2. महासिंहनादसुत्त

Dhamma Skandha
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1. इस प्रकार मैंने सुना—एक समय भगवान् वेसाली में बहुपुर के वनसंधि में ठहर रहे थे। उस समय सुनक्खत्त लिच्छवि-पुत्र इस धम्म-विनय से हाल ही में चले गए थे। वह वेसाली घूमते हुए इस प्रकार वचन बोलते थे—“समण गोतम के मनुष्य-धम्म से ऊपर कोई अलं आर्य ज्ञान-दर्शन-विशेष नहीं है। समण गोतम तर्क-परिपक्व धम्म का उपदेश करते हैं, विचार- अनुसरणीय, स्वयं-प्रतिभान। जिसके लिए भी धम्म का उपदेश किया गया है, वह तर्क-रस से सम्यक् दुःख-क्षय की ओर जाता है।”


तब सम्मानित सारिपुत्त प्रातःकाल वस्त्र धारण करके, पात्र-वस्त्र लेकर वेसाली में भिक्षा के लिए प्रवेश किए। सम्मानित सारिपुत्त ने सुना कि सुनक्खत्त लिच्छवि-पुत्र वेसाली घूमते हुए इस प्रकार वचन बोल रहे हैं—“समण गोतम के मनुष्य-धम्म से ऊपर कोई अलं आर्य ज्ञान-दर्शन-विशेष नहीं है। समण गोतम तर्क-परिपक्व धम्म का उपदेश करते हैं, विचार-अनुसरणीय, स्वयं-प्रतिभान। जिसके लिए भी धम्म का उपदेश किया गया है, वह तर्क-रस से सम्यक् दुःख-क्षय की ओर जाता है।”


तब सम्मानित सारिपुत्त ने वेसाली में भिक्षा की और भोजन के पश्चात् भिक्षापात्र लौटाकर भगवान् के पास जाकर प्रणाम किया और एक ओर बैठ गये। एक ओर बैठे हुए सम्मानित सारिपुत्त ने भगवान् से कहा—“भन्ते! सुनक्खत्त लिच्छवि-पुत्र इस धम्म-विनय से हाल ही में चले गए हैं। वह वेसाली घूमते हुए इस प्रकार वचन बोलते हैं—‘समण गोतम के मनुष्य-धम्म से ऊपर कोई अलं आर्य ज्ञान-दर्शन-विशेष नहीं है। समण गोतम तर्क-परिपक्व धम्म का उपदेश करते हैं, विचार-अनुसरणीय, स्वयं-प्रतिभान। जिसके लिए भी धम्म का उपदेश किया गया है, वह तर्क-रस से सम्यक् दुःख-क्षय की ओर जाता है।’”


2. “सारिपुत्त! यह सुनक्खत्त क्रोधी मूर्ख पुरुष है। सारिपुत्त! यह उसके क्रोध से ही बोली गई वाणी है। सारिपुत्त! सुनक्खत्त मूर्ख पुरुष ‘मैं तथागत की निंदा करूँगा’ ऐसा सोचकर तथागत की ही प्रशंसा कर रहा है। सारिपुत्त! तथागत की प्रशंसा ही है जो इस प्रकार कहे—‘जिसके लिए भी धम्म का उपदेश किया गया है, वह तर्क-रस से सम्यक् दुःख-क्षय की ओर जाता है।’


सारिपुत्त! सुनक्खत्त मूर्ख पुरुष में मेरे प्रति धम्म-अनुवर्तना न होगी—‘यह भगवान् अर्हत् हैं, सम्यक्-संबुद्ध, ज्ञान-चर्या में सम्पन्न, सुगत, लोक-विदू, अनुत्तर पुरुष-दम्म-सारथि, देव-मनुष्यों के सिद्ध, बुद्ध, भगवान्।’


सारिपुत्त! सुनक्खत्त मूर्ख पुरुष में मेरे प्रति धम्म-अनुवर्तना न होगी—‘यह भगवान् अनेक प्रकार की ऋद्धि का प्रत्यक्ष अनुभव करते हैं—एक होकर अनेक हो जाते हैं, अनेक होकर एक हो जाते हैं; प्रकट, अप्रकट; दीवार, बाड़ा, पहाड़ को बिना रुकावट पार करके जाते हैं, जैसे आकाश में; पृथ्वी को डुबोकर उभारते हैं, जैसे जल में; जल में डूबे हुए जाते हैं, जैसे पृथ्वी पर; आकाश में पद्मासन में जाते हैं, जैसे पक्षी; इन चंद्रमा-सूर्य को, इतने महान् बलशाली, महान् प्रभावशाली को हाथ से स्पर्श करते हैं, सहलाते हैं; ब्रह्मलोक तक शरीर से जाकर निवास करते हैं।’


सारिपुत्त! सुनक्खत्त मूर्ख पुरुष में मेरे प्रति धम्म-अनुवर्तना न होगी—‘यह भगवान् दिव्य श्रोत्र-धातु से शुद्ध, मानुष्य श्रोत्र से श्रेष्ठ, दोनों पक्षों के शब्द सुनते हैं—दिव्य और मानवीय, दूर के और निकट के।’


सारिपुत्त! सुनक्खत्त मूर्ख पुरुष में मेरे प्रति धम्म-अनुवर्तना न होगी—‘यह भगवान् पर प्राणियों, पर व्यक्तियों के चित्त को चित्त से प्रत्यक्ष जानते हैं—रागयुक्त चित्त को ‘रागयुक्त चित्त है’ जानते हैं, विरक्त चित्त को ‘विरक्त चित्त है’ जानते हैं; द्वेषयुक्त चित्त को ‘द्वेषयुक्त चित्त है’ जानते हैं, निर्वेष चित्त को ‘निर्वेष चित्त है’ जानते हैं; मोहयुक्त चित्त को ‘मोहयुक्त चित्त है’ जानते हैं, विमोह चित्त को ‘विमोह चित्त है’ जानते हैं; संकुचित चित्त को ‘संकुचित चित्त है’ जानते हैं, विक्षिप्त चित्त को ‘विक्षिप्त चित्त है’ जानते हैं; विस्तृत चित्त को ‘विस्तृत चित्त है’ जानते हैं, अविस्तृत चित्त को ‘अविस्तृत चित्त है’ जानते हैं; परम चित्त को ‘परम चित्त है’ जानते हैं, अपरम चित्त को ‘अपरम चित्त है’ जानते हैं; संयमित चित्त को ‘संयमित चित्त है’ जानते हैं, असंयमित चित्त को ‘असंयमित चित्त है’ जानते हैं; मुक्त चित्त को ‘मुक्त चित्त है’ जानते हैं, अमुक्त चित्त को ‘अमुक्त चित्त है’ जानते हैं।’”


3. “सारिपुत्त! ये दस तथागत के तथागत-बल हैं जिन बलों से युक्त तथागत उत्तम स्थान को प्राप्त करते हैं, सभाओं में सिंहनाद गर्जते हैं, ब्रह्मचक्र को चलाते हैं। कौन से दस?


सारिपुत्त! यहाँ तथागत स्थान को स्थान से, अस्थान को अस्थान से यथार्थ जानते हैं। सारिपुत्त! जितना तथागत स्थान को स्थान से, अस्थान को अस्थान से यथार्थ जानते हैं, सारिपुत्त! यह भी तथागत का तथागत-बल है जिस बल से तथागत उत्तम स्थान को प्राप्त करते हैं, सभाओं में सिंहनाद गर्जते हैं, ब्रह्मचक्र को चलाते हैं।


फिर भी, सारिपुत्त! तथागत अतीत-भविष्य-वर्तमान कर्म-ग्रहणों को स्थान अनुसार, हेतु अनुसार, विपाक को यथार्थ जानते हैं। सारिपुत्त! जितना तथागत अतीत-भविष्य-वर्तमान कर्म-ग्रहणों को स्थान अनुसार, हेतु अनुसार, विपाक को यथार्थ जानते हैं, सारिपुत्त! यह भी तथागत का तथागत-बल है जिस बल से तथागत उत्तम स्थान को प्राप्त करते हैं, सभाओं में सिंहनाद गर्जते हैं, ब्रह्मचक्र को चलाते हैं।


फिर भी, सारिपुत्त! तथागत सर्वत्र-गामी मार्ग को यथार्थ जानते हैं। सारिपुत्त! जितना तथागत सर्वत्र-गामी मार्ग को यथार्थ जानते हैं, सारिपुत्त! यह भी तथागत का तथागत-बल है जिस बल से तथागत उत्तम स्थान को प्राप्त करते हैं, सभाओं में सिंहनाद गर्जते हैं, ब्रह्मचक्र को चलाते हैं।


फिर भी, सारिपुत्त! तथागत अनेक-धातु-नाना-धातु-लोक को यथार्थ जानते हैं। सारिपुत्त! जितना तथागत अनेक-धातु-नाना-धातु-लोक को यथार्थ जानते हैं, सारिपुत्त! यह भी तथागत का तथागत-बल है जिस बल से तथागत उत्तम स्थान को प्राप्त करते हैं, सभाओं में सिंहनाद गर्जते हैं, ब्रह्मचक्र को चलाते हैं।


फिर भी, सारिपुत्त! तथागत प्राणियों की नाना-धिमुक्ति को यथार्थ जानते हैं। सारिपुत्त! जितना तथागत प्राणियों की नाना-धिमुक्ति को यथार्थ जानते हैं, सारिपुत्त! यह भी तथागत का तथागत-बल है जिस बल से तथागत उत्तम स्थान को प्राप्त करते हैं, सभाओं में सिंहनाद गर्जते हैं, ब्रह्मचक्र को चलाते हैं।


फिर भी, सारिपुत्त! तथागत पर प्राणियों, पर व्यक्तियों की इन्द्रिय-परिपक्वता को यथार्थ जानते हैं। सारिपुत्त! जितना तथागत पर प्राणियों, पर व्यक्तियों की इन्द्रिय-परिपक्वता को यथार्थ जानते हैं, सारिपुत्त! यह भी तथागत का तथागत-बल है जिस बल से तथागत उत्तम स्थान को प्राप्त करते हैं, सभाओं में सिंहनाद गर्जते हैं, ब्रह्मचक्र को चलाते हैं।


फिर भी, सारिपुत्त! तथागत झान-विमोक्ष-समाधि-समापत्तियों का कलुष, शुद्धि, उद्भव को यथार्थ जानते हैं। सारिपुत्त! जितना तथागत झान-विमोक्ष-समाधि-समापत्तियों का कलुष, शुद्धि, उद्भव को यथार्थ जानते हैं, सारिपुत्त! यह भी तथागत का तथागत-बल है जिस बल से तथागत उत्तम स्थान को प्राप्त करते हैं, सभाओं में सिंहनाद गर्जते हैं, ब्रह्मचक्र को चलाते हैं।


फिर भी, सारिपुत्त! तथागत अनेक प्रकार के पूर्वजन्मों का स्मरण करते हैं, जैसे—एक जन्म, दो जन्म... (इत्यादि)... इस प्रकार साकार-सुद्देस अनेक प्रकार के पूर्वजन्मों का स्मरण करते हैं। सारिपुत्त! जितना तथागत अनेक प्रकार के पूर्वजन्मों का स्मरण करते हैं... (इत्यादि)... इस प्रकार साकार-सुद्देस अनेक प्रकार के पूर्वजन्मों का स्मरण करते हैं, सारिपुत्त! यह भी तथागत का तथागत-बल है जिस बल से तथागत उत्तम स्थान को प्राप्त करते हैं, सभाओं में सिंहनाद गर्जते हैं, ब्रह्मचक्र को चलाते हैं।


फिर भी, सारिपुत्त! तथागत दिव्य चक्षु से शुद्ध, मानुष्य चक्षु से श्रेष्ठ प्राणियों को मरते हुए, उत्पन्न होते हुए... (इत्यादि)... यथाकम्मूपग प्राणियों को जानते हैं—‘ये भोन्ते प्राणी... (इत्यादि)... स्वर्ग लोक में उत्पन्न हुए।’ इस प्रकार दिव्य चक्षु से शुद्ध, मानुष्य चक्षु से श्रेष्ठ प्राणियों को मरते हुए, उत्पन्न होते हुए... (इत्यादि)... यथाकम्मूपग प्राणियों को जानते हैं। सारिपुत्त! जितना तथागत दिव्य चक्षु से शुद्ध... (इत्यादि)... जानते हैं, सारिपुत्त! यह भी तथागत का तथागत-बल है जिस बल से तथागत उत्तम स्थान को प्राप्त करते हैं, सभाओं में सिंहनाद गर्जते हैं, ब्रह्मचक्र को चलाते हैं।


फिर भी, सारिपुत्त! तथागत आस्रवों के क्षय से अनास्रव चित्त-विमुक्ति, प्रज्ञा-विमुक्ति को वर्तमान में स्वयं प्रत्यक्ष जानकर प्रमाण करके प्राप्त करके रहते हैं। सारिपुत्त! जितना तथागत आस्रवों के क्षय से... (इत्यादि)... रहते हैं, सारिपुत्त! यह भी तथागत का तथागत-बल है जिस बल से तथागत उत्तम स्थान को प्राप्त करते हैं, सभाओं में सिंहनाद गर्जते हैं, ब्रह्मचक्र को चलाते हैं।


सारिपुत्त! ये दस तथागत के तथागत-बल हैं जिन बलों से युक्त तथागत उत्तम स्थान को प्राप्त करते हैं, सभाओं में सिंहनाद गर्जते हैं, ब्रह्मचक्र को चलाते हैं।


4. “सारिपुत्त! जो मुझे इस प्रकार जानने वाले, देखने वाले, कहने वाले को इस प्रकार कहे—‘समण गोतम के मनुष्य-धम्म से ऊपर कोई अलं आर्य ज्ञान-दर्शन-विशेष नहीं है; समण गोतम तर्क-परिपक्व धम्म का उपदेश करते हैं, विचार-अनुसरणीय, स्वयं-प्रतिभान’ तो सारिपुत्त! वह वाणी को न त्यागकर, चित्त को न त्यागकर, दृष्टि को न परित्याग करके यथावत् रखकर नरक में ही पतित होता है। सारिपुत्त! जैसे भिक्षु शील-संपन्न, समाधि-संपन्न, प्रज्ञा-संपन्न वर्तमान में अज्ञान को आराधना करे, सारिपुत्त! इतना ही समान है, ऐसा मैं कहता हूँ। वह वाणी को न त्यागकर, चित्त को न त्यागकर, दृष्टि को न परित्याग करके यथावत् रखकर नरक में ही पतित होता है।


5. “सारिपुत्त! ये चार तथागत के वेसारज (निर्भयता) हैं जिन वेसारज से युक्त तथागत उत्तम स्थान को प्राप्त करते हैं, सभाओं में सिंहनाद गर्जते हैं, ब्रह्मचक्र को चलाते हैं। कौन से चार?


‘सम्यक्-संबुद्ध को ये धम्म अजानित हैं’ ऐसा। वहाँ तो संन्यासी या ब्राह्मण या देव या मार या ब्रह्मा या कोई संसार में सहधम्म से दोषारोपण करेगा, सारिपुत्त! ऐसा निमित्त मैं नहीं देखता। सारिपुत्त! इस निमित्त को न देखकर मैं निर्भय प्राप्त, अभय प्राप्त, वेसारज प्राप्त होकर रहता हूँ।


‘क्षीणास्रव को ये आस्रव अपरिक्षीण हैं’ ऐसा। वहाँ तो संन्यासी या ब्राह्मण या देव या मार या ब्रह्मा या कोई संसार में सहधम्म से दोषारोपण करेगा, सारिपुत्त! ऐसा निमित्त मैं नहीं देखता। सारिपुत्त! इस निमित्त को न देखकर मैं निर्भय प्राप्त, अभय प्राप्त, वेसारज प्राप्त होकर रहता हूँ।


‘जो अन्तरायिक धम्म बताए गए हैं, वे सेवन करने पर अलं अन्तराय के लिए नहीं’ ऐसा। वहाँ तो संन्यासी या ब्राह्मण या देव या मार या ब्रह्मा या कोई संसार में सहधम्म से दोषारोपण करेगा, सारिपुत्त! ऐसा निमित्त मैं नहीं देखता। सारिपुत्त! इस निमित्त को न देखकर मैं निर्भय प्राप्त, अभय प्राप्त, वेसारज प्राप्त होकर रहता हूँ।


‘जिसके लिए ते धम्म का उपदेश किया गया है, वह तर्क-रस से सम्यक् दुःख-क्षय की ओर नहीं जाता’ ऐसा। वहाँ तो संन्यासी या ब्राह्मण या देव या मार या ब्रह्मा या कोई संसार में सहधम्म से दोषारोपण करेगा, सारिपुत्त! ऐसा निमित्त मैं नहीं देखता। सारिपुत्त! इस निमित्त को न देखकर मैं निर्भय प्राप्त, अभय प्राप्त, वेसारज प्राप्त होकर रहता हूँ।


सारिपुत्त! ये चार तथागत के वेसारज हैं जिन वेसारज से युक्त तथागत उत्तम स्थान को प्राप्त करते हैं, सभाओं में सिंहनाद गर्जते हैं, ब्रह्मचक्र को चलाते हैं।


सारिपुत्त! जो मुझे इस प्रकार जानने वाले, देखने वाले, कहने वाले को इस प्रकार कहे—‘समण गोतम के मनुष्य-धम्म से ऊपर कोई अलं आर्य ज्ञान-दर्शन-विशेष नहीं है, समण गोतम तर्क-परिपक्व धम्म का उपदेश करते हैं, विचार-अनुसरणीय, स्वयं-प्रतिभान’ तो सारिपुत्त! वह वाणी को न त्यागकर, चित्त को न त्यागकर, दृष्टि को न परित्याग करके यथावत् रखकर नरक में ही पतित होता है। सारिपुत्त! जैसे भिक्षु शील-संपन्न, समाधि-संपन्न, प्रज्ञा-संपन्न वर्तमान में अज्ञान को आराधना करे, सारिपुत्त! इतना ही समान है, ऐसा मैं कहता हूँ। वह वाणी को न त्यागकर, चित्त को न त्यागकर, दृष्टि को न परित्याग करके यथावत् रखकर नरक में ही पतित होता है।


6. “सारिपुत्त! ये आठ सभाएँ हैं। कौन सी आठ? क्षत्रिय-सभा, ब्राह्मण-सभा, गृहपति-सभा, संन्यासी-सभा, चातुमहाराजिक-सभा, त्रायस्त्रिंश-सभा, मार-सभा, ब्रह्मा-सभा—सारिपुत्त! ये आठ सभाएँ हैं। सारिपुत्त! इन चार वेसारज से युक्त तथागत ये आठ सभाओं में प्रवेश करते हैं, प्रवेशित होते हैं। सारिपुत्त! मैं जानता हूँ कि अनेक सौ क्षत्रिय-सभाओं में गया। वहाँ भी मेरे द्वारा बैठा गया, बात की गई, प्रश्नोत्तर किया गया। वहाँ तो भय या लज्जा आएगी, सारिपुत्त! ऐसा निमित्त मैं नहीं देखता। सारिपुत्त! इस निमित्त को न देखकर मैं निर्भय प्राप्त, अभय प्राप्त, वेसारज प्राप्त होकर रहता हूँ।


सारिपुत्त! मैं जानता हूँ कि अनेक सौ ब्राह्मण-सभाओं में... (इत्यादि)... गृहपति-सभाओं में... संन्यासी-सभाओं में... चातुमहाराजिक-सभाओं में... त्रायस्त्रिंश-सभाओं में... मार-सभाओं में... ब्रह्मा-सभाओं में गया। वहाँ भी मेरे द्वारा बैठा गया, बात की गई, प्रश्नोत्तर किया गया। वहाँ तो भय या लज्जा आएगी, सारिपुत्त! ऐसा निमित्त मैं नहीं देखता। सारिपुत्त! इस निमित्त को न देखकर मैं निर्भय प्राप्त, अभय प्राप्त, वेसारज प्राप्त होकर रहता हूँ।


सारिपुत्त! जो मुझे इस प्रकार जानने वाले, देखने वाले, कहने वाले को इस प्रकार कहे—‘समण गोतम के मनुष्य-धम्म से ऊपर कोई अलं आर्य ज्ञान-दर्शन-विशेष नहीं है, समण गोतम तर्क-परिपक्व धम्म का उपदेश करते हैं, विचार-अनुसरणीय, स्वयं-प्रतिभान’ तो सारिपुत्त! वह वाणी को न त्यागकर, चित्त को न त्यागकर, दृष्टि को न परित्याग करके यथावत् रखकर नरक में ही पतित होता है। सारिपुत्त! जैसे भिक्षु शील-संपन्न, समाधि-संपन्न, प्रज्ञा-संपन्न वर्तमान में अज्ञान को आराधना करे, सारिपुत्त! इतना ही समान है, ऐसा मैं कहता हूँ। वह वाणी को न त्यागकर, चित्त को न त्यागकर, दृष्टि को न परित्याग करके यथावत् रखकर नरक में ही पतित होता है।


7. “सारिपुत्त! ये चार योनियाँ हैं। कौन सी चार? अण्डज योनि, जलाबुज योनि, संसेदज योनि, उपपातिक योनि। सारिपुत्त! अण्डज योनि क्या है? सारिपुत्त! जो प्राणी अण्ड-कोश को फोड़कर जन्म लेते हैं—सारिपुत्त! इसे ही अण्डज योनि कहा जाता है। सारिपुत्त! जलाबुज योनि क्या है? सारिपुत्त! जो प्राणी वात्थी-कोश को फोड़कर जन्म लेते हैं—सारिपुत्त! इसे ही जलाबुज योनि कहा जाता है। सारिपुत्त! संसेदज योनि क्या है? सारिपुत्त! जो प्राणी सड़े मछली में या सड़े मृत शरीर में या सड़े किण्व में या चन्दनिका में या ओलिगल्ल में जन्म लेते हैं—सारिपुत्त! इसे ही संसेदज योनि कहा जाता है। सारिपुत्त! उपपातिक योनि क्या है? देव, नरकवासी, कुछ मनुष्य, कुछ विनिपातिक—सारिपुत्त! इसे ही उपपातिक योनि कहा जाता है। सारिपुत्त! ये चार योनियाँ हैं।


सारिपुत्त! जो मुझे इस प्रकार जानने वाले, देखने वाले, कहने वाले को इस प्रकार कहे—‘समण गोतम के मनुष्य-धम्म से ऊपर कोई अलं आर्य ज्ञान-दर्शन-विशेष नहीं है, समण गोतम तर्क-परिपक्व धम्म का उपदेश करते हैं, विचार-अनुसरणीय, स्वयं-प्रतिभान’ तो सारिपुत्त! वह वाणी को न त्यागकर, चित्त को न त्यागकर, दृष्टि को न परित्याग करके यथावत् रखकर नरक में ही पतित होता है। सारिपुत्त! जैसे भिक्षु शील-संपन्न, समाधि-संपन्न, प्रज्ञा-संपन्न वर्तमान में अज्ञान को आराधना करे, सारिपुत्त! इतना ही समान है, ऐसा मैं कहता हूँ। वह वाणी को न त्यागकर, चित्त को न त्यागकर, दृष्टि को न परित्याग करके यथावत् रखकर नरक में ही पतित होता है।


8. “सारिपुत्त! ये पाँच गतियाँ हैं। कौन सी पाँच? नरक, तिर्यक्-योनि, पेत-विशय, मनुष्य, देव। सारिपुत्त! नरक को मैं जानता हूँ, नरक-गामी मार्ग को जानता हूँ, नरक-गामी मार्ग को जानता हूँ; जिस प्रकार प्रवृत्त होकर काय-भेदा परमरणा अपाय दुर्गति विनिपात नरक में उत्पन्न होता है वह जानता हूँ। तिर्यक्-योनि को मैं जानता हूँ, तिर्यक्-योनि-गामी मार्ग को जानता हूँ, तिर्यक्-योनि-गामी मार्ग को जानता हूँ; जिस प्रकार प्रवृत्त होकर काय-भेदा परमरणा तिर्यक्-योनि में उत्पन्न होता है वह जानता हूँ। पेत-विशय को मैं जानता हूँ, पेत-विशय-गामी मार्ग को जानता हूँ, पेत-विशय-गामी मार्ग को जानता हूँ; जिस प्रकार प्रवृत्त होकर काय-भेदा परमरणा पेत-विशय में उत्पन्न होता है वह जानता हूँ। मनुष्यों को मैं जानता हूँ, मनुष्य-लोक-गामी मार्ग को जानता हूँ, मनुष्य-लोक-गामी मार्ग को जानता हूँ; जिस प्रकार प्रवृत्त होकर काय-भेदा परमरणा मनुष्यों में उत्पन्न होता है वह जानता हूँ। देवों को मैं जानता हूँ, देव-लोक-गामी मार्ग को जानता हूँ, देव-लोक-गामी मार्ग को जानता हूँ; जिस प्रकार प्रवृत्त होकर काय-भेदा परमरणा सुगति स्वर्ग लोक में उत्पन्न होता है वह जानता हूँ। निर्वाण को मैं जानता हूँ, निर्वाण-गामी मार्ग को जानता हूँ, निर्वाण-गामी मार्ग को जानता हूँ; जिस प्रकार प्रवृत्त होकर आस्रवों के क्षय से अनास्रव चित्त-विमुक्ति, प्रज्ञा-विमुक्ति को वर्तमान में स्वयं प्रत्यक्ष जानकर प्रमाण करके प्राप्त करके रहता है वह जानता हूँ।


सारिपुत्त! यहाँ मैं किसी-किसी व्यक्ति को चित्त से चित्त प्रत्यक्ष जानता हूँ—इस प्रकार यह व्यक्ति प्रवृत्त है, इस प्रकार आचरण करता है, इस मार्ग पर चढ़ा हुआ है, जिस प्रकार काय-भेदा परमरणा अपाय दुर्गति विनिपात नरक में उत्पन्न होगा। उसे मैं दूसरे समय दिव्य चक्षु से शुद्ध, मानुष्य चक्षु से श्रेष्ठ काय-भेदा परमरणा अपाय दुर्गति विनिपात नरक में उत्पन्न देखता हूँ, एकान्त दुःख तीव्र कटु वेदना का अनुभव करता हुआ। सारिपुत्त! जैसे अंगार के ढेर पर सादी हुई थाली अंगारों की रखी हो, वीतच्युत, वीतधूम। फिर कोई पुरुष आए गर्मी से पीड़ित, गर्मी से क्लान्त, थका हुआ, काँपता हुआ, पिपासित एकमात्र मार्ग से उस अंगार के ढेर की ओर निर्देशित। उसे चक्षु वाला पुरुष देखकर कहे—‘इस प्रकार यह पुरुष प्रवृत्त है, इस प्रकार आचरण करता है, इस मार्ग पर चढ़ा हुआ है, जिस प्रकार इसी अंगार के ढेर पर पहुँचेगा।’ उसे वह दूसरे समय उस अंगार के ढेर पर गिरा हुआ देखे, एकान्त दुःख तीव्र कटु वेदना का अनुभव करता हुआ। इसी प्रकार, सारिपुत्त! मैं यहाँ किसी-किसी व्यक्ति को चित्त से चित्त प्रत्यक्ष जानता हूँ—इस प्रकार यह व्यक्ति प्रवृत्त है, इस प्रकार आचरण करता है, इस मार्ग पर चढ़ा हुआ है, जिस प्रकार काय-भेदा परमरणा अपाय दुर्गति विनिपात नरक में उत्पन्न होगा। उसे मैं दूसरे समय दिव्य चक्षु से शुद्ध, मानुष्य चक्षु से श्रेष्ठ काय-भेदा परमरणा अपाय दुर्गति विनिपात नरक में उत्पन्न देखता हूँ, एकान्त दुःख तीव्र कटु वेदना का अनुभव करता हुआ।


सारिपुत्त! यहाँ मैं किसी-किसी व्यक्ति को चित्त से चित्त प्रत्यक्ष जानता हूँ—इस प्रकार यह व्यक्ति प्रवृत्त है, इस प्रकार आचरण करता है, इस मार्ग पर चढ़ा हुआ है, जिस प्रकार काय-भेदा परमरणा तिर्यक्-योनि में उत्पन्न होगा। उसे मैं दूसरे समय दिव्य चक्षु से शुद्ध, मानुष्य चक्षु से श्रेष्ठ काय-भेदा परमरणा तिर्यक्-योनि में उत्पन्न देखता हूँ, दुःख तीव्र कटु वेदना का अनुभव करता हुआ। सारिपुत्त! जैसे गोबर का कूप सादी हुई थाली, गोबर से भरा। फिर कोई पुरुष आए गर्मी से पीड़ित, गर्मी से क्लान्त, थका हुआ, काँपता हुआ, पिपासित एकमात्र मार्ग से उस गोबर के कूप की ओर निर्देशित। उसे चक्षु वाला पुरुष देखकर कहे—‘इस प्रकार यह पुरुष प्रवृत्त है, इस प्रकार आचरण करता है, इस मार्ग पर चढ़ा हुआ है, जिस प्रकार इसी गोबर के कूप पर पहुँचेगा।’ उसे वह दूसरे समय उस गोबर के कूप में गिरा हुआ देखे, दुःख तीव्र कटु वेदना का अनुभव करता हुआ। इसी प्रकार, सारिपुत्त! मैं यहाँ किसी-किसी व्यक्ति को चित्त से चित्त प्रत्यक्ष जानता हूँ—इस प्रकार यह व्यक्ति प्रवृत्त है, इस प्रकार आचरण करता है, इस मार्ग पर चढ़ा हुआ है, जिस प्रकार काय-भेदा परमरणा तिर्यक्-योनि में उत्पन्न होगा। उसे मैं दूसरे समय दिव्य चक्षु से शुद्ध, मानुष्य चक्षु से श्रेष्ठ काय-भेदा परमरणा तिर्यक्-योनि में उत्पन्न देखता हूँ, दुःख तीव्र कटु वेदना का अनुभव करता हुआ।


सारिपुत्त! यहाँ मैं किसी-किसी व्यक्ति को चित्त से चित्त प्रत्यक्ष जानता हूँ—इस प्रकार यह व्यक्ति प्रवृत्त है, इस प्रकार आचरण करता है, इस मार्ग पर चढ़ा हुआ है, जिस प्रकार काय-भेदा परमरणा पेत-विशय में उत्पन्न होगा। उसे मैं दूसरे समय दिव्य चक्षु से शुद्ध, मानुष्य चक्षु से श्रेष्ठ काय-भेदा परमरणा पेत-विशय में उत्पन्न देखता हूँ, दुःखबहुल वेदना का अनुभव करता हुआ। सारिपुत्त! जैसे वृक्ष असमतल भूमि पर उत्पन्न हो, पातल पत्ता, पातल छाया। फिर कोई पुरुष आए गर्मी से पीड़ित, गर्मी से क्लान्त, थका हुआ, काँपता हुआ, पिपासित एकमात्र मार्ग से उस वृक्ष की ओर निर्देशित। उसे चक्षु वाला पुरुष देखकर कहे—‘इस प्रकार यह पुरुष प्रवृत्त है, इस प्रकार आचरण करता है, इस मार्ग पर चढ़ा हुआ है, जिस प्रकार इसी वृक्ष पर पहुँचेगा।’ उसे वह दूसरे समय उस वृक्ष की छाया में बैठा हुआ या लेटा हुआ देखे, दुःखबहुल वेदना का अनुभव करता हुआ। इसी प्रकार, सारिपुत्त! मैं यहाँ किसी-किसी व्यक्ति को चित्त से चित्त प्रत्यक्ष जानता हूँ—इस प्रकार यह व्यक्ति प्रवृत्त है, इस प्रकार आचरण करता है, इस मार्ग पर चढ़ा हुआ है, जिस प्रकार काय-भेदा परमरणा पेत-विशय में उत्पन्न होगा। उसे मैं दूसरे समय दिव्य चक्षु से शुद्ध, मानुष्य चक्षु से श्रेष्ठ काय-भेदा परमरणा पेत-विशय में उत्पन्न देखता हूँ, दुःखबहुल वेदना का अनुभव करता हुआ।


सारिपुत्त! यहाँ मैं किसी-किसी व्यक्ति को चित्त से चित्त प्रत्यक्ष जानता हूँ—इस प्रकार यह व्यक्ति प्रवृत्त है, इस प्रकार आचरण करता है, इस मार्ग पर चढ़ा हुआ है, जिस प्रकार काय-भेदा परमरणा मनुष्यों में उत्पन्न होगा। उसे मैं दूसरे समय दिव्य चक्षु से शुद्ध, मानुष्य चक्षु से श्रेष्ठ काय-भेदा परमरणा मनुष्यों में उत्पन्न देखता हूँ, सुखबहुल वेदना का अनुभव करता हुआ। सारिपुत्त! जैसे वृक्ष समतल भूमि पर उत्पन्न हो, बहुल पत्ता, बहुल छाया। फिर कोई पुरुष आए गर्मी से पीड़ित, गर्मी से क्लान्त, थका हुआ, काँपता हुआ, पिपासित एकमात्र मार्ग से उस वृक्ष की ओर निर्देशित। उसे चक्षु वाला पुरुष देखकर कहे—‘इस प्रकार यह पुरुष प्रवृत्त है, इस प्रकार आचरण करता है, इस मार्ग पर चढ़ा हुआ है, जिस प्रकार इसी वृक्ष पर पहुँचेगा।’ उसे वह दूसरे समय उस वृक्ष की छाया में बैठा हुआ या लेटा हुआ देखे, सुखबहुल वेदना का अनुभव करता हुआ। इसी प्रकार, सारिपुत्त! मैं यहाँ किसी-किसी व्यक्ति को चित्त से चित्त प्रत्यक्ष जानता हूँ—इस प्रकार यह व्यक्ति प्रवृत्त है, इस प्रकार आचरण करता है, इस मार्ग पर चढ़ा हुआ है, जिस प्रकार काय-भेदा परमरणा मनुष्यों में उत्पन्न होगा। उसे मैं दूसरे समय दिव्य चक्षु से शुद्ध, मानुष्य चक्षु से श्रेष्ठ काय-भेदा परमरणा मनुष्यों में उत्पन्न देखता हूँ, सुखबहुल वेदना का अनुभव करता हुआ।


सारिपुत्त! यहाँ मैं किसी-किसी व्यक्ति को चित्त से चित्त प्रत्यक्ष जानता हूँ—इस प्रकार यह व्यक्ति प्रवृत्त है, इस प्रकार आचरण करता है, इस मार्ग पर चढ़ा हुआ है, जिस प्रकार काय-भेदा परमरणा सुगति स्वर्ग लोक में उत्पन्न होगा। उसे मैं दूसरे समय दिव्य चक्षु से शुद्ध, मानुष्य चक्षु से श्रेष्ठ काय-भेदा परमरणा सुगति स्वर्ग लोक में उत्पन्न देखता हूँ, एकान्त सुख वेदना का अनुभव करता हुआ। सारिपुत्त! जैसे प्रासाद, वहाँ कूटागार चिकना, चिकना, वातरहित, फूसित, द्वार बंद। वहाँ पद्मासन गौ-चर्म से, पट्ट से, पटलीक से, कदली-मृग-चर्म से, उत्तम छत्र से, उभयतः लोहित-कूप-धान से। फिर कोई पुरुष आए गर्मी से पीड़ित, गर्मी से क्लान्त, थका हुआ, काँपता हुआ, पिपासित एकमात्र मार्ग से उसी प्रासाद की ओर निर्देशित। उसे चक्षु वाला पुरुष देखकर कहे—‘इस प्रकार यह पुरुष प्रवृत्त है, इस प्रकार आचरण करता है, इस मार्ग पर चढ़ा हुआ है, जिस प्रकार उसी प्रासाद पर पहुँचेगा।’ उसे वह दूसरे समय उस प्रासाद में, उस कूटागार में, उस पद्मासन पर बैठा हुआ या लेटा हुआ देखे, एकान्त सुख वेदना का अनुभव करता हुआ। इसी प्रकार, सारिपुत्त! मैं यहाँ किसी-किसी व्यक्ति को चित्त से चित्त प्रत्यक्ष जानता हूँ—इस प्रकार यह व्यक्ति प्रवृत्त है, इस प्रकार आचरण करता है, इस मार्ग पर चढ़ा हुआ है, जिस प्रकार काय-भेदा परमरणा सुगति स्वर्ग लोक में उत्पन्न होगा। उसे मैं दूसरे समय दिव्य चक्षु से शुद्ध, मानुष्य चक्षु से श्रेष्ठ काय-भेदा परमरणा सुगति स्वर्ग लोक में उत्पन्न देखता हूँ, एकान्त सुख वेदना का अनुभव करता हुआ।


सारिपुत्त! यहाँ मैं किसी-किसी व्यक्ति को चित्त से चित्त प्रत्यक्ष जानता हूँ—इस प्रकार यह व्यक्ति प्रवृत्त है, इस प्रकार आचरण करता है, इस मार्ग पर चढ़ा हुआ है, जिस प्रकार आस्रवों के क्षय से अनास्रव चित्त-विमुक्ति, प्रज्ञा-विमुक्ति को वर्तमान में स्वयं प्रत्यक्ष जानकर प्रमाण करके प्राप्त करके रहेगा। उसे मैं दूसरे समय आस्रवों के क्षय से अनास्रव चित्त-विमुक्ति, प्रज्ञा-विमुक्ति को वर्तमान में स्वयं प्रत्यक्ष जानकर प्रमाण करके प्राप्त करके रहते हुए देखता हूँ, एकान्त सुख वेदना का अनुभव करता हुआ। सारिपुत्त! जैसे सरोवर शुद्ध जल, शीतल जल, शीतल जल, श्वेत जल, सुंदर घाट, मनोहर। उसके निकट तीव्र वनसंधि। फिर कोई पुरुष आए गर्मी से पीड़ित, गर्मी से क्लान्त, थका हुआ, काँपता हुआ, पिपासित एकमात्र मार्ग से उसी सरोवर की ओर निर्देशित। उसे चक्षु वाला पुरुष देखकर कहे—‘इस प्रकार यह पुरुष प्रवृत्त है, इस प्रकार आचरण करता है, इस मार्ग पर चढ़ा हुआ है, जिस प्रकार उसी सरोवर पर पहुँचेगा।’ उसे वह दूसरे समय उस सरोवर में उतरकर स्नान करके पीकर सब दुराग्रह-क्लेश-परिश्रम को शांत करके, बाहर निकलकर उस वनसंधि में बैठा हुआ या लेटा हुआ देखे, एकान्त सुख वेदना का अनुभव करता हुआ। इसी प्रकार, सारिपुत्त! मैं यहाँ किसी-किसी व्यक्ति को चित्त से चित्त प्रत्यक्ष जानता हूँ—इस प्रकार यह व्यक्ति प्रवृत्त है, इस प्रकार आचरण करता है, इस मार्ग पर चढ़ा हुआ है, जिस प्रकार आस्रवों के क्षय से अनास्रव चित्त-विमुक्ति, प्रज्ञा-विमुक्ति को वर्तमान में स्वयं प्रत्यक्ष जानकर प्रमाण करके प्राप्त करके रहेगा। उसे मैं दूसरे समय आस्रवों के क्षय से अनास्रव चित्त-विमुक्ति, प्रज्ञा-विमुक्ति को वर्तमान में स्वयं प्रत्यक्ष जानकर प्रमाण करके प्राप्त करके रहते हुए देखता हूँ, एकान्त सुख वेदना का अनुभव करता हुआ। सारिपुत्त! ये पाँच गतियाँ हैं।


सारिपुत्त! जो मुझे इस प्रकार जानने वाले, देखने वाले, कहने वाले को इस प्रकार कहे—‘समण गोतम के मनुष्य-धम्म से ऊपर कोई अलं आर्य ज्ञान-दर्शन-विशेष नहीं है; समण गोतम तर्क-परिपक्व धम्म का उपदेश करते हैं, विचार-अनुसरणीय, स्वयं-प्रतिभान’ तो सारिपुत्त! वह वाणी को न त्यागकर, चित्त को न त्यागकर, दृष्टि को न परित्याग करके यथावत् रखकर नरक में ही पतित होता है। सारिपुत्त! जैसे भिक्षु शील-संपन्न, समाधि-संपन्न, प्रज्ञा-संपन्न वर्तमान में अज्ञान को आराधना करे, सारिपुत्त! इतना ही समान है, ऐसा मैं कहता हूँ। वह वाणी को न त्यागकर, चित्त को न त्यागकर, दृष्टि को न परित्याग करके यथावत् रखकर नरक में ही पतित होता है।


9. “सारिपुत्त! मैं चार अंगों से युक्त ब्रह्मचर्य का चरित जानता हूँ—तपस्वी मैं था, परम तपस्वी; कठोर मैं था, परम कठोर; जेगुच्छी मैं था, परम जेगुच्छी; पविवित्त मैं था, परम पविवित्त। वहाँ मेरे लिए तपस्या में यह था—नग्न मैं था, मुक्ताचार, हाथ से फेरे हुए, न दाँत साफ करने वाला, न खड़े होकर दाँत साफ करने वाला; न अभिहत, न निर्दिष्ट, न निमंत्रित भोजन ग्रहण करता। मैं न कुम्भिमुख ग्रहण करता, न कलोपिमुख ग्रहण करता, न एलकमूल, न दंडमूल, न मुसलमूल, न दो भोजन करने वालों के, न गर्भिणी के, न पायमान की, न पुरुष के बीच में, न संकीर्ण स्थानों में, न जहाँ वह उपस्थित हो वहाँ, न जहाँ मक्खियाँ घूमती रहें; न मछली, न मांस, न सुरा, न मेरय, न थूसोदक पीता। मैं एक-घर वाला या एक-भोजन वाला होता, दो-घर वाला या दो-भोजन वाला... (इत्यादि)... सात-घर वाला या सात-भोजन वाला; एक दान से भी निर्वाह करता, दो दानों से भी... (इत्यादि)... सात दानों से भी निर्वाह करता; एकाहिक भोजन भी करता, द्वीहिक भोजन भी... (इत्यादि)... सप्ताहिक भोजन भी करता; इस प्रकार अर्धमासिक भी परियाय-भोजन-योग में अनुरक्त रहता।


मैं कच्चे भोजन वाला या पीसा हुआ भोजन वाला या नीवार भोजन वाला या दद्दुल भोजन वाला या हट भोजन वाला या कण भोजन वाला या आचाम भोजन वाला या पिञ्ञाक भोजन वाला या तिण भोजन वाला या गोमय भोजन वाला होता, वन-मूल-फल-आहार से निर्वाह करता, उपलब्ध फल-भोजन करने वाला।


मैं सानानि भी धारण करता, मसानानि भी धारण करता, छवदुस्सानि भी धारण करता, पंसुकूलानि भी धारण करता, तिरिटानि भी धारण करता, अजिन भी धारण करता, अजिनकखिप भी धारण करता, कुसचीर भी धारण करता, वाकचीर भी धारण करता, फलकचीर भी धारण करता, केसकम्बल भी धारण करता, वलकम्बल भी धारण करता, उलूकपक्ख भी धारण करता; केसमस्सुलोचक भी होता, केसमस्सुलोचन-योग में अनुरक्त; उभ्यट्ठक भी होता, आसन-त्यागी; उकुटिक भी होता, उकुटिक-प्रधान-योग में अनुरक्त; कंटकापस्सयिक भी होता, कंटका-पस्सये शयन करता; सायततियक भी होता, उदक-उरोहरण-योग में अनुरक्त रहता—इस प्रकार अनेक प्रकार के काय के आताप-परितापन-योग में अनुरक्त रहता। सारिपुत्त! मेरे लिए तपस्या में यही था।


10. “वहाँ मेरे लिए कठोरता में यह था—मेरे काय में अनेक वर्षों का राजोजल संचित होता, पपटिक जात। सारिपुत्त! जैसे तिन्दुक-खंडु अनेक वर्षों का संचित होता, पपटिक जात, इसी प्रकार मेरे काय में अनेक वर्षों का राजोजल संचित होता, पपटिक जात। सारिपुत्त! मेरे लिए ऐसा नहीं होता—‘काश! मैं इस राजोजल को हाथ से मलूँ, या अन्य मेरे इस राजोजल को हाथ से मलें।’ सारिपुत्त! मेरे लिए ऐसा भी नहीं होता। सारिपुत्त! मेरे लिए कठोरता में यही था।


वहाँ मेरे लिए जेगुच्छिता में यह था—सारिपुत्त! मैं स्मृतिपूर्ण होकर आगे जाता, स्मृतिपूर्ण होकर पीछे जाता, इतना कि जल की बूंदों में भी मेरी दया उपस्थित रहती—‘मैंने छोटे प्राणी को विसमगत पर संघात दिया।’ सारिपुत्त! मेरे लिए जेगुच्छिता में यही था।


वहाँ मेरे लिए पविवित्तता में यह था—सारिपुत्त! मैं किसी-किसी जंगल-स्थान को प्रवेशित होकर रहता। जब गोपालक या पशुपालक या तिणहारक या काठहारक या वनकर्मिक को देखता, वन से वन, घने से घना, नीचे से नीचा, समतल से समतल जाता। क्यों? कहीं वे मुझे न देखें और मैं उन्हें न देखूँ। सारिपुत्त! जैसे जंगली मृग मनुष्यों को देखकर वन से वन, घने से घना, नीचे से नीचा, समतल से समतल जाता, इसी प्रकार, सारिपुत्त! जब मैं गोपालक या पशुपालक या तिणहारक या काठहारक या वनकर्मिक को देखता, वन से वन, घने से घना, नीचे से नीचा, समतल से समतल जाता। क्यों? कहीं वे मुझे न देखें और मैं उन्हें न देखूँ। सारिपुत्त! मेरे लिए पविवित्तता में यही था।


सारिपुत्त! वे जो गौएँ बँधे हुए हैं, गोपालकों से रहित, वहाँ चतुर्कुंडिक जाकर जो वत्सकों के युवा गौओं के धेनु-पक गौमय होते, उनको ही मैं खाता। सारिपुत्त! जब तक मेरी अपनी मुक्त-करीस अपर्याप्त न हो, अपनी ही मुक्त-करीस खाता। सारिपुत्त! मेरे लिए महाविकट-भोजन में यही था।


11. “सारिपुत्त! मैं किसी-किसी भयजनक वनसंधि को प्रवेशित होकर रहता। वहाँ, सारिपुत्त! भयजनक वनसंधि का भयजनक ही होता—जो कोई अवीरक्त उस वनसंधि में प्रवेश करता, प्रायः लोम हर्षित होता। सारिपुत्त! मैं वे रातें जो शीतल हेमन्तिक, अन्तरट्ठक, हिमपात-समय की ऐसी रातों में रात्रि को खुले में रहता, दिवस को वनसंधि में; ग्रीष्म के पश्चिम मास में दिवस को खुले में रहता, रात्रि को वनसंधि में। सारिपुत्त! कभी-कभी यह अनोचरिय गाथा मेरे पास आती, पहले न सुनी हुई—


‘सोतत्तो सोसिन्नो चेव, एको भिंसनके वने।

नग्गो न चग्गिमासीनो, एसनापसुतो मुनी’ति॥


सारिपुत्त! मैं श्मशान में शयन करता, छह फुट की भूमि पर। सारिपुत्त! कभी-कभी गामीण आकर मुझे थूकते, मूत्र करते, पंसे से अर्पित करते, कान के छिद्र में सलाख डालते। सारिपुत्त! मैं उनमें पापपूर्ण चित्त उत्पन्न करने वाला नहीं जानता। सारिपुत्त! मेरे लिए उपेक्षा-विहार में यही था।


12. “सारिपुत्त! कुछ संन्यासी-ब्राह्मण इस प्रकार कहने वाले, इस प्रकार दृष्टि वाले हैं—‘आहार से शुद्धि’। वे इस प्रकार कहते—‘कोले से निर्वाह करें’। वे कोल भी खाते, कोल-चूर्ण भी खाते, कोल-जल भी पीते—अनेक प्रकार के कोल-विकृत का उपभोग करते। सारिपुत्त! मैं एक ही कोल आहार का आहार लिया। सारिपुत्त! कदाचित् तुम्हें ऐसा लगे—‘निश्चय ही उस समय कोला ही था।’ किन्तु सारिपुत्त! ऐसा नहीं देखना चाहिए। उस समय भी यही परम कोला था जैसे अब। सारिपुत्त! एक ही कोल आहार लेने से मेरा काय अधिमत्तक-सीमाँ प्राप्त हो जाता। जैसे आसीतिक-पर्व या काल-पर्व, सारिपुत्त! मेरे अंग-पच्चंग भी वैसा ही हो जाते उस आहार से। जैसे ओठपद, सारिपुत्त! मेरी आनिसद वैसी ही हो जाती उस आहार से। जैसे वट्टनावली, सारिपुत्त! मेरा पीठ-कंटक ऊँचा हो जाता उस आहार से। जैसे जरसाला के गोपानसिय ओलुग्ग-विलुग्ग हो जाते, सारिपुत्त! मेरी फासु लिय ओलुग्ग-विलुग्ग हो जातीं उस आहार से। जैसे गहन उदपान में उदक-तारक गहनगत ओक्खायिक दिखते, सारिपुत्त! मेरी अक्षि-कूपों में अक्षि-तारक गहनगत ओक्खायिक दिखते उस आहार से। जैसे तित्तकाला-बु आमकच्छिन्न वातातप से संफुटित हो जाता सम्मिलात, सारिपुत्त! मेरी शीर्ष-त्वचा संफुटित हो जाती सम्मिलात उस आहार से। सारिपुत्त! मैं ‘उदर-त्वचा को मलूँगा’ ऐसा सोचकर पीठ-कंटक को ही ग्रहण करता, ‘पीठ-कंटक को मलूँगा’ ऐसा सोचकर उदर-त्वचा को ही ग्रहण करता, इतना कि सारिपुत्त! मेरी उदर-त्वचा पीठ-कंटक से लिप्त हो जाती उस आहार से। सारिपुत्त! मैं ‘वायु या मल त्यागूँगा’ ऐसा सोचकर वहीं कुजकर गिरता उस आहार से। सारिपुत्त! मैं उसी काय को श्वास से प्रेरित करके पाणि से अंगों को मलता। सारिपुत्त! पाणि से अंगों को मलने से सड़े मूल के लोम काय से गिरते उस आहार से।


13. “सारिपुत्त! कुछ संन्यासी-ब्राह्मण इस प्रकार कहने वाले, इस प्रकार दृष्टि वाले हैं—‘आहार से शुद्धि’। वे इस प्रकार कहते—‘मूँग से निर्वाह करें... (इत्यादि)... तिल से निर्वाह करें... (इत्यादि)... तण्डुल से निर्वाह करें।’ वे तण्डुल भी खाते, तण्डुल-चूर्ण भी खाते, तण्डुल-जल भी पीते—अनेक प्रकार के तण्डुल-विकृत का उपभोग करते। सारिपुत्त! मैं एक ही तण्डुल आहार का आहार लिया। सारिपुत्त! कदाचित् तुम्हें ऐसा लगे—‘निश्चय ही उस समय तण्डुल ही था।’ किन्तु सारिपुत्त! ऐसा नहीं देखना चाहिए। उस समय भी यही परम तण्डुल था, जैसे अब। सारिपुत्त! एक ही तण्डुल आहार लेने से मेरा काय अधिमत्तक-सीमाँ प्राप्त हो जाता। जैसे आसीतिक-पर्व या काल-पर्व, सारिपुत्त! मेरे अंग-पच्चंग भी वैसा ही हो जाते उस आहार से। जैसे ओठपद, सारिपुत्त! मेरी आनिसद वैसी ही हो जाती उस आहार से। जैसे वट्टनावली, सारिपुत्त! मेरा पीठ-कंटक ऊँचा हो जाता उस आहार से। जैसे जरसाला के गोपानसिय ओलुग्ग-विलुग्ग हो जाते, सारिपुत्त! मेरी फासु लिय ओलुग्ग-विलुग्ग हो जातीं उस आहार से। जैसे गहन उदपान में उदक-तारक गहनगत ओक्खायिक दिखते, सारिपुत्त! मेरी अक्षि-कूपों में अक्षि-तारक गहनगत ओक्खायिक दिखते उस आहार से। जैसे तित्तकाला-बु आमकच्छिन्न वातातप से संफुटित हो जाता सम्मिलात, सारिपुत्त! मेरी शीर्ष-त्वचा संफुटित हो जाती सम्मिलात उस आहार से। सारिपुत्त! मैं ‘उदर-त्वचा को मलूँगा’ ऐसा सोचकर पीठ-कंटक को ही ग्रहण करता, ‘पीठ-कंटक को मलूँगा’ ऐसा सोचकर उदर-त्वचा को ही ग्रहण करता। इतना कि सारिपुत्त! मेरी उदर-त्वचा पीठ-कंटक से लिप्त हो जाती उस आहार से। सारिपुत्त! मैं ‘वायु या मल त्यागूँगा’ ऐसा सोचकर वहीं कुजकर गिरता उस आहार से। सारिपुत्त! मैं उसी काय को श्वास से प्रेरित करके पाणि से अंगों को मलता। सारिपुत्त! पाणि से अंगों को मलने से सड़े मूल के लोम काय से गिरते उस आहार से।


सारिपुत्त! इस प्रकार के आचरण से, इस प्रकार के मार्ग से, इस प्रकार के दुर्कर कार्य से मैं मनुष्य-धम्म से ऊपर अलं आर्य ज्ञान-दर्शन-विशेष को प्राप्त नहीं हुआ। क्यों? क्योंकि इस आर्य प्रज्ञा को न प्राप्त किया, जो आर्यों द्वारा प्राप्त आर्य निय्यानिका है, तर्क-रस से सम्यक् दुःख-क्षय की ओर जाती।


14. “सारिपुत्त! कुछ संन्यासी-ब्राह्मण इस प्रकार कहने वाले, इस प्रकार दृष्टि वाले हैं—‘संसार से शुद्धि’। किन्तु सारिपुत्त! वह संसार सुगम रूप का नहीं जो मेरे द्वारा असंसारित पहले इस दीर्घ काल में, सुद्धावास देवों को छोड़कर। सारिपुत्त! यदि मैं सुद्धावास देवों में संसार करूँ, तो इस लोक में पुनरागमन न करूँ।


सारिपुत्त! कुछ संन्यासी-ब्राह्मण इस प्रकार कहने वाले, इस प्रकार दृष्टि वाले हैं—‘उपपत्ति से शुद्धि’। किन्तु सारिपुत्त! वह उपपत्ति सुगम रूप की नहीं जो मेरे द्वारा अनुपपन्न पहले इस दीर्घ काल में, सुद्धावास देवों को छोड़कर। सारिपुत्त! यदि मैं सुद्धावास देवों में उत्पन्न होऊँ, तो इस लोक में पुनरागमन न करूँ।


सारिपुत्त! कुछ संन्यासी-ब्राह्मण इस प्रकार कहने वाले, इस प्रकार दृष्टि वाले हैं—‘आवास से शुद्धि’। किन्तु सारिपुत्त! वह आवास सुगम रूप का नहीं जो मेरे द्वारा अनावुट्ठ पहले इस दीर्घ काल में, सुद्धावास देवों को छोड़कर। सारिपुत्त! यदि मैं सुद्धावास देवों में आवास करूँ, तो इस लोक में पुनरागमन न करूँ।


सारिपुत्त! कुछ संन्यासी-ब्राह्मण इस प्रकार कहने वाले, इस प्रकार दृष्टि वाले हैं—‘यज्ञ से शुद्धि’। किन्तु सारिपुत्त! वह यज्ञ सुगम रूप का नहीं जो मेरे द्वारा अयिट्ठ पहले इस दीर्घ काल में, और वह राजा या क्षत्रिय या ब्राह्मण या महासाल से।


सारिपुत्त! कुछ संन्यासी-ब्राह्मण इस प्रकार कहने वाले, इस प्रकार दृष्टि वाले हैं—‘अग्नि-परिचर्या से शुद्धि’। किन्तु सारिपुत्त! वह अग्नि सुगम रूप की नहीं जो मेरे द्वारा अपरिचिण्ण पहले इस दीर्घ काल में, और वह राजा या क्षत्रिय या ब्राह्मण या महासाल से।


15. “सारिपुत्त! कुछ संन्यासी-ब्राह्मण इस प्रकार कहने वाले, इस प्रकार दृष्टि वाले हैं—‘जब तक यह पुरुष युवा होता है, सुंदर, सुंदर बालों वाला, सुंदर युवावस्था से युक्त, प्रथम वयस्कता तक, तब तक परम प्रज्ञा-व्यक्तित्व से युक्त होता है। जब यह पुरुष वृद्ध होता है, बूढ़ा, महान् वयस्क, वय अनुप्राप्त, आठिक या नवतिक या शतवर्षीय जन्म से, तब उस प्रज्ञा-व्यक्तित्व का ह्रास होता है।’ किन्तु सारिपुत्त! ऐसा नहीं देखना चाहिए। सारिपुत्त! मैं अब वृद्ध हूँ, बूढ़ा, महान् वयस्क, वय अनुप्राप्त, आठिक मेरा वय है। सारिपुत्त! यहाँ मेरे चार शिष्य शतवर्ष-आयु, शतवर्ष-जीवी, परम श्रद्धा, परम गति, परम धृति, परम प्रज्ञा-व्यक्तित्व से युक्त। सारिपुत्त! जैसे दृढ़ धनुर्धर प्रशिक्षित, कृत्रहस्त, कृतोपासन, हल्के धनुष से थोड़े प्रयास से तिर्यक् तालछाया को पार करे, इसी प्रकार अधिमत्त-श्रद्धा-मत्त, अधिमत्त-गति-मत्त, अधिमत्त-धृति-मत्त, परम प्रज्ञा-व्यक्तित्व से युक्त। वे मुझे चार सतिपट्ठानों को आधार बनाकर प्रश्न पूछें, प्रश्नित होकर मैं उत्तर दूँ, उत्तरित को वे धारण करें, और मुझे द्वितीय बार पुनः न पूछें। स्नान, भोजन, खादन, सायन, मल-मूत्र-कर्म को छोड़कर, निद्रा-क्लेश-श्रम-विनोदना को छोड़कर, अपर्याप्त ही रहे, सारिपुत्त! तथागत का धम्म-उपदेश, अपर्याप्त ही रहे तथागत का धम्म-पद-व्यंजन, अपर्याप्त ही रहे तथागत का प्रश्न-प्रतिभान। फिर मेरे वे चार शिष्य शतवर्ष-आयु, शतवर्ष-जीवी शतवर्ष के अन्त में काल करें। सारिपुत्त! यदि तुम मुझे एक ही व्यक्ति से संभालो, तो भी तथागत के प्रज्ञा-व्यक्तित्व का अन्यथा होना नहीं है। सारिपुत्त! जो सम्यक् वक्ता कहे—‘असम्मोहधर्मक सत्ता लोक में उत्पन्न हुआ बहुजन-हित के लिए, बहुजन-सुख के लिए, लोक-अनुकम्पा के लिए, अर्थ के लिए, हित के लिए, सुख के लिए देव-मनुष्यों के’ तो वह मेरी ही सम्यक् वाणी कहेगा—‘असम्मोहधर्मक सत्ता लोक में उत्पन्न हुआ बहुजन-हित के लिए, बहुजन-सुख के लिए, लोक-अनुकम्पा के लिए, अर्थ के लिए, हित के लिए, सुख के लिए देव-मनुष्यों के।’”


16. उस समय सम्मानित नागसमाल भगवान् के पीछे खड़े होकर भगवान् की प्रशंसा कर रहे थे। तब सम्मानित नागसमाल ने भगवान् से कहा—“भन्ते! अचरित है, भन्ते! अभुत है, भन्ते! भन्ते! इस धम्म-प्रवाह को सुनकर मेरे लोम हर्षित हो गए। भन्ते! इस धम्म-प्रवाह का नाम क्या है?” “इसलिए तुम, नागसमाल! इस धम्म-प्रवाह को लोमहंसन-प्रवाह ही धारण करो।”


भगवान् ने इस प्रकार कहा। प्रसन्न होकर सम्मानित नागसमाल भगवान् की वाणी का अभिनंदन करते हुए।


महासिंहनाद सुत्त समाप्त, द्वितीय।


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