1. इस प्रकार मैंने सुना—एक समय भगवान् सावत्थि नगर में जेतवन उद्यान के अनाथपिण्डिक के आश्रम में ठहर रहे थे। वहाँ भगवान् ने भिक्षुओं को बुलाया—“भिक्षुओं!” “भदन्त!” वे भिक्षु भगवान् के सम्मति से उत्तर देते हुए बोले। भगवान् ने कहा—
“भिक्षुओं! यहाँ ही संन्यासी है, यहाँ दूसरा संन्यासी है, यहाँ तीसरा संन्यासी है, यहाँ चौथा संन्यासी है; संन्यासियों में अन्यों की निंदा शून्य है। भिक्षुओं! इस प्रकार ही सम्यक् सिंहनाद गर्जना करो।
2. “भिक्षुओं! यह संभव है कि अन्य तीर्थिक परिव्राजक इस प्रकार कहें—‘क्या सम्मानितों का आश्रय है, क्या बल है, जिससे तुम सम्मानित इस प्रकार कहते हो—यहाँ ही संन्यासी है, यहाँ दूसरा संन्यासी है, यहाँ तीसरा संन्यासी है, यहाँ चौथा संन्यासी है; संन्यासियों में अन्यों की निंदा शून्य है?’ भिक्षुओं! इस प्रकार कहने वाले अन्य तीर्थिक परिव्राजकों को इस प्रकार उत्तर देना चाहिए—‘मित्रों! भगवान् द्वारा ज्ञात, दृष्ट, अर्हत्, सम्यक्-संबुद्ध द्वारा चार धम्म बताए गए हैं जिन्हें हम स्वयं में देखकर इस प्रकार कहते हैं—यहाँ ही संन्यासी है, यहाँ दूसरा संन्यासी है, यहाँ तीसरा संन्यासी है, यहाँ चौथा संन्यासी है; संन्यासियों में अन्यों की निंदा शून्य है। कौन से चार? मित्रों! हमारे गुरु में प्रसन्नता है, धम्म में प्रसन्नता है, शीलों में पूर्णता है; सहधर्मिक प्रिय और मनोहर हैं—गृहस्थ और संन्यासी दोनों। मित्रों! ये ही भगवान् द्वारा ज्ञात, दृष्ट, अर्हत्, सम्यक्-संबुद्ध द्वारा चार धम्म बताए गए हैं जिन्हें हम स्वयं में देखकर इस प्रकार कहते हैं—यहाँ ही संन्यासी है, यहाँ दूसरा संन्यासी है, यहाँ तीसरा संन्यासी है, यहाँ चौथा संन्यासी है; संन्यासियों में अन्यों की निंदा शून्य है।’”
3. “भिक्षुओं! यह संभव है कि अन्य तीर्थिक परिव्राजक इस प्रकार कहें—‘मित्रों! हमारे भी गुरु में प्रसन्नता है जो हमारा गुरु है, हमारे भी धम्म में प्रसन्नता है जो हमारा धम्म है, हम भी शीलों में पूर्ण हैं जो हमारे शील हैं, हमारे भी सहधर्मिक प्रिय और मनोहर हैं—गृहस्थ और संन्यासी दोनों। मित्रों! हममें और तुममें क्या विशेष, क्या प्रयोजन, क्या भेद है?’
भिक्षुओं! इस प्रकार कहने वाले अन्य तीर्थिक परिव्राजकों को इस प्रकार उत्तर देना चाहिए—‘मित्रों! क्या एक ही अंत्य है, या भिन्न अंत्य?’ सम्यक् उत्तर देते हुए, भिक्षुओं! अन्य तीर्थिक परिव्राजक इस प्रकार कहेंगे—‘मित्रों! एक ही अंत्य है, भिन्न अंत्य नहीं।’
‘मित्रों! वह अंत्य रागयुक्त की है या विरक्त की?’ सम्यक् उत्तर देते हुए, भिक्षुओं! अन्य तीर्थिक परिव्राजक इस प्रकार कहेंगे—‘मित्रों! वह अंत्य विरक्त की है, रागयुक्त की नहीं।’
‘मित्रों! वह अंत्य द्वेषयुक्त की है या निर्वेष की?’ सम्यक् उत्तर देते हुए, भिक्षुओं! अन्य तीर्थिक परिव्राजक इस प्रकार कहेंगे—‘मित्रों! वह अंत्य निर्वेष की है, द्वेषयुक्त की नहीं।’
‘मित्रों! वह अंत्य मोहयुक्त की है या विमोह की?’ सम्यक् उत्तर देते हुए, भिक्षुओं! अन्य तीर्थिक परिव्राजक इस प्रकार कहेंगे—‘मित्रों! वह अंत्य विमोह की है, मोहयुक्त की नहीं।’
‘मित्रों! वह अंत्य तृष्णायुक्त की है या तृष्णारहित की?’ सम्यक् उत्तर देते हुए, भिक्षुओं! अन्य तीर्थिक परिव्राजक इस प्रकार कहेंगे—‘मित्रों! वह अंत्य तृष्णारहित की है, तृष्णायुक्त की नहीं।’
‘मित्रों! वह अंत्य उपादानयुक्त की है या अनुपादान की?’ सम्यक् उत्तर देते हुए, भिक्षुओं! अन्य तीर्थिक परिव्राजक इस प्रकार कहेंगे—‘मित्रों! वह अंत्य अनुपादान की है, उपादानयुक्त की नहीं।’
‘मित्रों! वह अंत्य विद्दसु (अविद्वान्) की है या विद्दसु (विद्वान्) की?’ सम्यक् उत्तर देते हुए, भिक्षुओं! अन्य तीर्थिक परिव्राजक इस प्रकार कहेंगे—‘मित्रों! वह अंत्य विद्वान् की है, अविद्वान् की नहीं।’
‘मित्रों! वह अंत्य अनुरुद्ध-पटिविरुद्ध (अनुकूल-प्रतिकूल) की है या अननुरुद्ध-अप्पटिविरुद्ध (अननुकूल-अप्रतिकूल) की?’ सम्यक् उत्तर देते हुए, भिक्षुओं! अन्य तीर्थिक परिव्राजक इस प्रकार कहेंगे—‘मित्रों! वह अंत्य अननुरुद्ध-अप्पटिविरुद्ध की है, अनुरुद्ध-पटिविरुद्ध की नहीं।’
‘मित्रों! वह अंत्य पपञ्चाराम (विस्तारप्रिय), पपञ्चरति (विस्ताररति) की है या निप्पपञ्चाराम (निवृत्तिप्रिय), निप्पपञ्चरति (निवृत्तिरति) की?’ सम्यक् उत्तर देते हुए, भिक्षुओं! अन्य तीर्थिक परिव्राजक इस प्रकार कहेंगे—‘मित्रों! वह अंत्य निप्पपञ्चाराम, निप्पपञ्चरति की है, पपञ्चाराम, पपञ्चरति की नहीं।’”
4. “भिक्षुओं! दो दृष्टियाँ हैं—भवदृष्टि और विभवदृष्टि। भिक्षुओं! जो कोई भी संन्यासी या ब्राह्मण भवदृष्टि से लिप्त, भवदृष्टि में प्रवेशित, भवदृष्टि में आसक्त हैं, वे विभवदृष्टि के प्रतिविरुद्ध हैं। भिक्षुओं! जो कोई भी संन्यासी या ब्राह्मण विभवदृष्टि से लिप्त, विभवदृष्टि में प्रवेशित, विभवदृष्टि में आसक्त हैं, वे भवदृष्टि के प्रतिविरुद्ध हैं। भिक्षुओं! जो कोई भी संन्यासी या ब्राह्मण इन दोनों दृष्टियों का समुदय, अन्त, अस्साद, अधीनव, निस्सरण यथार्थ रूप से नहीं जानते, ‘वे रागयुक्त हैं, वे द्वेषयुक्त हैं, वे मोहयुक्त हैं, वे तृष्णायुक्त हैं, वे उपादानयुक्त हैं, वे अविद्वान् हैं, वे अनुरुद्ध-पटिविरुद्ध हैं, वे पपञ्चाराम, पपञ्चरति हैं; वे जन्म, जरा, मरण, शोक, परिदेव, दुःख, दोमनस, उपायास से मुक्त नहीं होते; वे दुःख से मुक्त नहीं होते’ ऐसा मैं कहता हूँ। भिक्षुओं! जो कोई भी संन्यासी या ब्राह्मण इन दोनों दृष्टियों का समुदय, अन्त, अस्साद, अधीनव, निस्सरण यथार्थ रूप से जानते हैं, ‘वे विरक्त हैं, वे निर्वेष हैं, वे विमोह हैं, वे तृष्णारहित हैं, वे अनुपादान हैं, वे विद्वान् हैं, वे अननुरुद्ध-अप्पटिविरुद्ध हैं, वे निप्पपञ्चाराम, निप्पपञ्चरति हैं; वे जन्म, जरा, मरण, शोक, परिदेव, दुःख, दोमनस, उपायास से मुक्त होते हैं; वे दुःख से मुक्त होते हैं’ ऐसा मैं कहता हूँ।”
5. “भिक्षुओं! चार उपादान हैं। कौन से चार? कामुपादान, दृष्टुपादान, शीलव्रतुपादान, आत्मवादुपादान। भिक्षुओं! कुछ संन्यासी-ब्राह्मण सब उपादानों की परिज्ञान के दावेदार होते हैं। वे सम्यक् सब उपादानों की परिज्ञान नहीं बताते—कामुपादान की परिज्ञान बताते हैं, दृष्टुपादान की परिज्ञान नहीं बताते, शीलव्रतुपादान की परिज्ञान नहीं बताते, आत्मवादुपादान की परिज्ञान नहीं बताते। क्यों? क्योंकि ये भोन्ते संन्यासी-ब्राह्मण तीन स्थानों को यथार्थ रूप से नहीं जानते। इसलिए ये भोन्ते संन्यासी-ब्राह्मण सब उपादानों की परिज्ञान के दावेदार होते हैं; वे सम्यक् सब उपादानों की परिज्ञान नहीं बताते—कामुपादान की परिज्ञान बताते हैं, दृष्टुपादान की परिज्ञान नहीं बताते, शीलव्रतुपादान की परिज्ञान नहीं बताते, आत्मवादुपादान की परिज्ञान नहीं बताते।
भिक्षुओं! कुछ संन्यासी-ब्राह्मण सब उपादानों की परिज्ञान के दावेदार होते हैं। वे सम्यक् सब उपादानों की परिज्ञान नहीं बताते—कामुपादान की परिज्ञान बताते हैं, दृष्टुपादान की परिज्ञान बताते हैं, शीलव्रतुपादान की परिज्ञान नहीं बताते, आत्मवादुपादान की परिज्ञान नहीं बताते। क्यों? क्योंकि ये भोन्ते संन्यासी-ब्राह्मण दो स्थानों को यथार्थ रूप से नहीं जानते। इसलिए ये भोन्ते संन्यासी-ब्राह्मण सब उपादानों की परिज्ञान के दावेदार होते हैं; वे सम्यक् सब उपादानों की परिज्ञान नहीं बताते—कामुपादान की परिज्ञान बताते हैं, दृष्टुपादान की परिज्ञान बताते हैं, शीलव्रतुपादान की परिज्ञान नहीं बताते, आत्मवादुपादान की परिज्ञान नहीं बताते।
भिक्षुओं! कुछ संन्यासी-ब्राह्मण सब उपादानों की परिज्ञान के दावेदार होते हैं। वे सम्यक् सब उपादानों की परिज्ञान नहीं बताते—कामुपादान की परिज्ञान बताते हैं, दृष्टुपादान की परिज्ञान बताते हैं, शीलव्रतुपादान की परिज्ञान बताते हैं, आत्मवादुपादान की परिज्ञान नहीं बताते। क्यों? क्योंकि ये भोन्ते संन्यासी-ब्राह्मण एक स्थान को यथार्थ रूप से नहीं जानते। इसलिए ये भोन्ते संन्यासी-ब्राह्मण सब उपादानों की परिज्ञान के दावेदार होते हैं; वे सम्यक् सब उपादानों की परिज्ञान नहीं बताते—कामुपादान की परिज्ञान बताते हैं, दृष्टुपादान की परिज्ञान बताते हैं, शीलव्रतुपादान की परिज्ञान बताते हैं, आत्मवादुपादान की परिज्ञान नहीं बताते।
भिक्षुओं! इस प्रकार के धम्म-विनय में जो गुरु में प्रसन्नता है वह सम्यक् प्राप्त नहीं कही जाती; जो धम्म में प्रसन्नता है वह सम्यक् प्राप्त नहीं कही जाती; जो शीलों में पूर्णता है वह सम्यक् प्राप्त नहीं कही जाती; जो सहधर्मिकों में प्रिय-मनोहरता है वह सम्यक् प्राप्त नहीं कही जाती। क्यों? क्योंकि भिक्षुओं! ऐसा ही होता है जैसे दुर्गम धम्म-विनय में, दुर्वेदनीय में, अनिय्यानिक में, उपशम-संवत्तनिक न होने वाले में, सम्यक्-संबुद्ध द्वारा न वेदित में।
6. “भिक्षुओं! तथागत, अर्हत्, सम्यक्-संबुद्ध सब उपादानों की परिज्ञान के दावेदार होकर सम्यक् सब उपादानों की परिज्ञान बताते हैं—कामुपादान की परिज्ञान बताते हैं, दृष्टुपादान की परिज्ञान बताते हैं, शीलव्रतुपादान की परिज्ञान बताते हैं, आत्मवादुपादान की परिज्ञान बताते हैं। भिक्षुओं! इस प्रकार के धम्म-विनय में जो गुरु में प्रसन्नता है वह सम्यक् प्राप्त कही जाती है; जो धम्म में प्रसन्नता है वह सम्यक् प्राप्त कही जाती है; जो शीलों में पूर्णता है वह सम्यक् प्राप्त कही जाती है; जो सहधर्मिकों में प्रिय-मनोहरता है वह सम्यक् प्राप्त कही जाती है। क्यों? क्योंकि भिक्षुओं! ऐसा ही होता है जैसे सुसंकेट धम्म-विनय में, सुवेदनीय में, निय्यानिक में, उपशम-संवत्तनिक में, सम्यक्-संबुद्ध द्वारा वेदित में।
7. “भिक्षुओं! ये चार उपादान हैं। ये किसके कारण हैं, किसके समुदय हैं, किसके जात हैं, किससे उद्भूत हैं? ये चार उपादान तृष्णा-कारण हैं, तृष्णा-समुदय हैं, तृष्णा-जात हैं, तृष्णा से उद्भूत हैं। भिक्षुओं! यह तृष्णा किसके कारण है, किसके समुदय है, किसकी जात है, किससे उद्भूत है? तृष्णा वेदना-कारण है, वेदना-समुदय है, वेदना-जात है, वेदना से उद्भूत है। भिक्षुओं! यह वेदना किसके कारण है, किसके समुदय है, किसकी जात है, किससे उद्भूत है? वेदना स्पर्श-कारण है, स्पर्श-समुदय है, स्पर्श-जात है, स्पर्श से उद्भूत है। भिक्षुओं! यह स्पर्श किसके कारण है, किसके समुदय है, किसकी जात है, किससे उद्भूत है? स्पर्श षडायतन-कारण है, षडायतन-समुदय है, षडायतन-जात है, षडायतन से उद्भूत है। भिक्षुओं! यह षडायतन किसके कारण है, किसके समुदय है, किसकी जात है, किससे उद्भूत है? षडायतन नामरूप-कारण है, नामरूप-समुदय है, नामरूप-जात है, नामरूप से उद्भूत है। भिक्षुओं! यह नामरूप किसके कारण है, किसके समुदय है, किसकी जात है, किससे उद्भूत है? नामरूप विज्ञान-कारण है, विज्ञान-समुदय है, विज्ञान-जात है, विज्ञान से उद्भूत है। भिक्षुओं! यह विज्ञान किसके कारण है, किसके समुदय है, किसकी जात है, किससे उद्भूत है? विज्ञान संखार-कारण है, संखार-समुदय है, संखार-जात है, संखार से उद्भूत है। भिक्षुओं! ये संखार किसके कारण हैं, किसके समुदय हैं, किसकी जात हैं, किससे उद्भूत हैं? संखार अज्ञान-कारण हैं, अज्ञान-समुदय हैं, अज्ञान-जात हैं, अज्ञान से उद्भूत हैं।
भिक्षुओं! जब किसी भिक्षु का अज्ञान त्याग दिया जाता है और ज्ञान उत्पन्न हो जाता है, वह अज्ञान-विराग से, ज्ञान-उत्पाद से न तो कामुपादान को ग्रहण करता है, न दृष्टुपादान को ग्रहण करता है, न शीलव्रतुपादान को ग्रहण करता है, न आत्मवादुपादान को ग्रहण करता है। अग्रहण करने पर वह परितोष नहीं होता, अपरितोष में स्वयं ही परिनिर्वाण प्राप्त करता है। ‘निरोधित है जन्म, पूर्ण किया गया ब्रह्मचर्य, किया गया करना योग्य, इससे आगे इस जीवन का कुछ नहीं’ ऐसा जानता है।”
भगवान् ने इस प्रकार कहा। प्रसन्न होकर वे भिक्षु भगवान् की वाणी का अभिनंदन करते हुए।
चूळसिंहनाद सुत्त समाप्त, प्रथम।