1. इस प्रकार मैंने सुना—एक समय भगवान् सावत्थि नगर में जेतवन उद्यान के अनाथपिण्डिक के आश्रम में ठहर रहे थे। उस समय सम्मानित मोळियपग्गुन भिक्षु भिक्षुणियों के साथ अतिवेला संसक्त होकर रहते थे। वह सम्मानित मोळियपग्गुन भिक्षुणियों के साथ इस प्रकार संसक्त होकर रहते थे—यदि कोई भिक्षु सम्मानित मोळियपग्गुन के सामने उन भिक्षुणियों की निंदा बोलता, तो सम्मानित मोळियपग्गुन क्रोधित होकर, अनत्तमना अधिकरण भी करता। यदि कोई भिक्षु उन भिक्षुणियों के सामने सम्मानित मोळियपग्गुन की निंदा बोलता, तो वे भिक्षुणियाँ क्रोधित होकर, अनत्तमना अधिकरण भी करतीं। वह सम्मानित मोळियपग्गुन भिक्षुणियों के साथ इस प्रकार संसक्त होकर रहता। तब कोई भिक्षु भगवान् के पास गया; जाकर भगवान् को प्रणाम किया और एक ओर बैठ गया। एक ओर बैठा हुआ वह भिक्षु भगवान् से बोला—“भन्ते! सम्मानित मोळियपग्गुन भिक्षु भिक्षुणियों के साथ अतिवेला संसक्त होकर रहते हैं। भन्ते! वह सम्मानित मोळियपग्गुन भिक्षुणियों के साथ इस प्रकार संसक्त होकर रहते हैं—यदि कोई भिक्षु सम्मानित मोळियपग्गुन के सामने उन भिक्षुणियों की निंदा बोलता, तो सम्मानित मोळियपग्गुन क्रोधित होकर, अनत्तमना अधिकरण भी करता। यदि कोई भिक्षु उन भिक्षुणियों के सामने सम्मानित मोळियपग्गुन की निंदा बोलता, तो वे भिक्षुणियाँ क्रोधित होकर, अनत्तमना अधिकरण भी करतीं। भन्ते! वह सम्मानित मोळियपग्गुन भिक्षुणियों के साथ इस प्रकार संसक्त होकर रहता है।”
2. तब भगवान् किसी भिक्षु को बुलाया—“भिक्षु! जाओ, मेरे वचन से मोळियपग्गुन भिक्षु को बुलाओ—‘मित्र फग्गुन! गुरु तुम्हें बुलाते हैं।’” “ऐसा है, भन्ते!” वह भिक्षु भगवान् के सम्मति से सम्मानित मोळियपग्गुन के पास गया; जाकर सम्मानित मोळियपग्गुन से बोला—“मित्र फग्गुन! गुरु तुम्हें बुलाते हैं।” “ऐसा है, मित्र!” सम्मानित मोळियपग्गुन ने उस भिक्षु के सम्मति से भगवान् के पास जाकर प्रणाम किया और एक ओर बैठ गया। एक ओर बैठे हुए सम्मानित मोळियपग्गुन से भगवान् ने कहा—
“फग्गुन! क्या सच है कि तुम भिक्षुणियों के साथ अतिवेला संसक्त होकर रहते हो? फग्गुन! तुम भिक्षुणियों के साथ इस प्रकार संसक्त होकर रहते हो—यदि कोई भिक्षु तुम्हारे सामने उन भिक्षुणियों की निंदा बोलता, तो तुम क्रोधित होकर, अनत्तमना अधिकरण भी करते। यदि कोई भिक्षु उन भिक्षुणियों के सामने तुम्हारी निंदा बोलता, तो वे भिक्षुणियाँ क्रोधित होकर, अनत्तमना अधिकरण भी करतीं। फग्गुन! तुम भिक्षुणियों के साथ इस प्रकार संसक्त होकर रहते हो?” “ऐसा है, भन्ते!” “फग्गुन! क्या तुम कुलपुत्र हो, श्रद्धा से गृहत्याग करके अनगार हुए?” “ऐसा ही, भन्ते!”
3. “फग्गुन! कुलपुत्र के लिए, श्रद्धा से गृहत्याग करके अनगार हुए के लिए यह उचित नहीं कि तुम भिक्षुणियों के साथ अतिवेला संसक्त होकर रहो। इसलिए, फग्गुन! यदि कोई तुम्हारे सामने उन भिक्षुणियों की निंदा भी बोलता है, तो भी फग्गुन! तुम्हें वे गृहस्थी छन्द, वे गृहस्थी वितर्क त्याग देने चाहिए। फग्गुन! फिर भी तुम्हें इस प्रकार शील रखना चाहिए—‘मेरा चित्त न तो परिवर्तित होगा, न पापपूर्ण वाणी उच्चारित करूँगा, हित-अनुकम्पी होकर मैत्री-चित्त रहूँगा, न द्वेषी।’ फग्गुन! तुम्हें इस प्रकार शील रखना चाहिए।
फिर भी, फग्गुन! यदि कोई तुम्हारे सामने उन भिक्षुणियों को हाथ से प्रहार भी दे, लाठी से प्रहार भी दे, दंड से प्रहार भी दे, शस्त्र से प्रहार भी दे। फिर भी फग्गुन! तुम्हें वे गृहस्थी छन्द, वे गृहस्थी वितर्क त्याग देने चाहिए। फिर भी फग्गुन! तुम्हें इस प्रकार शील रखना चाहिए—‘मेरा चित्त न तो परिवर्तित होगा, न पापपूर्ण वाणी उच्चारित करूँगा, हित-अनुकम्पी होकर मैत्री-चित्त रहूँगा, न द्वेषी।’ फग्गुन! तुम्हें इस प्रकार शील रखना चाहिए।
फिर भी, फग्गुन! यदि कोई तुम्हारे सामने निंदा भी बोलता है, फिर भी फग्गुन! तुम्हें वे गृहस्थी छन्द, वे गृहस्थी वितर्क त्याग देने चाहिए। फिर भी फग्गुन! तुम्हें इस प्रकार शील रखना चाहिए—‘मेरा चित्त न तो परिवर्तित होगा, न पापपूर्ण वाणी उच्चारित करूँगा, हित-अनुकम्पी होकर मैत्री-चित्त रहूँगा, न द्वेषी।’ फग्गुन! तुम्हें इस प्रकार शील रखना चाहिए।
फिर भी, फग्गुन! यदि कोई तुम्हारे सामने हाथ से प्रहार भी दे, लाठी से प्रहार भी दे, दंड से प्रहार भी दे, शस्त्र से प्रहार भी दे, फिर भी फग्गुन! तुम्हें वे गृहस्थी छन्द, वे गृहस्थी वितर्क त्याग देने चाहिए। फिर भी फग्गुन! तुम्हें इस प्रकार शील रखना चाहिए—‘मेरा चित्त न तो परिवर्तित होगा, न पापपूर्ण वाणी उच्चारित करूँगा, हित-अनुकम्पी होकर मैत्री-चित्त रहूँगा, न द्वेषी।’ फग्गुन! तुम्हें इस प्रकार शील रखना चाहिए।”
4. तब भगवान् भिक्षुओं को बुलाया—“भिक्षुओं! आज मेरे भिक्षु एक समय में ही चित्त कर लेते। भिक्षुओं! मैंने भिक्षुओं को बुलाया—भिक्षुओं! मैं एकासन-भोजन करता हूँ। भिक्षुओं! एकासन-भोजन करके मैं अप्पाबाधता का अनुभव करता, अप्पातंका का अनुभव करता, लहुत्त का अनुभव करता, बल का अनुभव करता, फासु-विहार का अनुभव करता। भिक्षुओं! तुम भी एकासन-भोजन करो। भिक्षुओं! तुम भी एकासन-भोजन करके अप्पाबाधता का अनुभव करोगे, अप्पातंका का अनुभव करोगे, लहुत्त का अनुभव करोगे, बल का अनुभव करोगे, फासु-विहार का अनुभव करोगे। भिक्षुओं! उन भिक्षुओं में मेरे लिए अनुसासन करने योग्य न था; भिक्षुओं! उन भिक्षुओं में मेरे लिए सतुप्पाद करने योग्य ही था।
भिक्षुओं! जैसे समतल भूमि पर चतुर्महापथ में आज्ञरथ जुता खड़ा हो, ओढ़स्तप-उद्ध। उसे कुशल योग्य-चर्य कारक, अस्सदम्म-सरथी चढ़कर, वाम हाथ से लेंहें पकड़कर, दक्षिण हाथ से पतोड़ पकड़कर जिधर इच्छा उसी दिशा में चलाए या पलटाए। भिक्षुओं! इसी प्रकार मेरे लिए उन भिक्षुओं में अनुसासन करने योग्य न था, उन भिक्षुओं में मेरे लिए सतुप्पाद करने योग्य ही था। इसलिए, भिक्षुओं! तुम भी अकुशल को त्याग दो, कुशल धम्मों में प्रयास करो। भिक्षुओं! इस प्रकार तुम भी इस धम्म-विनय में वृद्धि, विस्तार, वेपुल्ल प्राप्त करोगे।
भिक्षुओं! जैसे गाँव या निगम के निकट महान् साल-वन। और वह एलंड से आच्छादित। भिक्षुओं! वहाँ कोई पुरुष उत्पन्न हो अर्थकाम, हितकाम, योग-क्षेमकाम। वह जो साल-लता कुटिल, ओज-हरण करने वाली वे छेदकर बाहर निकाले, अंतरवन को सुविसोधित करे। जो साल-लता उज्ज्वल, सुजात हैं वे सम्यक् संरक्षित करे। भिक्षुओं! इस प्रकार वह साल-वन दूसरे समय वृद्धि, विस्तार, वेपुल्ल प्राप्त करेगा। भिक्षुओं! इसी प्रकार तुम भी अकुशल को त्याग दो, कुशल धम्मों में प्रयास करो। भिक्षुओं! इस प्रकार तुम भी इस धम्म-विनय में वृद्धि, विस्तार, वेपुल्ल प्राप्त करोगे।
5. “भिक्षुओं! पूर्व में इसी सावत्थि में वेदेहिका नाम गृहपति-पत्नी थी। भिक्षुओं! वेदेहिका गृहपति-पत्नी का कल्याण कित्तिसद्द प्रचारित हुआ—‘सोरता वेदेहिका गृहपति-पत्नी, निवाता वेदेहिका गृहपति-पत्नी, उपशान्ता वेदेहिका गृहपति-पत्नी।’ भिक्षुओं! वेदेहिका गृहपति-पत्नी की काळी नाम दासी थी—दक्ष, अलस, सुसंविहित-कर्म।
भिक्षुओं! तब काळी दासी को यह विचार हुआ—‘मेरी स्वामिनी का कल्याण कित्तिसद्द प्रचारित हुआ—“सोरता वेदेहिका गृहपति-पत्नी, निवाता वेदेहिका गृहपति-पत्नी, उपशान्ता वेदेहिका गृहपति-पत्नी।” क्या मेरी स्वामिनी संत कोप को प्रकट नहीं करती या असंत कोप या मेरे ही ये कर्म सुसंविहित हैं जिससे मेरी स्वामिनी संत कोप को प्रकट नहीं करती, न असंत कोप को? क्यों न मैं स्वामिनी की परीक्षा करूँ।’ भिक्षुओं! तब काळी दासी दिवा उठी। तब भिक्षुओं! वेदेहिका गृहपति-पत्नी ने काळी दासी से कहा—“हे काळी!” “क्या, स्वामिनी?” “क्यों, काळी, दिवा उठी?” “नहीं, स्वामिनी, कुछ नहीं।” “नहीं कुछ नहीं, पापी दासी, दिवा उठी” ऐसा क्रोधित होकर, अनत्तमना भाकुटि की। भिक्षुओं! तब काळी दासी को यह विचार हुआ—‘स्वामिनी संत कोप को ही प्रकट नहीं करती, न असंत कोप को; मेरे ही ये कर्म सुसंविहित हैं, जिससे स्वामिनी संत कोप को प्रकट नहीं करती, न असंत कोप को। क्यों न मैं और अधिक परीक्षा करूँ।’
भिक्षुओं! तब काळी दासी दिवा से भी पहले उठी। भिक्षुओं! तब वेदेहिका गृहपति-पत्नी ने काळी दासी से कहा—“हे काळी!” “क्या, स्वामिनी?” “क्यों, काळी, दिवा से पहले उठी?” “नहीं, स्वामिनी, कुछ नहीं।” “नहीं कुछ नहीं, पापी दासी, दिवा से पहले उठी” ऐसा क्रोधित होकर, अनत्तमना अनत्तमना-वाचं उच्चारित की। भिक्षुओं! तब काळी दासी को यह विचार हुआ—‘स्वामिनी संत कोप को ही प्रकट नहीं करती, न असंत कोप को। मेरे ही ये कर्म सुसंविहित हैं, जिससे स्वामिनी संत कोप को प्रकट नहीं करती, न असंत कोप को। क्यों न मैं और अधिक परीक्षा करूँ।’
भिक्षुओं! तब काळी दासी दिवा से भी पहले उठी। भिक्षुओं! तब वेदेहिका गृहपति-पत्नी ने काळी दासी से कहा—“हे काळी!” “क्या, स्वामिनी?” “क्यों, काळी, दिवा उठी?” “नहीं, स्वामिनी, कुछ नहीं।” “नहीं कुछ नहीं, पापी दासी, दिवा उठी” ऐसा क्रोधित होकर, अनत्तमना अग्गळ-सूची ग्रहण करके सिर पर प्रहार दिया, सिर भेद दिया। भिक्षुओं! तब काळी दासी भेदे सिर से लोहित बहते हुए पटिविस्सकानं उज्झापा—‘देखो स्वामिनी! सोरता का कर्म; देखो स्वामिनी! निवाता का कर्म, देखो स्वामिनी! उपशान्ता का कर्म! कैसे एक दासी के दिवा उठने पर क्रोधित होकर, अनत्तमना अग्गळ-सूची ग्रहण करके सिर पर प्रहार दिया, सिर भेद दिया।’
भिक्षुओं! तब वेदेहिका गृहपति-पत्नी का दूसरे समय पापक कित्तिसद्द प्रचारित हुआ—‘चंडी वेदेहिका गृहपति-पत्नी, अनिवाता वेदेहिका गृहपति-पत्नी, अनुपशान्ता वेदेहिका गृहपति-पत्नी।’
भिक्षुओं! इसी प्रकार यहाँ भी कोई भिक्षु पहले ही सोरता-सोरता होता, निवाता-निवाता होता, उपशान्ता-उपशान्ता होता जब तक अमनाप वचन-पथ न छूए। फिर जब भिक्षु को अमनाप वचन-पथ छूता है, तब भिक्षु को ‘सोरता’ जाना चाहिए, ‘निवाता’ जाना चाहिए, ‘उपशान्ता’ जाना चाहिए। भिक्षुओं! मैं उस भिक्षु को ‘सुवच’ नहीं कहता जो वस्त्र, भिक्षा-भोजन, निवास-स्थान, गिलान-पच्चय-भेसज्ज-परिक्खार-कारण से सुवच होता, सोवच-भाव प्राप्त करता। क्यों? क्योंकि भिक्षुओं! वह भिक्षु वस्त्र आदि न प्राप्त होने पर न सुवच होता, न सोवच-भाव प्राप्त करता। भिक्षुओं! जो भिक्षु धम्म को ही सम्मान करता, धम्म को गुरु मानता, धम्म को सम्मान करता, धम्म को पूजता, धम्म को अपचारित करता सुवच होता, सोवच-भाव प्राप्त करता, उसे ही मैं ‘सुवच’ कहता हूँ। इसलिए, भिक्षुओं! ‘धम्म को ही सम्मान करेंगे, धम्म को गुरु मानेंगे, धम्म को सम्मान करेंगे, धम्म को पूजेंगे, धम्म को अपचारित करेंगे सुवच होंगे, सोवच-भाव प्राप्त करेंगे।’ भिक्षुओं! तुम्हें इस प्रकार शील रखना चाहिए।
6. “भिक्षुओं! पाँच प्रकार के वचन-पथ हैं जिनमें तुम्हें दूसरे बोलते हुए बोलें—काल में या अकाल में; भूत में या अभूत में; सौम्य में या कठोर में; अर्थ-संबद्ध में या अनर्थ-संबद्ध में; मैत्री-चित्त वाले में या द्वेषी में। भिक्षुओं! काल में या अकाल में दूसरे बोलते हुए बोलें; भूत में या अभूत में दूसरे बोलते हुए बोलें; सौम्य में या कठोर में दूसरे बोलते हुए बोलें; अर्थ-संबद्ध में या अनर्थ-संबद्ध में दूसरे बोलते हुए बोलें; मैत्री-चित्त वाले में या द्वेषी में दूसरे बोलते हुए बोलें। फिर भी भिक्षुओं! तुम्हें इस प्रकार शील रखना चाहिए—‘हमारा चित्त न तो परिवर्तित होगा, न पापपूर्ण वाणी उच्चारित करेंगे, हित-अनुकम्पी होकर मैत्री-चित्त रहेंगे, न द्वेषी। उस व्यक्ति को मैत्री-सहित चित्त से प्रसारित करके रहेंगे, और समस्त अवस्थित लोक को मैत्री-सहित चित्त से व्यापक, महागत, अप्रमाण, अराग, अद्वेष प्रसारित करके रहेंगे।’ भिक्षुओं! तुम्हें इस प्रकार शील रखना चाहिए।
7. “भिक्षुओं! जैसे कोई पुरुष आग-तृण-उक्का ग्रहण करके आए। वह इस प्रकार कहे—‘मैं इस अग्नि-तृण-उक्का से गंगा नदी को सन्तापूँगा, संपरितापूँगा।’ भिक्षुओं! क्या सोचते हो, क्या वह पुरुष अग्नि-तृण-उक्का से गंगा नदी को सन्तापेगा, संपरितापेगा?” “नहीं, भन्ते!” “क्यों?” “क्योंकि भन्ते! गंगा नदी गहन अपरिमेय है। वह अग्नि-तृण-उक्का से सन्तापना, संपरितापना सुकर नहीं; बस वह पुरुष क्लेश-विघात भागी होता।” “भिक्षुओं! इसी प्रकार पाँच प्रकार के वचन-पथ हैं जिनमें तुम्हें दूसरे बोलते हुए बोलें—काल में या अकाल में... (इत्यादि)... फिर भी भिक्षुओं! तुम्हें इस प्रकार शील रखना चाहिए—‘हमारा चित्त न तो परिवर्तित होगा, न पापपूर्ण वाणी उच्चारित करेंगे, हित-अनुकम्पी होकर मैत्री-चित्त रहेंगे, न द्वेषी। उस व्यक्ति को मैत्री-सहित चित्त से प्रसारित करके रहेंगे, और समस्त अवस्थित लोक को गंगा-नदी के समान चित्त से व्यापक, महागत, अप्रमाण, अराग, अद्वेष प्रसारित करके रहेंगे।’ भिक्षुओं! तुम्हें इस प्रकार शील रखना चाहिए।
8. “भिक्षुओं! जैसे कोई पुरुष लाख या हलिद्दी या नील या मंजिष्ठ ग्रहण करके आए। वह इस प्रकार कहे—‘मैं इस आकाश में रूप लिखूँगा, रूप-प्रादुर्भाव करूँगा।’ भिक्षुओं! क्या सोचते हो, क्या वह पुरुष आकाश में रूप लिखेगा, रूप-प्रादुर्भाव करेगा?” “नहीं, भन्ते!” “क्यों?” “क्योंकि भन्ते! आकाश अरूपी, अनिदस्सन है। वहाँ रूप लिखना, रूप-प्रादुर्भाव करना सुकर नहीं; बस वह पुरुष क्लेश-विघात भागी होता।” “भिक्षुओं! इसी प्रकार पाँच प्रकार के वचन-पथ हैं जिनमें तुम्हें दूसरे बोलते हुए बोलें—काल में या अकाल में... (इत्यादि)... ‘हमारा चित्त न तो परिवर्तित होगा... (इत्यादि)... समस्त अवस्थित लोक को आकाश के समान चित्त से व्यापक... (इत्यादि)।’ भिक्षुओं! तुम्हें इस प्रकार शील रखना चाहिए।
9. “भिक्षुओं! जैसे बिलार-भस्ता मथित, सु-मथित, सु-परीमथित, मुलायुका तूलिनी, छिन्न-सस्सरा, छिन्न-भभरा। फिर कोई पुरुष कठ या कथल ग्रहण करके आए। वह इस प्रकार कहे—‘मैं इस बिलार-भस्ता को मथित... छिन्न-भभरा को कठ या कथल से सरसर करूँगा, भरभर करूँगा।’ भिक्षुओं! क्या सोचते हो, क्या वह पुरुष उस बिलार-भस्ता को मथित... छिन्न-भभरा को कठ या कथल से सरसर करेगा, भरभर करेगा?” “नहीं, भन्ते!” “क्यों?” “क्योंकि भन्ते! वह बिलार-भस्ता मथित, सु-मथित, सु-परीमथित, मुलायुका तूलिनी, छिन्न-सस्सरा, छिन्न-भभरा है। वह कठ या कथल से सरसर करना, भरभर करना सुकर नहीं; बस वह पुरुष क्लेश-विघात भागी होता।” “भिक्षुओं! इसी प्रकार पाँच प्रकार के वचन-पथ हैं जिनमें तुम्हें दूसरे बोलते हुए बोलें—काल में या अकाल में... (इत्यादि)... ‘हमारा चित्त न तो परिवर्तित होगा... (इत्यादि)... समस्त अवस्थित लोक को बिलार-भस्ता के समान चित्त से व्यापक... (इत्यादि)।’ भिक्षुओं! तुम्हें इस प्रकार शील रखना चाहिए।
10. “भिक्षुओं! यदि भिक्षुओं! चोर-डाकू ककच से अंग-अंग भेद दें, फिर भी जो मन पदूषित हो, वह मेरे सासन को पदूषित नहीं करता। फिर भी भिक्षुओं! तुम्हें इस प्रकार शील रखना चाहिए—‘हमारा चित्त न तो परिवर्तित होगा, न पापपूर्ण वाणी उच्चारित करेंगे, हित-अनुकम्पी होकर मैत्री-चित्त रहेंगे, न द्वेषी। उस व्यक्ति को मैत्री-सहित चित्त से प्रसारित करके रहेंगे, और समस्त अवस्थित लोक को मैत्री-सहित चित्त से व्यापक, महागत, अप्रमाण, अराग, अद्वेष प्रसारित करके रहेंगे।’ भिक्षुओं! तुम्हें इस प्रकार शील रखना चाहिए।
11. “भिक्षुओं! इस ककचूपम ओवाद को स्मरण रखो। भिक्षुओं! क्या तुम्हें कोई वचन-पथ, सूक्ष्म या स्थूल, अधिवासित नहीं लगता?” “नहीं, भन्ते!” “इसलिए, भिक्षुओं! इस ककचूपम ओवाद को स्मरण रखो। भिक्षुओं! यह तुम्हारे लिए दीर्घकालिक हित और सुख होगा।”
भगवान् ने इस प्रकार कहा। प्रसन्न होकर वे भिक्षु भगवान् की वाणी का अभिनंदन करते हुए।
ककचूपम सुत्त समाप्त, प्रथम।