निग्रोध परिव्राजक वत्थु
1. इस प्रकार मैंने सुना—एक समय भगवान् राजगृह में गिद्धकूट पर्वत पर विराजमान थे। उस समय निग्रोध नामक परिव्राजक उदुम्बरिका नामक परिव्राजक आश्रम में निवास कर रहे थे, जिसमें उनके साथ तीस परिव्राजकों के सौ साथी परिव्राजक थे। उस समय संधान नामक गृहस्थ दिन के समय राजगृह से निकले भगवान् को दर्शन करने के लिए। लेकिन संधान गृहस्थ को यह विचार आया—“अभी भगवान् को दर्शन करने का समय नहीं है। भगवान् एकांतवास में हैं। मनोभावनीय भिक्षुओं को भी दर्शन के लिए समय नहीं है। मनोभावनीय भिक्षु एकांतवास में हैं। क्यों न मैं उदुम्बरिका परिव्राजक आश्रम जाऊँ, निग्रोध परिव्राजक के पास जाऊँ।” तब संधान गृहस्थ उदुम्बरिका परिव्राजक आश्रम की ओर चले।
2. उस समय निग्रोध परिव्राजक अपने विशाल परिव्राजक समुदाय के साथ बैठे हुए थे, जो कोलाहलपूर्ण, उच्चस्वर और महान् शब्द वाली अनेक प्रकार की पशुवत् बातचीत में लिप्त थे। जैसे—राजाओं की बातें, चोरों की बातें, महामात्रों की बातें, सेनाओं की बातें, भय की बातें, युद्ध की बातें, भोजन की बातें, पेय की बातें, वस्त्रों की बातें, आसनों की बातें, मालाओं की बातें, सुगंधों की बातें, रिश्तेदारों की बातें, यानों की बातें, गाँवों की बातें, नगरों की बातें, जनपदों की बातें, स्त्रियों की बातें, नायकों की बातें, समुद्रों की बातें, कुम्भकारों के स्थानों की बातें, पूर्वजों की बातें, विविध बातें, लोककथाएँ, समुद्रकथाएँ, और इस प्रकार भूतों और भवों की बातें।
3. निग्रोध परिव्राजक ने दूर से संधान गृहस्थ को आते देखा। देखकर उन्होंने अपने समुदाय को शांत किया—“भाइयो, शांत हो जाओ, भाइयो, शब्द न करो। यह गौतम ऋषि का शिष्य संधान गृहस्थ आ रहा है। जितने गौतम ऋषि के गृहस्थ शिष्य राजगृह में निवास करते हैं, उनमें संधान गृहस्थ उनमें से एक है। ये आये हुए महोदय शांतिप्रिय हैं, शांतिप्रशिक्षित हैं, शांति की प्रशंसा करने वाले हैं। शायद वे शांत समुदाय देखकर आना उचित समझें।” इस प्रकार कहने पर वे परिव्राजक मौन हो गये।
4. तब संधान गृहस्थ निग्रोध परिव्राजक के पास गये, पहुँचकर निग्रोध परिव्राजक के साथ अभिवादन किया। अभिवादन के बाद मैत्रीपूर्ण बातचीत को समाप्त कर एक ओर बैठ गये। एक ओर बैठे हुए संधान गृहस्थ ने निग्रोध परिव्राजक से कहा—“भाइयो, ये अन्य तीर्थिक परिव्राजक संगम और समागम में कोलाहलपूर्ण, उच्चस्वर और महान् शब्द वाली अनेक प्रकार की पशुवत् बातचीत में लिप्त रहते हैं। जैसे—राजाओं की बातें... आदि... भूतों और भवों की बातें। लेकिन भगवान् वन और वनपथों के किनारे, पथों पर, आसनों का सेवन करते हैं जो शांतिपूर्ण, अल्पध्वनि वाले, निर्जन वायु वाले, मनुष्यों से दूर, एकांत के योग्य हैं।”
5. इस पर निग्रोध परिव्राजक ने संधान गृहस्थ से कहा—“गृहस्थ, क्या आप जानते हैं कि गौतम ऋषि किसके साथ संवाद करते हैं, किसके साथ वार्तालाप करते हैं, किसके साथ बुद्धिपरीक्षा में प्रवेश करते हैं? गौतम ऋषि की बुद्धि शून्यगृहप्रिय है, गौतम ऋषि सर्वथा अपरिसंवाद्य हैं, संवाद के योग्य नहीं हैं। वे केवल अंतिम स्थानों का ही सेवन करते हैं। जैसे गौकन्या सीमाचारी केवल अंतिम स्थानों का ही सेवन करती है, वैसे ही गौतम ऋषि की बुद्धि शून्यगृहप्रिय है; गौतम ऋषि सर्वथा अपरिसंवाद्य हैं; संवाद के योग्य नहीं हैं। वे केवल अंतिम स्थानों का ही सेवन करते हैं। आओ गृहस्थ, गौतम ऋषि इस समुदाय में आ जायें, हम एक ही प्रश्न से उन्हें पराजित कर देंगे, जैसे खाली घड़ा गिरा देते हैं।”
6. भगवान् ने दिव्य श्रोत्रधातु से, जो शुद्ध और अतिमानुषी है, संधान गृहस्थ और निग्रोध परिव्राजक के बीच इस संवाद को सुना। तब भगवान् गिद्धकूट पर्वत से उतरकर सुमागधा नदी के तट पर मोरनीवाप की ओर गये; पहुँचकर सुमागधा नदी के तट पर मोरनीवाप में खुले स्थान पर चिंतन करते हुए चले। निग्रोध परिव्राजक ने भगवान् को सुमागधा नदी के तट पर मोरनीवाप में खुले स्थान पर चिंतन करते हुए जाते देखा। देखकर अपने समुदाय को शांत किया—“भाइयो, शांत हो जाओ, भाइयो, शब्द न करो, गौतम ऋषि सुमागधा नदी के तट पर मोरनीवाप में खुले स्थान पर चिंतन कर रहे हैं। ये आये हुए महोदय शांतिप्रिय हैं, शांति की प्रशंसा करने वाले हैं। शायद वे शांत समुदाय देखकर आना उचित समझें। यदि गौतम ऋषि इस समुदाय में आ जायें, तो हम उनसे यह प्रश्न पूछेंगे—‘भगवान्, भगवान् का वह कौन-सा धर्म है जिससे भगवान् शिष्यों को प्रशिक्षित करते हैं, जिससे भगवान् के शिष्य प्रशिक्षित होकर शांतिप्राप्ति को प्रत्यक्ष अनुभव करते हैं, जो प्रारम्भिक ब्रह्मचर्य है?’” इस प्रकार कहने पर वे परिव्राजक मौन हो गये।
तपोजिगुच्छावादो
7. तब भगवान् निग्रोध परिव्राजक के पास गये। निग्रोध परिव्राजक ने भगवान् से कहा—“भगवान्, आइये, भगवान् का स्वागत है। भगवान्, लंबे समय के बाद भगवान् ने इस दिशा को अवसर दिया, अर्थात् यहाँ आने का। भगवान्, यह आसन तैयार है, आइये भगवान् बैठें।” भगवान् तैयार आसन पर बैठ गये। निग्रोध परिव्राजक ने भी एक निम्न आसन लेकर एक ओर बैठ गये। एक ओर बैठे हुए निग्रोध परिव्राजक से भगवान् ने कहा—“क्या हो निग्रोध, अभी आप किस विषय पर बैठे हुए थे, और आपकी मध्य में क्या बातचीत हो रही थी?” इस पर निग्रोध परिव्राजक ने भगवान् से कहा, “भगवान्, हमने आपको सुमागधा नदी के तट पर मोरनीवाप में खुले स्थान पर चिंतन करते देखा, देखकर हमने यह कहा—‘यदि गौतम ऋषि इस समुदाय में आ जायें, तो हम उनसे यह प्रश्न पूछेंगे—भगवान्, भगवान् का वह कौन-सा धर्म है जिससे भगवान् शिष्यों को प्रशिक्षित करते हैं, जिससे भगवान् के शिष्य प्रशिक्षित होकर शांतिप्राप्ति को प्रत्यक्ष अनुभव करते हैं, जो प्रारम्भिक ब्रह्मचर्य है?’ भगवान्, यह हमारी मध्य बातचीत थी; और भगवान् आ गये।”
8. “निग्रोध, यह तुम्हारे लिए, अन्य मतवाले, अन्य कामवाले, अन्य रुचिवाले, अन्य योग वाले, अन्य आचार्य वाले के लिए कठिन है समझना कि जिससे मैं शिष्यों को प्रशिक्षित करता हूँ, जिससे मेरे शिष्य प्रशिक्षित होकर शांतिप्राप्ति को प्रत्यक्ष अनुभव करते हैं, जो प्रारम्भिक ब्रह्मचर्य है। आओ निग्रोध, तुम अपने आचार्य मत के अनुसार प्रश्न पूछो—‘भगवान्, तपोजिगुच्छ कैसे पूर्ण होता है, कैसे अपूर्ण?’” इस पर वे परिव्राजक कोलाहलपूर्ण, उच्चस्वर और महान् शब्द करने लगे—“अद्भुत है भाई, आश्चर्य है भाई, गौतम ऋषि की महान् शक्ति और महान् प्रभाव है, जहाँ अपना मत स्थापित करते हैं, वहाँ परमत से ही पराजित कर देते हैं।”
9. तब निग्रोध परिव्राजक ने उन परिव्राजकों को शांत करके भगवान् से कहा—“भगवान्, हम तो तपोजिगुच्छावादी हैं, तपोजिगुच्छ सार वाले हैं, तपोजिगुच्छ से जुड़े हुए रहते हैं। भगवान्, तपोजिगुच्छ कैसे पूर्ण होता है, कैसे अपूर्ण?” “निग्रोध, यहाँ तपस्वी अनावरणधारी होता है, मुक्ताचार, हस्तपालेखन, न एहि भद्दन्तिक, न तिट्ठ भद्दन्तिक, नाभिहत, न उद्दिस्सकत, न निमन्तन सादियति, सो न कुम्भिमुख पटिग्गण्हाति, न कलोपिमुख पटिग्गण्हाति, न एलकमन्तरं, न दण्डमन्तरं, न मुसलमन्तरं, न द्विन्नं भुञ्जमानानं, न गब्भिनिया, न पायमानाय, न पुरिसन्तरगताय, न संकित्तिसु, न यत्थ सा उपट्ठितो होति, न यत्थ मक्खिका सण्डसण्डचारिनी, न मच्छं, न मंसं, न सुरं, न मेरयं, न थुसोदकं पिवति, सो एकागारिको वा होति एकालोपिको, द्वागारिको वा होति द्वालोपिको, सत्तागारिको वा होति सत्तालोपिको, एकिस्सापि दत्तिया यापेति, द्वीहिपि दत्तीहि यापेति, सत्तहिपि दत्तीहि यापेति; एकाहिकम्पि आहारं आहारेति, द्वीहिकम्पि आहारं आहारेति, सत्ताहिकम्पि आहारं आहारेति, इति एवरूपं अद्धमासिकम्पि परियायभत्तभोजनानुयोगमनुयुत्तो विहरति। सो साकभक्खो वा होति, सामाकभक्खो वा होति, नीवारभक्खो वा होति, दद्दुलभक्खो वा होति, हटभक्खो वा होति, कणभक्खो वा होति, आचामभक्खो वा होति, पिञ्ञाकभक्खो वा होति, तिणभक्खो वा होति, गोमयभक्खो वा होति; वनमूलफलाहारो यापेति पवत्तफलभोजी। सो साणानिपि धारेति, मसाणानिपि धारेति, छवदुस्सानिपि धारेति, पंसुकूलानिपि धारेति, तिरीटानिपि धारेति, अजिनम्पि धारेति, अजिनक्खिपम्पि धारेति, कुसचीरम्पि धारेति, वाकचीरम्पि धारेति, फलकचीरम्पि धारेति, केसकम्बलम्पि धारेति, वाळकम्बलम्पि धारेति, उलूकपक्खम्पि धारेति, केसमस्सुलोचकोपि होति केसमस्सुलोचनानुयोगमनुयुत्तो, उब्भट्ठकोपि होति आसनपटिक्खित्तो, उक्कुटिकोपि होति उक्कुटिकप्पधानमनुयुत्तो, कण्टकापस्सयिकोपि होति कण्टकापस्सये सेय्यं कप्पेति, फलकसेय्यम्पि कप्पेति, थण्डिलसेय्यम्पि कप्पेति, एकपस्सयिकोपि होति रजोजल्लधरो, अब्भोकासिकोपि होति यथासन्थतिको, वेकटिकोपि होति विकटभोजनानुयोगमनुयुत्तो, अपानकोपि होति अपानकत्तमनुयुत्तो, सायततियकम्पि उदकोरोहनानुयोगमनुयुत्तो विहरति। निग्रोध, क्या तुम्हें लगता है कि यदि तपोजिगुच्छ इस प्रकार हो तो पूर्ण है या अपूर्ण?” “निश्चय ही भगवान्, यदि इस प्रकार हो तो तपोजिगुच्छ पूर्ण है, अपूर्ण नहीं।” “निग्रोध, इस प्रकार पूर्ण तपोजिगुच्छ के भी मैं अनेक प्रकार के उपकलेश बताता हूँ।”
उपकलेश
10. “भगवान्, भगवान् पूर्ण तपोजिगुच्छ के अनेक प्रकार के उपकलेश कैसे बताते हैं?” “निग्रोध, यहाँ तपस्वी तप ग्रहण करता है, वह उस तप से आत्मसंनुत होता है, पूर्ण संकल्प वाला। निग्रोध, जितना तपस्वी तप ग्रहण करता है, वह उस तप से आत्मसंनुत होता है, पूर्ण संकल्प वाला। यह भी निग्रोध, तपस्वी का उपकलेश है।
फिर, निग्रोध, तपस्वी तप ग्रहण करता है, वह उस तप से आत्मप्रशंसा करता है, पराजित करता है। निग्रोध, जितना तपस्वी तप ग्रहण करता है, वह उस तप से आत्मप्रशंसा करता है, पराजित करता है। यह भी निग्रोध, तपस्वी का उपकलेश है।
फिर, निग्रोध, तपस्वी तप ग्रहण करता है, वह उस तप से मोहित होता है, मग्न होता है, प्रमाद में पड़ता है। निग्रोध, जितना तपस्वी तप ग्रहण करता है, वह उस तप से मोहित होता है, मग्न होता है, प्रमाद में पड़ता है। यह भी निग्रोध, तपस्वी का उपकलेश है।
11. फिर, निग्रोध, तपस्वी तप ग्रहण करता है, वह उस तप से लाभ, सत्कार, सुप्रतिष्ठिति उत्पन्न करता है, वह उस लाभ, सत्कार, सुप्रतिष्ठिति से आत्मसंनुत होता है, पूर्ण संकल्प वाला। निग्रोध, जितना तपस्वी तप ग्रहण करता है, वह उस तप से लाभ, सत्कार, सुप्रतिष्ठिति उत्पन्न करता है, वह उस लाभ, सत्कार, सुप्रतिष्ठिति से आत्मसंनुत होता है, पूर्ण संकल्प वाला। यह भी निग्रोध, तपस्वी का उपकलेश है।
फिर, निग्रोध, तपस्वी तप ग्रहण करता है, वह उस तप से लाभ, सत्कार, सुप्रतिष्ठिति उत्पन्न करता है, वह उस लाभ, सत्कार, सुप्रतिष्ठिति से आत्मप्रशंसा करता है, पराजित करता है। निग्रोध, जितना तपस्वी तप ग्रहण करता है, वह उस तप से लाभ, सत्कार, सुप्रतिष्ठिति उत्पन्न करता है, वह उस लाभ, सत्कार, सुप्रतिष्ठिति से आत्मप्रशंसा करता है, पराजित करता है। यह भी निग्रोध, तपस्वी का उपकलेश है।
फिर, निग्रोध, तपस्वी तप ग्रहण करता है, वह उस तप से लाभ, सत्कार, सुप्रतिष्ठिति उत्पन्न करता है, वह उस लाभ, सत्कार, सुप्रतिष्ठिति से मोहित होता है, मग्न होता है, प्रमाद में पड़ता है। निग्रोध, जितना तपस्वी तप ग्रहण करता है, वह उस तप से लाभ, सत्कार, सुप्रतिष्ठिति उत्पन्न करता है, वह उस लाभ, सत्कार, सुप्रतिष्ठिति से मोहित होता है, मग्न होता है, प्रमाद में पड़ता है। यह भी निग्रोध, तपस्वी का उपकलेश है।
12. फिर, निग्रोध, तपस्वी भोजन में पक्षपात करता है—‘यह मुझे अच्छा लगता है, यह मुझे अच्छा नहीं लगता।’ जो उसे अच्छा नहीं लगता, उसे आश्रित होकर त्याग देता है। जो अच्छा लगता है, उसे लिप्त होकर, मग्न होकर, आसक्त होकर, अनादीनवदर्शी, निस्सरणपञ्ञाहीन परिभोग करता है... यह भी निग्रोध, तपस्वी का उपकलेश है।
फिर, निग्रोध, तपस्वी लाभ, सत्कार, सुप्रतिष्ठिति की इच्छा से तप ग्रहण करता है—‘राजा, राजमहामात्र, क्षत्रिय, ब्राह्मण, गृहस्थ, तीर्थिक मुझे सत्कार करेंगे’... यह भी निग्रोध, तपस्वी का उपकलेश है।
13. फिर, निग्रोध, तपस्वी किसी समण या ब्राह्मण को निन्दा करता है—‘यह तो बहुजीवी है, सब कुछ ग्रहण करता है। जैसे—मूलबीज, खन्धबीज, फलबीज, अग्गबीज, बीजबीज ही पाँचवाँ, असनिविचक्कं, दन्तकूटं, समणप्पवादेन’... यह भी निग्रोध, तपस्वी का उपकलेश है।
फिर, निग्रोध, तपस्वी किसी समण या ब्राह्मण को कुलों में सत्कृत, गुरुकार्य किया गया, मानित, पूजित होते देखता है। देखकर ऐसा सोचता है—‘इस बहुजीवी को कुलों में सत्कार, गुरुकार्य, मान, पूजा करते हैं। लेकिन मुझे तपस्वी, लूखाजीवी को कुलों में सत्कार, गुरुकार्य, मान, पूजा नहीं करते’। इस प्रकार वह कुलों में ईर्ष्या और अभिमान उत्पन्न करता है... यह भी निग्रोध, तपस्वी का उपकलेश है।
14. फिर, निग्रोध, तपस्वी आसन के लिए भिक्षाप्रार्थी होता है... यह भी निग्रोध, तपस्वी का उपकलेश है।
फिर, निग्रोध, तपस्वी स्वयं को न दिखाते हुए कुलों में विचरण करता है—‘यह भी मेरे तप का, यह भी मेरे तप का’... यह भी निग्रोध, तपस्वी का उपकलेश है।
फिर, निग्रोध, तपस्वी कुछ भी छिपाकर सेवन करता है। जब पूछा जाता है ‘यह तुम्हें अच्छा लगता है या नहीं’ तो जो अच्छा नहीं लगता, वह ‘अच्छा लगता है’ कहता है। जो अच्छा लगता है, वह ‘अच्छा नहीं लगता’ कहता है। इस प्रकार वह सज्जन झूठ बोलता है... यह भी निग्रोध, तपस्वी का उपकलेश है।
फिर, निग्रोध, तपस्वी तथागत या तथागत शिष्य के धर्मोपदेश को सुनते हुए अनुमत पर्याय में अनुमति नहीं देता... यह भी निग्रोध, तपस्वी का उपकलेश है।
15. फिर, निग्रोध, तपस्वी क्रोधी होता है, उपनाही। निग्रोध, जितना तपस्वी क्रोधी होता है, उपनाही। यह भी निग्रोध, तपस्वी का उपकलेश है।
फिर, निग्रोध, तपस्वी मक्खी होता है, पलासी... ईर्षुक होता है, मत्सरी... कपटी होता है, मायावी... कठोर होता है, अतीमान... पापीच्छु होता है, पापीच्छाओं का वशीभूत... मिथ्यादृष्टिक होता है, अन्तग्राहिक दृष्टि से सम्पन्न... सन्दिट्ठिपरामासी होता है, आधानग्राही, दुर्पटिनिस्सर्गी। निग्रोध, जितना तपस्वी सन्दिट्ठिपरामासी होता है, आधानग्राही, दुर्पटिनिस्सर्गी। यह भी निग्रोध, तपस्वी का उपकलेश है।
निग्रोध, क्या तुम्हें लगता है कि ये तपोजिगुच्छ उपकलेशयुक्त हैं या अनुपकलेशयुक्त?” “निश्चय ही भगवान्, ये तपोजिगुच्छ उपकलेशयुक्त हैं, अनुपकलेशयुक्त नहीं। भगवान्, यह निश्चय है कि यहाँ कोई तपस्वी इन सभी उपकलेशों से सम्पन्न हो सकता है; फिर किसी एक-दो का क्या कहना।”
परिशुद्धपटिकप्पत्तकथा
16. “निग्रोध, यहाँ तपस्वी तप ग्रहण करता है, वह उस तप से न आत्मसंनुत होता है न पूर्ण संकल्प वाला। निग्रोध, जितना तपस्वी तप ग्रहण करता है, वह उस तप से न आत्मसंनुत होता है न पूर्ण संकल्प वाला। इस प्रकार वह उस स्थान में परिशुद्ध होता है।
फिर, निग्रोध, तपस्वी तप ग्रहण करता है, वह उस तप से न आत्मप्रशंसा करता है न पराजित करता है... इस प्रकार वह उस स्थान में परिशुद्ध होता है।
फिर, निग्रोध, तपस्वी तप ग्रहण करता है, वह उस तप से न मोहित होता है न मग्न होता है न प्रमाद में पड़ता है... इस प्रकार वह उस स्थान में परिशुद्ध होता है।
17. फिर, निग्रोध, तपस्वी तप ग्रहण करता है, वह उस तप से लाभ, सत्कार, सुप्रतिष्ठिति उत्पन्न करता है, वह उस लाभ, सत्कार, सुप्रतिष्ठिति से न आत्मसंनुत होता है न पूर्ण संकल्प वाला... इस प्रकार वह उस स्थान में परिशुद्ध होता है।
फिर, निग्रोध, तपस्वी तप ग्रहण करता है, वह उस तप से लाभ, सत्कार, सुप्रतिष्ठिति उत्पन्न करता है, वह उस लाभ, सत्कार, सुप्रतिष्ठिति से न आत्मप्रशंसा करता है न पराजित करता है... इस प्रकार वह उस स्थान में परिशुद्ध होता है।
फिर, निग्रोध, तपस्वी तप ग्रहण करता है, वह उस तप से लाभ, सत्कार, सुप्रतिष्ठिति उत्पन्न करता है, वह उस लाभ, सत्कार, सुप्रतिष्ठिति से न मोहित होता है न मग्न होता है न प्रमाद में पड़ता है... इस प्रकार वह उस स्थान में परिशुद्ध होता है।
18. फिर, निग्रोध, तपस्वी भोजन में पक्षपात नहीं करता—‘यह मुझे अच्छा लगता है, यह मुझे अच्छा नहीं लगता।’ जो उसे अच्छा नहीं लगता, उसे अनाश्रित होकर त्याग देता है। जो अच्छा लगता है, उसे अनलिप्त, अमग्न, अनासक्त, आदीनवदर्शी, निस्सरणपञ्ञासम्पन्न परिभोग करता है... इस प्रकार वह उस स्थान में परिशुद्ध होता है।
फिर, निग्रोध, तपस्वी लाभ, सत्कार, सुप्रतिष्ठिति की इच्छा से तप ग्रहण नहीं करता—‘राजा, राजमहामात्र, क्षत्रिय, ब्राह्मण, गृहस्थ, तीर्थिक मुझे सत्कार करेंगे’... इस प्रकार वह उस स्थान में परिशुद्ध होता है।
19. फिर, निग्रोध, तपस्वी किसी समण या ब्राह्मण को निन्दा नहीं करता—‘यह तो बहुजीवी है, सब कुछ ग्रहण करता है। जैसे—मूलबीज... आदि... समणप्पवादेन’... इस प्रकार वह उस स्थान में परिशुद्ध होता है।
फिर, निग्रोध, तपस्वी किसी समण या ब्राह्मण को कुलों में सत्कृत, गुरुकार्य किया गया, मानित, पूजित होते देखता है। देखकर ऐसा नहीं सोचता—‘इस बहुजीवी को कुलों में सत्कार, गुरुकार्य, मान, पूजा करते हैं। लेकिन मुझे तपस्वी, लूखाजीवी को कुलों में सत्कार, गुरुकार्य, मान, पूजा नहीं करते’। इस प्रकार वह कुलों में ईर्ष्या और अभिमान उत्पन्न नहीं करता... इस प्रकार वह उस स्थान में परिशुद्ध होता है।
20. फिर, निग्रोध, तपस्वी आसन के लिए भिक्षाप्रार्थी नहीं होता... इस प्रकार वह उस स्थान में परिशुद्ध होता है।
फिर, निग्रोध, तपस्वी स्वयं को न दिखाते हुए कुलों में विचरण नहीं करता—‘यह भी मेरे तप का, यह भी मेरे तप का’... इस प्रकार वह उस स्थान में परिशुद्ध होता है।
फिर, निग्रोध, तपस्वी कुछ भी छिपाकर सेवन नहीं करता, जब पूछा जाता है ‘यह तुम्हें अच्छा लगता है या नहीं’ तो जो अच्छा नहीं लगता, वह ‘अच्छा नहीं लगता’ कहता है। जो अच्छा लगता है, वह ‘अच्छा लगता है’ कहता है। इस प्रकार वह सज्जन झूठ नहीं बोलता... इस प्रकार वह उस स्थान में परिशुद्ध होता है।
फिर, निग्रोध, तपस्वी तथागत या तथागत शिष्य के धर्मोपदेश को सुनते हुए अनुमत पर्याय में अनुमति देता है... इस प्रकार वह उस स्थान में परिशुद्ध होता है।
21. फिर, निग्रोध, तपस्वी अक्रोधी होता है, अनुपनाही। निग्रोध, जितना तपस्वी अक्रोधी होता है, अनुपनाही। इस प्रकार वह उस स्थान में परिशुद्ध होता है।
फिर, निग्रोध, तपस्वी अमक्खी होता है, अपलासी... अनीर्षुक होता है, अमत्सरी... अकपटी होता है, अमायावी... न कठोर होता है, न अतीमान... न पापीच्छु होता है, न पापीच्छाओं का वशीभूत... न मिथ्यादृष्टिक होता है, न अन्तग्राहिक दृष्टि से सम्पन्न... न सन्दिट्ठिपरामासी होता है, न आधानग्राही, सुपटिनिस्सर्गी। निग्रोध, जितना तपस्वी न सन्दिट्ठिपरामासी होता है, न आधानग्राही, सुपटिनिस्सर्गी। इस प्रकार वह उस स्थान में परिशुद्ध होता है।
निग्रोध, क्या तुम्हें लगता है कि यदि तपोजिगुच्छ इस प्रकार हो तो परिशुद्ध है या अपरिशुद्ध?” “निश्चय ही भगवान्, यदि इस प्रकार हो तो तपोजिगुच्छ परिशुद्ध है, अपरिशुद्ध नहीं, उत्तम प्राप्त और सार प्राप्त।” “निग्रोध, इतने से ही तपोजिगुच्छ उत्तम प्राप्त और सार प्राप्त नहीं होता; बल्कि पटिकप्पत्त होता है।”
परिशुद्धतचप्पत्तकथा
22. “भगवान्, तपोजिगुच्छ कब उत्तम प्राप्त और सार प्राप्त होता है? भगवान्, कृपया तपोजिगुच्छ का उत्तम ही बतायें, सार ही बतायें।” “निग्रोध, यहाँ तपस्वी चातुयामसंवरसंवृत होता है। निग्रोध, तपस्वी चातुयामसंवरसंवृत कैसे होता है? निग्रोध, यहाँ तपस्वी न प्राणी मारता है, न मारने का आदेश देता है, न मारने वाले को अनुमति देता है। न अदत्तं आदत्ति, न अदत्तं आदत्तपेति, न अदत्तं आदत्तो समनुजानाति। न मूसा भणति, न मूसा भणापेति, न मूसा भणतो समनुजानाति। न कामेसु मिच्छाचारी होति, न कामेसु मिच्छाचारी आपेति, न कामेसु मिच्छाचारी समनुजानाति। इस प्रकार निग्रोध, तपस्वी चातुयामसंवरसंवृत होता है।
निग्रोध, जब तपस्वी चातुयामसंवरसंवृत होता है, तो उसके लिए तपस्या में प्रयत्न होता है। वह प्रयत्न करता है, हीनावत्ति नहीं करता। वह विविक्त स्थान का सेवन करता है—अरण्यं, रुक्खमूलं, पब्बतं, कन्दरं, गिरिगुहं, सुसानं, वनपत्थं, अब्भोकासं, पलालपुञ्जं। वह भोजनोपरक्त पिण्डपात से लौटकर पलंघ आभुजित्वा, कायं उजुं कर, सतिं परिमुखं कत्वा निसीदति। वह अभिज्झा को त्यागकर विगताभिज्झेन चेतसा विहरति, अभिज्झाय चित्तं परिसोधेति। व्यापादप्पदोसं त्यागकर अब्यापन्नचित्तो सब्बपाणभूतहितानुकम्पी विहरति, व्यापादप्पदोसं चित्तं परिसोधेति। थीनमिद्धं त्यागकर विगतथीनमिद्धो आलोकसञ्ञी सतो सम्पजानो विहरति, थीनमिद्धं चित्तं परिसोधेति। उद्धच्चकुक्कुच्चं त्यागकर अनुद्धतो अज्झत्तं वूपसन्तचित्तो विहरति, उद्धच्चकुक्कुच्चं चित्तं परिसोधेति। विचिकिच्छं त्यागकर तिण्णविचिकिच्छो अकथंकथी कुसलेसु धम्मेसु विहरति, विचिकिच्छं चित्तं परिसोधेति।
23. वह इन पाँच निवारणों को त्यागकर चित्त के उपकलेशों को, पञ्ञा को दुर्बल करने के लिए, मैत्री सहगतेन चेतसा एकं दिशां फरित्वा विहरति। तथा दूसरी। तथा तीसरी। तथा चौथी। इस प्रकार ऊर्ध्व, अधो, तिर्य्यं, सब्बधि, सब्बत्तताय, सब्बावन्तं लोकं मैत्री सहगतेन चेतसा विपुलेन महग्गतेन अप्पमाणेन अवेरेन अब्यापज्जेन फरित्वा विहरति। करुणा सहगतेन चेतसा... मुदिता सहगतेन चेतसा... उपेक्षा सहगतेन चेतसा एकं दिशां फरित्वा विहरति। तथा दूसरी। तथा तीसरी। तथा चौथी। इस प्रकार ऊर्ध्व, अधो, तिर्य्यं, सब्बधि, सब्बत्तताय, सब्बावन्तं लोकं उपेक्षा सहगतेन चेतसा विपुलेन महग्गतेन अप्पमाणेन अवेरेन अब्यापज्जेन फरित्वा विहरति।
निग्रोध, क्या तुम्हें लगता है कि यदि तपोजिगुच्छ इस प्रकार हो तो परिशुद्ध है या अपरिशुद्ध?” “निश्चय ही भगवान्, यदि इस प्रकार हो तो तपोजिगुच्छ परिशुद्ध है, अपरिशुद्ध नहीं, उत्तम प्राप्त और सार प्राप्त।” “निग्रोध, इतने से ही तपोजिगुच्छ उत्तम प्राप्त और सार प्राप्त नहीं होता; बल्कि तचप्पत्त होता है।”
परिशुद्धफेग्गुप्पत्तकथा
24. “भगवान्, तपोजिगुच्छ कब उत्तम प्राप्त और सार प्राप्त होता है? भगवान्, कृपया तपोजिगुच्छ का उत्तम ही बतायें, सार ही बतायें।” “निग्रोध, यहाँ तपस्वी चातुयामसंवरसंवृत होता है... (पूर्ववत्)... उपेक्षा सहगतेन चेतसा विपुलेन महग्गतेन अप्पमाणेन अवेरेन अब्यापज्जेन फरित्वा विहरति। वह अनेकविधं पुब्बेनिवासं अनुस्सरति—एकं जातिं, द्वे जातियो, तिस्सो जातियो... अनेकेपि संवट्टकप्पे, अनेकेपि विवट्टकप्पे... ‘अमुत्रासिं एवंनामो एवंगोत्तो... इधूपपन्नो’ति। इति साकारं सउद्देसं अनेकविधं पुब्बेनिवासं अनुस्सरति।
निग्रोध, क्या तुम्हें लगता है कि यदि तपोजिगुच्छ इस प्रकार हो तो परिशुद्ध है या अपरिशुद्ध?” “निश्चय ही भगवान्, यदि इस प्रकार हो तो तपोजिगुच्छ परिशुद्ध है, अपरिशुद्ध नहीं, उत्तम प्राप्त और सार प्राप्त।” “निग्रोध, इतने से ही तपोजिगुच्छ उत्तम प्राप्त और सार प्राप्त नहीं होता; बल्कि फेग्गुप्पत्त होता है।”
परिशुद्धअग्गप्पत्तसारप्पत्तकथा
25. “भगवान्, तपोजिगुच्छ कब उत्तम प्राप्त और सार प्राप्त होता है? भगवान्, कृपया तपोजिगुच्छ का उत्तम ही बतायें, सार ही बतायें।” “निग्रोध, यहाँ तपस्वी चातुयामसंवरसंवृत होता है... (पूर्ववत्)... वह अनेकविधं पुब्बेनिवासं अनुस्सरति... इति साकारं सउद्देसं अनेकविधं पुब्बेनिवासं अनुस्सरति। वह दिव्येन चक्खुना विसुद्धेन अतिक्कन्तमानुसकेन सत्ते पस्सति चवमाने उपपज्जमाने हीने पणीते सुवण्णे दुब्बण्णे सुगते दुग्गते, यथाकम्मूपगे सत्ते पजानाति—‘इमे वत भोन्तो सत्ता कायदुच्चरितेन... अपायं दुग्गतिं विनिपातं निरयं उपपन्ना। इमे वा पन भोन्तो सत्ता कायसुचरितेन... सुगतिं सग्गं लोकं उपपन्ना’ति। इति दिव्येन चक्खुना विसुद्धेन अतिक्कन्तमानुसकेन सत्ते पस्सति चवमाने उपपज्जमाने हीने पणीते सुवण्णे दुब्बण्णे सुगते दुग्गते, यथाकम्मूपगे सत्ते पजानाति।
निग्रोध, क्या तुम्हें लगता है कि यदि तपोजिगुच्छ इस प्रकार हो तो परिशुद्ध है या अपरिशुद्ध?” “निश्चय ही भगवान्, यदि इस प्रकार हो तो तपोजिगुच्छ परिशुद्ध है, अपरिशुद्ध नहीं, उत्तम प्राप्त और सार प्राप्त।”
26. “निग्रोध, इतने से ही तपोजिगुच्छ उत्तम प्राप्त और सार प्राप्त होता है। इस प्रकार निग्रोध, जो तुमने मुझसे कहा—‘भगवान्, भगवान् का वह कौन-सा धर्म है जिससे भगवान् शिष्यों को प्रशिक्षित करते हैं, जिससे भगवान् के शिष्य प्रशिक्षित होकर शांतिप्राप्ति को प्रत्यक्ष अनुभव करते हैं, जो प्रारम्भिक ब्रह्मचर्य है?’। निग्रोध, वह स्थान इससे भी उत्तमतर और श्रेष्ठतर है, जिससे मैं शिष्यों को प्रशिक्षित करता हूँ, जिससे मेरे शिष्य प्रशिक्षित होकर शांतिप्राप्ति को प्रत्यक्ष अनुभव करते हैं, जो प्रारम्भिक ब्रह्मचर्य है।”
इस पर वे परिव्राजक कोलाहलपूर्ण, उच्चस्वर और महान् शब्द करने लगे—“हम अपने आचार्यों को खो देंगे, हम इससे अधिक उत्तम नहीं जानते।”
निग्रोध का पज्झायना
27. जब संधान गृहस्थ ने जाना—“अन्य तीर्थिक परिव्राजक भगवान् के भासित को सुसूक्ष्म सुन रहे हैं, कान लगाये हुए, अन्य चित्त उपस्थापित कर रहे हैं।” तब निग्रोध परिव्राजक से कहा—“भन्ते निग्रोध, जो तुमने मुझसे कहा—‘गृहस्थ, क्या आप जानते हैं... (पूर्ववत्)... एक प्रश्न से उन्हें पराजित कर देंगे, जैसे खाली घड़ा गिरा देते हैं।’ भगवान्, वह अर्हत् सम्यक्सम्बुद्ध यहाँ उपस्थित हो गये, अपरिसंवाद्य न बनाओ, गौकन्या सीमाचारी बनाओ, एक प्रश्न से पराजित करो, खाली घड़ा गिरा दो।’” इस पर निग्रोध परिव्राजक मौन, संकुचित, पत्तच्खन्ध, अधोमुख, पज्झायते, अप्रतिभान होकर बैठ गये।
28. तब भगवान् ने निग्रोध परिव्राजक को मौन, संकुचित, पत्तच्खन्ध, अधोमुख, पज्झायते, अप्रतिभान होते देखा और निग्रोध परिव्राजक से कहा—“निग्रोध, क्या सत्य ही तुम्हारी वह वाणी कही गयी?” “सत्य ही भगवान्, मेरी वह वाणी कही गयी, यथाबलं, यथामूर्खं, यथाकुशलं।” “निग्रोध, क्या तुम्हें सुना है वृद्ध, महल्लक परिव्राजकों, आचार्य-पाचार्यों के बोलते हुए—‘जो अतीतकाल में अर्हन्त् सम्यक्सम्बुद्ध हुए, वे संगम और समागम में कोलाहलपूर्ण... (पूर्ववत्)... पशुवत् बातचीत में लिप्त रहते थे। जैसे तुम वर्तमान में आचार्य हो। या वे भगवन्त् अरण्यवनपत्थानि... पटिसल्लानसारुप्पानि, जैसे मैं वर्तमान में?’”
“भगवान्, मुझे सुना है वृद्ध, महल्लक परिव्राजकों, आचार्य-पाचार्यों के बोलते हुए—‘जो अतीतकाल में अर्हन्त् सम्यक्सम्बुद्ध हुए, वे संगम और समागम में कोलाहलपूर्ण... पशुवत् बातचीत में लिप्त नहीं रहते थे। जैसे मैं वर्तमान में आचार्य हूँ। वे भगवन्त् अरण्यवनपत्थानि... पटिसल्लानसारुप्पानि, जैसे भगवान् वर्तमान में।’”
“निग्रोध, तुम्हारे लिए विञ्ञु, सतो, महल्लक के लिए यह विचार न आया—‘बुद्ध सो भगवान् बोधाय धम्मं देसेति, दन्तो सो भगवान् दमथाय धम्मं देसेति, सन्तो सो भगवान् समथाय धम्मं देसेति, तीर्णो सो भगवान् तरणाय धम्मं देसेति, परिनिब्बुतो सो भगवान् परिनिब्बानाय धम्मं देसेति’?”
ब्रह्मचरियपरियोसानसच्छिकिरिया
29. इस पर निग्रोध परिव्राजक ने भगवान् से कहा—“भगवान्, मेरी भूल हुई, दुर्बुद्धि, यथाबलं, यथामूर्खं, यथाकुशलं, जिससे मैंने भगवान् को इस प्रकार कहा। भगवान्, मेरी भूल को भूल ही मानकर क्षमा करें, भविष्य में संवर के लिए।” “निग्रोध, तुम्हारी भूल हुई, दुर्बुद्धि, यथाबलं, यथामूर्खं, यथाकुशलं, जिससे तुमने मुझे इस प्रकार कहा। लेकिन निग्रोध, जब तुम भूल को भूल ही देखकर धर्मानुसार प्रतिकार करते हो, तो मैं उसे स्वीकार करता हूँ। निग्रोध, आर्य विनय में यह प्रगति है कि भूल को भूल ही देखकर धर्मानुसार प्रतिकार करे, भविष्य में संवर अपनाये। लेकिन निग्रोध, मैं इस प्रकार कहता हूँ—
‘आओ विञ्ञू पुरुष असठो अमायावी उजुजातिको, मैं अनुसासामि, मैं धम्मं देसेमि। यथानुसिट्ठं तथा पटिपज्जमानो, यस्सत्थाय कुलपुत्ता सम्मदेव अगारस्मा अनगारियं पब्बजन्ति, तदनुत्तरं ब्रह्मचरियपरियोसानं दिट्ठेव धम्मे सयं अभिञ्ञा सच्छिकत्वा उपसम्पज्ज विहरिस्सति सत्तवस्सानि।’ तिष्ठन्तु निग्रोध, सत्त वस्सानि। ... (क्रमानुसार सात वर्ष से घटाकर)... एकं मासं... अर्धमासं। तिष्ठतु निग्रोध, अर्धमासो। आओ विञ्ञू पुरुष असठो अमायावी उजुजातिको, मैं अनुसासामि, मैं धम्मं देसेमि। यथानुसिट्ठं तथा पटिपज्जमानो, यस्सत्थाय कुलपुत्ता सम्मदेव अगारस्मा अनगारियं पब्बजन्ति, तदनुत्तरं ब्रह्मचरियपरियोसानं दिट्ठेव धम्मे सयं अभिञ्ञा सच्छिकत्वा उपसम्पज्ज विहरिस्सति सत्ताहं।”
परिव्राजकों का पज्झायना
30. “निग्रोध, शायद तुम्हें ऐसा लगे—‘गौतम ऋषि ने शिष्य बनाने के इच्छा से ऐसा कहा।’ निग्रोध, ऐसा न समझना। जो तुम्हारा आचार्य है, वही तुम्हारा आचार्य रहे। शायद तुम्हें ऐसा लगे—‘गौतम ऋषि ने उद्देश से अलग करने की इच्छा से ऐसा कहा।’ निग्रोध, ऐसा न समझना। जो तुम्हारा उद्देश है, वही रहे। शायद तुम्हें ऐसा लगे—‘गौतम ऋषि ने आजीविका से अलग करने की इच्छा से ऐसा कहा।’ निग्रोध, ऐसा न समझना। जो तुम्हारी आजीविका है, वही रहे। शायद तुम्हें ऐसा लगे—‘जो हमारे धम्म अकुसल हैं, अकुसल संख्यात साचार्यकानं, उनमें स्थापित करने की इच्छा से गौतम ऋषि ने ऐसा कहा।’ निग्रोध, ऐसा न समझना। अकुसल ही रहें, अकुसल संख्यात साचार्यकानं। शायद तुम्हें ऐसा लगे—‘जो हमारे धम्म कुसल हैं, कुसल संख्यात साचार्यकानं, उनसे अलग करने की इच्छा से गौतम ऋषि ने ऐसा कहा।’ निग्रोध, ऐसा न समझना। कुसल ही रहें, कुसल संख्यात साचार्यकानं। निग्रोध, मैं न शिष्य बनाने की इच्छा से ऐसा कहता हूँ, न उद्देश से अलग करने की, न आजीविका से अलग करने की, न तुम्हारे अकुसल धम्मों में स्थापित करने की, न कुसल धम्मों से अलग करने की। निग्रोध, अकुसल धम्म हैं अपहीन संकिलेसिका पोनोभविका सदरा दुक्खविपाका आयतिं जातिजरामरणिया, येसं पहानाय धम्मं देसेमि। यथापटिपन्नानं वो संकिलेसिका धम्मा पहीयिस्सन्ति, वोदानीया धम्मा अभिवड्ढिस्सन्ति, पञ्ञापारिपूरिं वेपुल्लत्तञ्च दिट्ठेव धम्मे सयं अभिञ्ञा सच्छिकत्वा उपसम्पज्ज विहरिस्सथ।”
31. इस पर वे परिव्राजक मौन, संकुचित, पत्तच्खन्ध, अधोमुख, पज्झायते, अप्रतिभान होकर बैठ गये, जैसे मारे गये चित्त वाले। तब भगवान् को यह विचार आया—“ये सभी मूर्ख पुरुष पापिमाओं से स्पर्शित हो गये। जहाँ एक भी ऐसा न हो—‘कम से कम ज्ञानार्थ ही गौतम ऋषि के ब्रह्मचर्य में रहें, सात दिन क्या करेंगे।’” तब भगवान् उदुम्बरिका परिव्राजक आश्रम में सिंहनाद किया, आकाश में उड़कर गिद्धकूट पर्वत पर पहुँचे। संधान गृहस्थ तो राजगृह में ही पहुँच गये।
उदुम्बरिका सुत्तं सम्पूर्णं द्वितीयं।