2. “यहाँ, भिक्षुओं, अस्सुतवाँ पुथुज्जन—आर्यों का दर्शन न करने वाला, आर्यधम्म का अकोविद, आर्यधम्म में अविनीत, सज्जपुरुषों का दर्शन न करने वाला, सज्जपुरुषधम्म का अकोविद, सज्जपुरुषधम्म में अविनीत—पृथ्वी को पृथ्वी से संज्ञान करता है; पृथ्वी को पृथ्वी से संज्ञा करके पृथ्वी को मञ्ञति, पृथ्वी में मञ्ञति, पृथ्वी से मञ्ञति, ‘पृथ्वी मेरा है’ ऐसा मञ्ञति, पृथ्वी में अभिनन्दति। यह किस हेतु से? ‘उसके लिए अपरिज्ञात है’ ऐसा मैं कहता हूँ।
“जल को जल से संज्ञान करता है; जल को जल से संज्ञा करके जल को मञ्ञति, जल में मञ्ञति, जल से मञ्ञति, ‘जल मेरा है’ ऐसा मञ्ञति, जल में अभिनन्दति। यह किस हेतु से? ‘उसके लिए अपरिज्ञात है’ ऐसा मैं कहता हूँ।
“तेज को तेज से संज्ञान करता है; तेज को तेज से संज्ञा करके तेज को मञ्ञति, तेज में मञ्ञति, तेज से मञ्ञति, ‘तेज मेरा है’ ऐसा मञ्ञति, तेज में अभिनन्दति। यह किस हेतु से? ‘उसके लिए अपरिज्ञात है’ ऐसा मैं कहता हूँ।
“वायु को वायु से संज्ञान करता है; वायु को वायु से संज्ञा करके वायु को मञ्ञति, वायु में मञ्ञति, वायु से मञ्ञति, ‘वायु मेरा है’ ऐसा मञ्ञति, वायु में अभिनन्दति। यह किस हेतु से? ‘उसके लिए अपरिज्ञात है’ ऐसा मैं कहता हूँ।
3. “भूतों को भूतों से संज्ञान करता है; भूतों को भूतों से संज्ञा करके भूतों को मञ्ञति, भूतों में मञ्ञति, भूतों से मञ्ञति, ‘भूत मेरा है’ ऐसा मञ्ञति, भूतों में अभिनन्दति। यह किस हेतु से? ‘उसके लिए अपरिज्ञात है’ ऐसा मैं कहता हूँ।
“देवताओं को देवताओं से संज्ञान करता है; देवताओं को देवताओं से संज्ञा करके देवताओं को मञ्ञति, देवताओं में मञ्ञति, देवताओं से मञ्ञति, ‘देवता मेरा है’ ऐसा मञ्ञति, देवताओं में अभिनन्दति। यह किस हेतु से? ‘उसके लिए अपरिज्ञात है’ ऐसा मैं कहता हूँ।
“पजापति को पजापति से संज्ञान करता है; पजापति को पजापति से संज्ञा करके पजापति को मञ्ञति, पजापति में मञ्ञति, पजापति से मञ्ञति, ‘पजापति मेरा है’ ऐसा मञ्ञति, पजापति में अभिनन्दति। यह किस हेतु से? ‘उसके लिए अपरिज्ञात है’ ऐसा मैं कहता हूँ।
“ब्रह्म को ब्रह्म से संज्ञान करता है; ब्रह्म को ब्रह्म से संज्ञा करके ब्रह्म को मञ्ञति, ब्रह्म में मञ्ञति, ब्रह्म से मञ्ञति, ‘ब्रह्म मेरा है’ ऐसा मञ्ञति, ब्रह्म में अभिनन्दति। यह किस हेतु से? ‘उसके लिए अपरिज्ञात है’ ऐसा मैं कहता हूँ।
“आभस्सर को आभस्सर से संज्ञान करता है; आभस्सर को आभस्सर से संज्ञा करके आभस्सर को मञ्ञति, आभस्सरों में मञ्ञति, आभस्सर से मञ्ञति, ‘आभस्सर मेरा है’ ऐसा मञ्ञति, आभस्सर में अभिनन्दति। यह किस हेतु से? ‘उसके लिए अपरिज्ञात है’ ऐसा मैं कहता हूँ।
“सुभकिण्ह को सुभकिण्ह से संज्ञान करता है; सुभकिण्ह को सुभकिण्ह से संज्ञा करके सुभकिण्ह को मञ्ञति, सुभकिण्हों में मञ्ञति, सुभकिण्ह से मञ्ञति, ‘सुभकिण्ह मेरा है’ ऐसा मञ्ञति, सुभकिण्ह में अभिनन्दति। यह किस हेतु से? ‘उसके लिए अपरिज्ञात है’ ऐसा मैं कहता हूँ।
“वेहप्फल को वेहप्फल से संज्ञान करता है; वेहप्फल को वेहप्फल से संज्ञा करके वेहप्फल को मञ्ञति, वेहप्फलों में मञ्ञति, वेहप्फल से मञ्ञति, ‘वेहप्फल मेरा है’ ऐसा मञ्ञति, वेहप्फल में अभिनन्दति। यह किस हेतु से? ‘उसके लिए अपरिज्ञात है’ ऐसा मैं कहता हूँ।
“अभिभु को अभिभु से संज्ञान करता है; अभिभु को अभिभु से संज्ञा करके अभिभु को मञ्ञति, अभिभु में मञ्ञति, अभिभु से मञ्ञति, ‘अभिभु मेरा है’ ऐसा मञ्ञति, अभिभु में अभिनन्दति। यह किस हेतु से? ‘उसके लिए अपरिज्ञात है’ ऐसा मैं कहता हूँ।
4. “आकासानञ्चायतन को आकासानञ्चायतन से संज्ञान करता है; आकासानञ्चायतन को आकासानञ्चायतन से संज्ञा करके आकासानञ्चायतन को मञ्ञति, आकासानञ्चायतन में मञ्ञति, आकासानञ्चायतन से मञ्ञति, ‘आकासानञ्चायतन मेरा है’ ऐसा मञ्ञति, आकासानञ्चायतन में अभिनन्दति। यह किस हेतु से? ‘उसके लिए अपरिज्ञात है’ ऐसा मैं कहता हूँ।
“विञ्ञाणञ्चायतन को विञ्ञाणञ्चायतन से संज्ञान करता है; विञ्ञाणञ्चायतन को विञ्ञाणञ्चायतन से संज्ञा करके विञ्ञाणञ्चायतन को मञ्ञति, विञ्ञाणञ्चायतन में मञ्ञति, विञ्ञाणञ्चायतन से मञ्ञति, ‘विञ्ञाणञ्चायतन मेरा है’ ऐसा मञ्ञति, विञ्ञाणञ्चायतन में अभिनन्दति। यह किस हेतु से? ‘उसके लिए अपरिज्ञात है’ ऐसा मैं कहता हूँ।
“आकिञ्चञ्ञायतन को आकिञ्चञ्ञायतन से संज्ञान करता है; आकिञ्चञ्ञायतन को आकिञ्चञ्ञायतन से संज्ञा करके आकिञ्चञ्ञायतन को मञ्ञति, आकिञ्चञ्ञायतन में मञ्ञति, आकिञ्चञ्ञायतन से मञ्ञति, ‘आकिञ्चञ्ञायतन मेरा है’ ऐसा मञ्ञति, आकिञ्चञ्ञायतन में अभिनन्दति। यह किस हेतु से? ‘उसके लिए अपरिज्ञात है’ ऐसा मैं कहता हूँ।
“नेवसञ्ञानासञ्ञायतन को नेवसञ्ञानासञ्ञायतन से संज्ञान करता है; नेवसञ्ञानासञ्ञायतन को नेवसञ्ञानासञ्ञायतन से संज्ञा करके नेवसञ्ञानासञ्ञायतन को मञ्ञति, नेवसञ्ञानासञ्ञायतन में मञ्ञति, नेवसञ्ञानासञ्ञायतन से मञ्ञति, ‘नेवसञ्ञानासञ्ञायतन मेरा है’ ऐसा मञ्ञति, नेवसञ्ञानासञ्ञायतन में अभिनन्दति। यह किस हेतु से? ‘उसके लिए अपरिज्ञात है’ ऐसा मैं कहता हूँ।
5. “दृष्ट को दृष्ट से संज्ञान करता है; दृष्ट को दृष्ट से संज्ञा करके दृष्ट को मञ्ञति, दृष्ट में मञ्ञति, दृष्ट से मञ्ञति, ‘दृष्ट मेरा है’ ऐसा मञ्ञति, दृष्ट में अभिनन्दति। यह किस हेतु से? ‘उसके लिए अपरिज्ञात है’ ऐसा मैं कहता हूँ।
“श्रुत को श्रुत से संज्ञान करता है; श्रुत को श्रुत से संज्ञा करके श्रुत को मञ्ञति, श्रुत में मञ्ञति, श्रुत से मञ्ञति, ‘श्रुत मेरा है’ ऐसा मञ्ञति, श्रुत में अभिनन्दति। यह किस हेतु से? ‘उसके लिए अपरिज्ञात है’ ऐसा मैं कहता हूँ।
“मुत को मूत से संज्ञान करता है; मूत को मूत से संज्ञा करके मूत को मञ्ञति, मूत में मञ्ञति, मूत से मञ्ञति, ‘मूत मेरा है’ ऐसा मञ्ञति, मूत में अभिनन्दति। यह किस हेतु से? ‘उसके लिए अपरिज्ञात है’ ऐसा मैं कहता हूँ।
“विञ्ञात को विञ्ञात से संज्ञान करता है; विञ्ञात को विञ्ञात से संज्ञा करके विञ्ञात को मञ्ञति, विञ्ञात में मञ्ञति, विञ्ञात से मञ्ञति, ‘विञ्ञात मेरा है’ ऐसा मञ्ञति, विञ्ञात में अभिनन्दति। यह किस हेतु से? ‘उसके लिए अपरिज्ञात है’ ऐसा मैं कहता हूँ।
6. “एकत्त को एकत्त से संज्ञान करता है; एकत्त को एकत्त से संज्ञा करके एकत्त को मञ्ञति, एकत्त में मञ्ञति, एकत्त से मञ्ञति, ‘एकत्त मेरा है’ ऐसा मञ्ञति, एकत्त में अभिनन्दति। यह किस हेतु से? ‘उसके लिए अपरिज्ञात है’ ऐसा मैं कहता हूँ।
“नानत्त को नानत्त से संज्ञान करता है; नानत्त को नानत्त से संज्ञा करके नानत्त को मञ्ञति, नानत्त में मञ्ञति, नानत्त से मञ्ञति, ‘नानत्त मेरा है’ ऐसा मञ्ञति, नानत्त में अभिनन्दति। यह किस हेतु से? ‘उसके लिए अपरिज्ञात है’ ऐसा मैं कहता हूँ।
“सब्ब को सब्ब से संज्ञान करता है; सब्ब को सब्ब से संज्ञा करके सब्ब को मञ्ञति, सब्ब में मञ्ञति, सब्ब से मञ्ञति, ‘सब्ब मेरा है’ ऐसा मञ्ञति, सब्ब में अभिनन्दति। यह किस हेतु से? ‘उसके लिए अपरिज्ञात है’ ऐसा मैं कहता हूँ।
“निर्वाण को निर्वाण से संज्ञान करता है; निर्वाण को निर्वाण से संज्ञा करके निर्वाण को मञ्ञति, निर्वाण में मञ्ञति, निर्वाण से मञ्ञति, ‘निर्वाण मेरा है’ ऐसा मञ्ञति, निर्वाण में अभिनन्दति। यह किस हेतु से? ‘उसके लिए अपरिज्ञात है’ ऐसा मैं कहता हूँ।
7. “भिक्षुओं, वह भिक्षु जो सेक्ख है, अप्पत्तमानस है, अनुत्तर योगक्षेम की अभिलाषा रखते हुए निवास करता है, वह भी पृथ्वी को पृथ्वी से अभिज्ञान करता है; पृथ्वी को पृथ्वी से अभिज्ञा करके ‘पृथ्वी को मञ्ञना न कर, पृथ्वी में मञ्ञना न कर, पृथ्वी से मञ्ञना न कर, ‘पृथ्वी मेरा है’ ऐसा मञ्ञना न कर, पृथ्वी में अभिनन्दना न कर’। यह किस हेतु से? ‘उसके लिए परिज्ञेय्य है’ ऐसा मैं कहता हूँ।
“जल... आदि... तेज... वायु... भूत... देव... पजापति... ब्रह्म... आभस्सर... सुभकिण्ह... वेहप्फल... अभिभु... आकासानञ्चायतन... विञ्ञाणञ्चायतन... आकिञ्चञ्ञायतन... नेवसञ्ञानासञ्ञायतन... दृष्ट... श्रुत... मूत... विञ्ञात... एकत्त... नानत्त... सब्ब... निर्वाण को निर्वाण से अभिज्ञान करता है; निर्वाण को निर्वाण से अभिज्ञा करके ‘निर्वाण को मञ्ञना न कर, निर्वाण में मञ्ञना न कर, निर्वाण से मञ्ञना न कर, ‘निर्वाण मेरा है’ ऐसा मञ्ञना न कर, निर्वाण में अभिनन्दना न कर’। यह किस हेतु से? ‘उसके लिए परिज्ञेय्य है’ ऐसा मैं कहता हूँ।
8. “भिक्षुओं, वह भिक्षु जो अरहन्त है, खीणासव है, वुसितवा है, कतकरणीय है, ओहितभार है, अनुप्पत्तसदत्थ है, परिक्खीणभवसंयोजन है, सम्मादञ्ञा विमुक्त है, वह भी पृथ्वी को पृथ्वी से अभिज्ञान करता है; पृथ्वी को पृथ्वी से अभिज्ञा करके पृथ्वी को न मञ्ञति, पृथ्वी में न मञ्ञति, पृथ्वी से न मञ्ञति, ‘पृथ्वी मेरा है’ ऐसा न मञ्ञति, पृथ्वी में न अभिनन्दति। यह किस हेतु से? ‘उसके लिए परिज्ञात है’ ऐसा मैं कहता हूँ।
“जल... आदि... तेज... वायु... भूत... देव... पजापति... ब्रह्म... आभस्सर... सुभकिण्ह... वेहप्फल... अभिभु... आकासानञ्चायतन... विञ्ञाणञ्चायतन... आकिञ्चञ्ञायतन... नेवसञ्ञानासञ्ञायतन... दृष्ट... श्रुत... मूत... विञ्ञात... एकत्त... नानत्त... सब्ब... निर्वाण को निर्वाण से अभिज्ञान करता है; निर्वाण को निर्वाण से अभिज्ञा करके निर्वाण को न मञ्ञति, निर्वाण में न मञ्ञति, निर्वाण से न मञ्ञति, ‘निर्वाण मेरा है’ ऐसा न मञ्ञति, निर्वाण में न अभिनन्दति। यह किस हेतु से? ‘उसके लिए परिज्ञात है’ ऐसा मैं कहता हूँ।
9. “भिक्षुओं, वह भिक्षु जो अरहन्त है, खीणासव है, वुसितवा है, कतकरणीय है, ओहितभार है, अनुप्पत्तसदत्थ है, परिक्खीणभवसंयोजन है, सम्मादञ्ञा विमुक्त है, वह भी पृथ्वी को पृथ्वी से अभिज्ञान करता है; पृथ्वी को पृथ्वी से अभिज्ञा करके पृथ्वी को न मञ्ञति, पृथ्वी में न मञ्ञति, पृथ्वी से न मञ्ञति, ‘पृथ्वी मेरा है’ ऐसा न मञ्ञति, पृथ्वी में न अभिनन्दति। यह किस हेतु से? राग के खय से, वीतरागता से।
“जल... आदि... तेज... वायु... भूत... देव... पजापति... ब्रह्म... आभस्सर... सुभकिण्ह... वेहप्फल... अभिभु... आकासानञ्चायतन... विञ्ञाणञ्चायतन... आकिञ्चञ्ञायतन... नेवसञ्ञानासञ्ञायतन... दृष्ट... श्रुत... मूत... विञ्ञात... एकत्त... नानत्त... सब्ब... निर्वाण को निर्वाण से अभिज्ञान करता है; निर्वाण को निर्वाण से अभिज्ञा करके निर्वाण को न मञ्ञति, निर्वाण में न मञ्ञति, निर्वाण से न मञ्ञति, ‘निर्वाण मेरा है’ ऐसा न मञ्ञति, निर्वाण में न अभिनन्दति। यह किस हेतु से? राग के खय से, वीतरागता से।
10. “भिक्षुओं, वह भिक्षु जो अरहन्त है, खीणासव है, वुसितवा है, कतकरणीय है, ओहितभार है, अनुप्पत्तसदत्थ है, परिक्खीणभवसंयोजन है, सम्मादञ्ञा विमुक्त है, वह भी पृथ्वी को पृथ्वी से अभिज्ञान करता है; पृथ्वी को पृथ्वी से अभिज्ञा करके पृथ्वी को न मञ्ञति, पृथ्वी में न मञ्ञति, पृथ्वी से न मञ्ञति, ‘पृथ्वी मेरा है’ ऐसा न मञ्ञति, पृथ्वी में न अभिनन्दति। यह किस हेतु से? दोष के खय से, वीतदोषता से।
“जल... आदि... तेज... वायु... भूत... देव... पजापति... ब्रह्म... आभस्सर... सुभकिण्ह... वेहप्फल... अभिभु... आकासानञ्चायतन... विञ्ञाणञ्चायतन... आकिञ्चञ्ञायतन... नेवसञ्ञानासञ्ञायतन... दृष्ट... श्रुत... मूत... विञ्ञात... एकत्त... नानत्त... सब्ब... निर्वाण को निर्वाण से अभिज्ञान करता है; निर्वाण को निर्वाण से अभिज्ञा करके निर्वाण को न मञ्ञति, निर्वाण में न मञ्ञति, निर्वाण से न मञ्ञति, ‘निर्वाण मेरा है’ ऐसा न मञ्ञति, निर्वाण में न अभिनन्दति। यह किस हेतु से? दोष के खय से, वीतदोषता से।
11. “भिक्षुओं, वह भिक्षु जो अरहन्त है, खीणासव है, वुसितवा है, कतकरणीय है, ओहितभार है, अनुप्पत्तसदत्थ है, परिक्खीणभवसंयोजन है, सम्मादञ्ञा विमुक्त है, वह भी पृथ्वी को पृथ्वी से अभिज्ञान करता है; पृथ्वी को पृथ्वी से अभिज्ञा करके पृथ्वी को न मञ्ञति, पृथ्वी में न मञ्ञति, पृथ्वी से न मञ्ञति, ‘पृथ्वी मेरा है’ ऐसा न मञ्ञति, पृथ्वी में न अभिनन्दति। यह किस हेतु से? मोह के खय से, वीतमोहता से।
“जल... आदि... तेज... वायु... भूत... देव... पजापति... ब्रह्म... आभस्सर... सुभकिण्ह... वेहप्फल... अभिभु... आकासानञ्चायतन... विञ्ञाणञ्चायतन... आकिञ्चञ्ञायतन... नेवसञ्ञानासञ्ञायतन... दृष्ट... श्रुत... मूत... विञ्ञात... एकत्त... नानत्त... सब्ब... निर्वाण को निर्वाण से अभिज्ञान करता है; निर्वाण को निर्वाण से अभिज्ञा करके निर्वाण को न मञ्ञति, निर्वाण में न मञ्ञति, निर्वाण से न मञ्ञति, ‘निर्वाण मेरा है’ ऐसा न मञ्ञति, निर्वाण में न अभिनन्दति। यह किस हेतु से? मोह के खय से, वीतमोहता से।
12. “भिक्षुओं, तथागत भी, अरहन्त, सम्मासम्बुद्ध, पृथ्वी को पृथ्वी से अभिज्ञान करता है; पृथ्वी को पृथ्वी से अभिज्ञा करके पृथ्वी को न मञ्ञति, पृथ्वी में न मञ्ञति, पृथ्वी से न मञ्ञति, ‘पृथ्वी मेरा है’ ऐसा न मञ्ञति, पृथ्वी में न अभिनन्दति। यह किस हेतु से? ‘उसके लिए परिज्ञात है तथागत का’ ऐसा मैं कहता हूँ।
“जल... आदि... तेज... वायु... भूत... देव... पजापति... ब्रह्म... आभस्सर... सुभकिण्ह... वेहप्फल... अभिभु... आकासानञ्चायतन... विञ्ञाणञ्चायतन... आकिञ्चञ्ञायतन... नेवसञ्ञानासञ्ञायतन... दृष्ट... श्रुत... मूत... विञ्ञात... एकत्त... नानत्त... सब्ब... निर्वाण को निर्वाण से अभिज्ञान करता है; निर्वाण को निर्वाण से अभिज्ञा करके निर्वाण को न मञ्ञति, निर्वाण में न मञ्ञति, निर्वाण से न मञ्ञति, ‘निर्वाण मेरा है’ ऐसा न मञ्ञति, निर्वाण में न अभिनन्दति। यह किस हेतु से? ‘उसके लिए परिज्ञात है तथागत का’ ऐसा मैं कहता हूँ।
13. “भिक्षुओं, तथागत भी, अरहन्त, सम्मासम्बुद्ध, पृथ्वी को पृथ्वी से अभिज्ञान करता है; पृथ्वी को पृथ्वी से अभिज्ञा करके पृथ्वी को न मञ्ञति, पृथ्वी में न मञ्ञति, पृथ्वी से न मञ्ञति, ‘पृथ्वी मेरा है’ ऐसा न मञ्ञति, पृथ्वी में न अभिनन्दति। यह किस हेतु से? ‘नन्दी दुक्खस्स मूलं’ ऐसा—इति विदित्वा ‘भव जाति भूतस्स जरामरणं’। इसलिए, भिक्षुओं, ‘तथागत सब्बसो तण्हानं खय विराग निरोध चाग पटिनिस्सग्ग अनुत्तर सम्मासम्बोधिं अभिसम्बुद्ध’ ऐसा मैं कहता हूँ।
“जल... आदि... तेज... वायु... भूत... देव... पजापति... ब्रह्म... आभस्सर... सुभकिण्ह... वेहप्फल... अभिभु... आकासानञ्चायतन... विञ्ञाणञ्चायतन... आकिञ्चञ्ञायतन... नेवसञ्ञानासञ्ञायतन... दृष्ट... श्रुत... मूत... विञ्ञात... एकत्त... नानत्त... सब्ब... निर्वाण को निर्वाण से अभिज्ञान करता है; निर्वाण को निर्वाण से अभिज्ञा करके निर्वाण को न मञ्ञति, निर्वाण में न मञ्ञति, निर्वाण से न मञ्ञति, ‘निर्वाण मेरा है’ ऐसा न मञ्ञति, निर्वाण में न अभिनन्दति। यह किस हेतु से? ‘नन्दी दुक्खस्स मूलं’ ऐसा—इति विदित्वा ‘भव जाति भूतस्स जरामरणं’। इसलिए, भिक्षुओं, ‘तथागत सब्बसो तण्हानं खय विराग निरोध चाग पटिनिस्सग्ग अनुत्तर सम्मासम्बोधिं अभिसम्बुद्ध’ ऐसा मैं कहता हूँ।”
यह भगवान ने कहा। वे भिक्षु भगवान के कथन का अभिनन्दन न करके चुप बैठे।
मूलपरियायसुत्तं समाप्त प्रथमं।
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