस एकान्त सुख का अनुभव करके रह सकता? ‘नहीं, मित्र!’


‘मित्रों निग्गंठ! मैं रह सकता काय से अविचलित, वाक् से अभाषमान, एक रात्रि-दिवस एकान्त सुख का अनुभव करके। मित्रों निग्गंठ! मैं रह सकता काय से अविचलित, वाक् से अभाषमान, दो रात्रि-दिवस... तीन रात्रि-दिवस... चार रात्रि-दिवस... पाँच रात्रि-दिवस... छह रात्रि-दिवस... सात रात्रि-दिवस एकान्त सुख का अनुभव करके। मित्रों निग्गंठ! इस प्रकार होने पर कौन अधिक सुख-विहारी है—मगध का राजा सेनिय बिम्बिसार या मैं?’ ‘इस प्रकार होने पर सम्मानित गोतम मगध के राजा सेनिय बिम्बिसार से अधिक सुख-विहारी हैं।’”


भगवान् ने इस प्रकार कहा। प्रसन्न होकर महानाम सकक भगवान् की वाणी का अभिनंदन करते हुए।


चूळदुक्खक्खन्ध सुत्त समाप्त, चतुर्थ।

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